मौजूदा साहित्यिक परिदृश्य में लोकोदय प्रकाशन का ऐतिहासिक हस्तक्षेप

अगर समाज में सबकुछ ठीक हो, सबकुछ अनुकूल हो तो लेखक कुछ नहीं लिख पाएगा क्योंकि साहित्य की प्रासंगिकता विरोध

शिव कुशवाहा की 6 कविताएं

1.उम्मीदों का नया आकाशकिसी शहर की सड़क कीपरित्यक्त पुलिया के किनारेठहरकर देखना कभी कि वहां दिखेंगे तुम्हेंधंसते हुए से  धरातलमटमैले से

शिवदयाल के उपन्यास ‘एक और दुनिया होती’ का एक अंश

                       रात को ओढ़ने के लिए मेरे पास तो कुछ था नहीं। रात एक झोपड़ी के ओसारे में गुजारनी थी।

পড়ুণ সুব্রত চৌধুরীর ভ্রমণ কাহিনী ‘শিখর থেকে সাগরে’

শিখর থেকে সাগর ১ সুব্রত চৌধুরী অফিস থেকে আজ তাড়াতাড়িই বেরোলাম। তিনটের সময় বেড়িয়ে মেট্রোতে পালম পৌঁছলাম সাড়ে তিনটেয়। অন্যদিন

सुशांत सुप्रिय की 10 कविताएं

1. एक सजल संवेदना-सी उसे आँखों से कम सूझता है अब घुटने जवाब देने लगे हैं बोलती है तो कभी-कभी काँपने लगती है उसकी ज़बान घर के लोगों के राडार पर उसकी उपस्थिति अब दर्ज़ नहीं होती लेकिन वह है कि बहे जा रही है अब भी एक सजल संवेदना-सी समूचे घर में — अरे बच्चों ने खाना खाया कि नहीं कोई पौधों को पानी दे देना ज़रा बारिश भी तो ठीक से नहीं हुई है इस साल 2. निमंत्रण

लोकोदय नवलेखन सम्मान के लिए पांडुलिपियां आमंत्रित

लोकधर्मी लेखन को बढ़ावा देने के लिए दिसम्बर 2015 में लोकोदय प्रकाशन की शुरूआत की गई थी। साथ ही यह

पल्लवी मुखर्जी की 2 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी स्त्री स्त्री शब्द-शब्द उतारती है तुम्हेंअपने जीवन मेंभोर की लालिमा मेंलिपे चूल्हे परतुम्हारी चाय कीभीनी खुशबू सेफैलती है उसकी