साहित्यिक ई पत्रिका

शंकर

अगले क्षण दो परछाइयाँ रेंगते हुए मजार के पिछवाड़े जा पहुँचीं। दोनों ने अंधेरे में हाथों से दीवारों को टटोलना शुरू किया। अचानक उनमें से एक की अंगुलियाँ किसी नुकीली चीज से टकरायीं। उसने पत्थर का टुकड़ा धीरे-धीरे बाहर खींचा। अब सामने एक छोटा-सा छेद था। दूसरे ने छेद पर अपनी आँख गड़ायी। भीतर कोठरों में जो कुछ भी था, वह अब उसकी आँखों की पहुँच में था

रविशंकर सिंह

स्वतंत्रता सेनानी पेंशन की बात तो उन्होंने केवल अपनी पत्नी को बताई थी, लेकिन यह खबर आग की लहर की तरह गांव में इस कोने से उस कोने तक फैल गई। यह खबर सुनकर कितनों के कलेजे पर सांप लोट गया। लोग दांतों तले अंगुली दबा रहे थे। पांडे जी ने कब, कहां और कौन सा आंदोलन किया है ? 

चर्चित कहानियां

रमेश उपाध्याय की कहानी काठ में कोंपल बदलते समाज की कहानी है, जिसमें तमाम नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की  कोंपल दिखती है।

विवेक मिश्र की कहानी ‘कारा’ आपको यातना और अत्याचार के ऐसे कारागार में ले जाएगी कि आप सहम उठेंगे। 

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी प्रीमियम कर्ज और ईएमआई के जाल में उलझे मध्यवर्गीय जीवन की कहानी है।

कविता की दुनिया

हमारी आपकी जिंदगी की हर धड़कन को पकड़ने में कामयाब कविताएं

राकेश तिवारी के इस कहानी संग्रह में हमारे आसपास के  किरदारों  की कहानियां हैं। यह वक्त की नब्ज टटोलती है और बताती है कि हमारी आपकी ज़िन्दगी में वक्त के साथ कितना कुछ बदल गया है।

जयनंदन का कहानी संग्रह आईएसओ 9000 मज़दूरों की ज़िन्दगी की व्यथा कथा है। बाजार और भौतिकतावाद के  चक्कर में मध्यवर्गीय जीवन कैसे पिस रहा है, वह इस संग्रह की कहानियों में प्रतिबिंबित होता है।

यह अंक ‘बढ़ती अमानुषिकता से जूझती दुनिया’ पर केंद्रित है। गंभीर विषय के साथ पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय पूरी गंभीरता के साथ न्याय करती हुईं नज़र आईं हैं। पूरी समीक्षा पढ़ने की लिए क्लिक करें