अकेले हैं तो क्या ग़म है!

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार

किस्त 15

उस दिन अस्पताल के इमरजंसी वार्ड में वे व्हीलचेयर पर दिखे। तबीयत बहुत खराब थी उनकी। शायद उन्हें नौकर लेकर वहां आया था। मैंने उससे पूछा, ‘कोई साथ नहीं आया?’ उसका जवाब था, ‘घर में बेटे-बहू हैं, लेकिन किसी को फुर्सत नहीं।’ उसकी बात सुन कर मैं सन्न रह गया? जिस माता-पिता की अंगुली पकड़ कर बच्चे बड़े होते हैं, एक दिन वही उन्हें अकेला छोड़ देते हैं। एक तरफ जहां संयुक्त परिवार टूटने से बुजुर्ग अकेले हुए हैं, दूसरी तरफ भरे-पूरे परिवार में भी इस कदर उपेक्षित हैं कि उन्हें परायों की मदद लेनी पड़ती है।

डाक्टर से मुलाकात के बाद न्यूज़रूम पहुंचा तो मन खिन्न था। फिर भी काम में जुट गया हमेशा की तरह। एक के बाद एक खबरें आ रही थीं। मेरी निगाह हर खबर पर थी। तभी एक पर मेरी नजर ठिठक गई- मदर डेयरी के प्रबंध निदेशक एस नागराजन का इस्तीफा। …….. राजनीति से लेकर शासन तंत्र और कॉरपोरेट तक से इस्तीफे व निलंबन की खबरें अक्सर आती हैं। मगर नागराज साहब के इस्तीफे में ऐसा क्या है? यह सवाल मन में कौंधा।

एक सांस में यह समाचार पढ़ गया। नागराजन जी ने निजी कारणों से इस्तीफा दिया था, लेकिन जो वजह बताई थी, उससे उनके प्रति मन में सम्मान भर गया। रिपोर्टर के सवाल पर उनका जवाब था, ‘मैं अब अपने अभिभावकों के साथ समय बिताना चाहता हूं, जो बंगलुरु में रहते हैं।’ नेस्ले से अपने करियर की शुरुआत करने वाले नागराजन आइआइएम अमदाबाद के छात्र रहे हैं। जाहिर है इस मुकाम तक पहुंचाने में उनके माता-पिता ने एक एक लंबी संघर्ष यात्रा की होगी।

दूध की प्रमुख आपूर्तिकर्ता कंपनी मदर डेयरी में शीर्ष पद पर पहुंच जाने के बाद बूढे माता-पिता के साथ समय बिताने की बात उनके मन में अब क्यों आई? सेवानिवृत्ति के बाद भी नागराजन बंगलुरु जाकर रह सकते थे। मगर जो भी हो, अच्छा-खासा वेतन और बड़े पद को ठुकरा कर माता-पिता की सेवा करने का फैसला उन तमाम बेटे-बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो अंतहीन लालच में फंस कर असहाय मां-बाप को अकेला छोड़ देते हैं।

याद कीजिए आशा सहनी को जो बेटे का इंतजार करती हुईं अपने ही फ्लैट में कंकाल में बदल गर्इं। उस वृद्धा का कंकाल होना तो सबको दिखा, मगर ऐसे लाखों-करोड़ों मां-बाप की कंकाल होतीं उम्मीदें हमें नहीं दिखतीं जिनके बेटे कई कारणों से उसी शहर में अलग रहने लगते हैं। इनमें कितने लायक बेटे होंगे जो नागराजन की तरह मां-बाप के घर लौटेंगे? कहां खो गया है हमारे भीतर का श्रवण कुमार?

नागराजन जी के इस्तीफे की चर्चा मित्रों से कर चुका हूं। उनके भीतर भी कचोट है कि काश वे ऐसा कर पाते। मगर कौन कर पाता है? मेरे मन में भी पिता की देखभाल करने का खयाल आया है। ठीक वैसे ही जैसे कभी उन्होंने मेरी की होगी। ………तो आज सुबह मैंने उनसे कहा- नौकरी छोड़ कर मैं अब आपकी सेवा करना चाहता हूं। बहुत हो गई नौकरी। आपकी क्या राय है? इस पर उनका सहज जवाब था- अभी तुम्हारी जिम्मेदारियां पूरी नहीं हुर्इं। नौकरी छोड़ दोगे, तो जीवन कैसे निभाओगे। तुम मेरे साथ हो न। इतना ही काफी है।

तुम मेरे साथ हो न……। उनका यह वाक्य दिल को छू गया। हां, मैं उनके साथ हूं। बच्चे साथ रहें, बुजुर्ग मां-बाप इतना ही तो चाहते हैं। आज जब दफ्तर के लिए चला तो पिताजी दरवाजे पर मिले, हाथ में बिस्कुट का पैकेट और सेब लिए हुए। उन्होंने इसे मेरे आफिस बैग में डाल दिया है, शाम के नाश्ते के लिए। बुजुर्ग मां-बाप की नजरों में हम सभी हमेशा बच्चे ही रहते हैं।

मैं आफिस के लिए निकल रहा हूं। पिताजी गेट पर खड़े मुझे जाते हुए देख रहे हैं। बरसों पहले भी इसी तरह देखते थे, जब मैं सुबह स्कूल के लिए निकलता था। दूर तक उनकी निगाहें मेरे साथ चलतीं और यह आश्वस्त करतीं -बेटा मैं तुम्हारे साथ हूं। खूब पढ़ो-लिखो। अच्छा इनसान बनो। ……. आज मेरी बारी है। पिताजी मैं आपके साथ हूं। मैं पलट कर बार-बार देख रहा हूं। पिता जी घर के अंदर चले गए हैं न?

मुख्य सड़क पर आ गया हूं। मेट्रो स्टेशन जाने के लिए फीडर बस या ई-रिक्शा मिल जाए तो सहूलियत हो जाती है। उमस भरी इस दोपहर में बस स्टाप पर अकेला खड़ा हूं। एक आटो अभी मेरे सामने आकर रुका है। इसे चला रहे बुजुर्ग को देख कर हैरत में हूं। मैने पूछा- ‘मेट्रो स्टेशन चलेंगे?’ जवाब है-‘हां, क्यों नहीं बेटा। बैठो आप।’

………आटो चल पड़ा है। मैंने उनसे सवाल किया- ‘बुरा न मानें तो ये बताइए कि इस उम्र में भी आप क्यों काम कर रहे हैं।’ इस पर उन्होंने जवाब दिया- ‘जब बूढ़े बाप को बहू-बेटे अकेला छोड़ कर चले जाएं तो कोई क्या करे।’ उनकी बात सुन कर मैं खामोश हो गया। फिर भी रहा न गया तो एक सवाल और पूछ लिया- ‘कितनी उम्र हो गई आपकी।’ उन्होंने मुस्कारते हुए जवाब दिया- ‘यही कोई सत्तर साल।’ सामने लगे शीशे में उनका चेहरा देख रहा हूं। इस मुस्कुराहट में भी एक दर्द है।

अब कोई सवाल करने की हिम्मत नहीं हो रही। ये बुजुर्ग सज्जन बेहद सावधानी से आटो चला रहे हैं। काश कि इतनी सावधानी जीवन में भी बरती होती, तो इस उम्र में आटो तो न चलाना पड़ता। दो पैसे ही जोड़ लेते अपने भविष्य के लिए। …….. आटो वाले बाबा ने मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट पर उतार दिया है। मैंने सकुचाते हुए उन्हें 40 रुपए दिए तो हंसते हुए बोले- ‘अच्छा ठीक है। इतना काफी है।’ अभी मुझे उन आटो वालों के चेहरे याद आ रहे हैं जो ज्यादा किराया मांगते रहे हैं। एक ये बाबा हैं, जिन्हें जितना दे दिया उसी में संतुष्ट हो गए।

……….मैं उन्हें जाते हुए देख रहा हूं। सोच रहा हूं कि गैर सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए एक मुक्कमल सामाजिक सुरक्षा योजना क्यों नहीं पेश की जाती, जिससे वे बुढ़ापे में घर पर सम्मान के साथ जी सकें। आपने देश भर में ऐसे कई बूढ़े पुरुषों-महिलाओं को कुछ न कुछ काम करते हुए देखा होगा। मगर किसी भी श्रम मंत्री ने इनके लिए कभी कोई व्यावहारिक पेंशन योजना शुरू नहीं की। राजधानी दिल्ली में एक या दो हजार रुपए पेंशन देकर वाहवाही लूटने वाली सरकारें एक पल के लिए भी नहीं सोचतीं कि इतनी कम राशि में कोई कैसे गुजारा करता होगा। देश के लिए भावी नागरिक तैयार कर चुके और अब गरीबी व भूख से लड़ रहे इन बुजुर्गों के लिए सरकार कभी सोचेगी भी?

मैं मेट्रो स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर उस जगह खड़ा हूं, जहां आखिरी डिब्बा लगेगा। स्टेशन पर अक्सर बुजुर्ग सहयात्री दिख जाते हैं। कोई झोला लिए तो कोई हाथ में छड़ी लिए हुए। रिश्तों में घुस आए स्वार्थ ने उन्हें अकेला कर दिया है। मेट्रो का शुक्रिया, जिसने अपने सिस्टम में इनका खयाल रखा है। जब मैं हर कोच के आखिर और शुरू में चार सीटें इनके लिए रिजर्व देखता हूं, तो तसल्ली मिलती है कि यहां बुजुर्ग अकेले नहीं हैं। अभी-अभी जवान हुई नई पीढ़ी भी इनके लिए सीट खाली कर देती है।

……….. प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर एक बुजुर्ग मेट्रो का इंतजार करते दिख रहे हैं। कुर्ता-पायजामा पहने इन गोरे-चिट्टे सज्जन के सभी बालों ने श्वेत आभा ओढ़ ली है। इस आभा के पीछे जीवन के न जाने कितने अध्याय जुड़े होंगे, जिन्हें कोई पढ़ नहीं पाता। वे उम्र ढलने के साथ कुछ ज्यादा ही दुबले हो गए हैं। सच कहूं तो उम्र नहीं ढलती, जीवन ढल जाता है संघर्ष के कई पड़ाव पार करते हुए। बच्चों को बड़ा करते हुए। तो कई पड़ावों से आगे निकल चुके इन बुजुर्ग के एक हाथ में टिफिन है तो दूसरे में धार्मिक पुस्तक सुखमनी साहिब। वे कुछ बुदबुदा रहे हैं। मगर क्या? पता नहीं चल रहा। होठों पर आए शब्द हवा में गुम हो जा रहे हैं। अंदाज लगाना मुश्किल है कि वे प्रार्थना कर रहे हैं या किसी को कोस रहे हैं।

……….. हुडा सिटी सेंटर जाने वाली मेट्रो के आने की घोषणा हो रही है। वे सजग हो गए हैं। आखिरी डिब्बा लगते ही मैंने उन्हें सहारा दिया है। हम कोच के अंदर आ गए हैं। मेरी आत्मीयता पाकर वे ठीक मेरे बगल में बैठ गए हैं। सीट मिल जाने का इत्मीनान उनके चेहरे पर है। इधर-उधर नज़र दौड़ाने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा, आपको कहां जाना है पुत्तर जी। मैंने कहा-राजीव चौक और आप? इस सवाल पर उनका दर्द छलक उठा- मेरा क्या है जी। रोज सचिवालय चला जाता हूं पुत्तर जी। उनकी बात सुन कर अचरज हुआ। 70-75 साल के ये सज्जन अब क्या करने जाते होंगे सचिवालय? सेवानिवृत्ति के इतने सालों बाद अब वहां इनका क्या काम?

बुजुर्ग सज्जन ने सुखमनी साहिब के पन्ने पलटने शुरू कर दिए हैं। पहली पंक्ति पर मेरी नजर पड़ी है- धन गुरु नानक तू ही निरंकार।

इससे पहले कि वे आगे बढ़ें, मैंने उन्हें टोका, रोज सचिवालय क्या करने जाते हैं बाऊजी। इस सवाल पर उन्होंने उन्होंने मुझे घूर कर देखा, मानो मैंने कोई पिन चुभो दी हो उन्हें। फिर एकदम से वे बोले- हुन मैं की करां? घर विच दिल नहीं लगदा। जनानी रोटी दा डब्बा हाथ विच पड़ा देंदी है, फिर केंदी है, हुन तुसी जाओ, घूम के आओ। सारा दिन तुसी घर में कुड़-कुड़ करदे रेंदे हो। ……हुन तुसी ही दस्सो मैं की करां……..? यह कहते हुए उनके मन की पीड़ा चेहरे पर उतर आई।

कुछ पलों के बाद वे सहज हुए, तो बताने लगे कि सेवानिवृत्ति के बाद कैसे वे परिवार के लिए बोझ बन गए। जवान बेटे-बहू तो कुछ समझते ही नहीं। पत्नी भी उन्हीं का पक्ष लेती है। वे बार-बार बोलते- हुन तुसी दस्सो मैं की करां……?

इन बुजुर्ग से बात करते हुए कश्मीरी गेट तक पहुंच गया हूं। उनसे बातों का सिलसिला जारी है। ये सज्जन केंद्रीय सचिवालय में कई साल पहले अफसर थे। रिटायर होने तक परिवार के सभी दायित्व पूरे कर चुके थे। बेटे के लिए प्यारी सी बहू ले आए। मगर शादी के बाद वह अपनी दुनिया में इस कदर खोया कि बूढ़े मां-बाप की सुध न रही। टोका-टाकी करने लगे तो घर में कलह शुरू हो गया। तब एक दिन पत्नी ने ही कहा कि बाहर घूम आया करो। तो रोज चले जाते हैं सचिवालय, कभी इस दोस्त के पास तो कभी उस दोस्त के पास। फिर शाम चार-पांच बजे फल-सब्जियां लेकर लौट जाते हैं घर। सरकारी पेंशन है तो सहारा है। यह सब बताते हुए कई बार उनकी आंखें छलकीं। और फिर उनकी नज़र सुखमनी साहिब के पन्ने पर गड़ जाती- धन गुरु नानक तू ही निरंकार…….।

बुजुर्ग महोदय अपने जीवन की किताब खोल चुके थे। अब और अध्यायों को पढ़ने के लिए समय नहीं मेरे पास। …………. राजीव चौक आने की घोषणा हो रही है। मैंने यों ही फिर पूछ लिया, आप तो सचिवालय जाएंगे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- हां और क्या। हुन दस्सो की करां? फिर बताने लगे कि आज अपने पुराने दोस्त के साथ बैठ कर कॉफी की चुस्कियां लेंगे। और गप-शप करेंगे। पटेल चौक के बाद तो उतर ही जाना है। मैंने कहा, अच्छा, कल फिर मिलेंगे।

मैं सीट से उठ गया हूं। ……. उन्होंने सुखमनी साहिब का पन्ना फिर पलटा है। वे पढ़ रहे हैं-
दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ।
सरणि तुमारी आइयो नानक के प्रभ साथ।

वे खुद में फिर अकेले हो गए हैं। फिर भी कोई गम नहीं। क्योंकि प्रभु उनके साथ हैं। पुराने दोस्त उनके साथ हैं।

मैं राजीव चौक उतर रहा हूं। इन बुजुर्ग के मन की गठरी को अपने सिर लादे। वे मन की बात कह लेते हैं, लेकिन इस देश में दस करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग किससे अपने मन की कहें? और कहें भी तो किससे कहें और क्या कहें? कितने लोग हैं जो इनकी सुनने को तैयार हैं। क्या आप सुनेंगे इनके दिल की बात?

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2 Responses

  1. प्रवेश सोनी says:

    मन को भिगो गई यह पोस्ट ,….अस्ताचल को जाता सूरज दिन भर की थकन को उदासी में समेट लेता है

  2. मार्मिक ।हर बार से अधिक ।

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