अनिरुद्ध सिन्हा की छह ग़ज़लें

अनिरुद्ध सिन्हा

नाम –अनिरुद्ध सिन्हा

जन्म -2 मई 1957

शिक्षा –स्नातकोत्त

प्रकाशित कृतियाँ

--------------------

-(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह ) (3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह)  (4)तिनके भी डराते हैं  (5)तपिश  (6)तमाशा (7)तड़प  (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह) (9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण(12)हिन्दी ग़ज़ल परंपरा और विकास (13)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (आलोचना )

सम्पादन-

साहित्यिक पत्रिका “समय  सुरभि” और ”,जनपथ “ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन

“किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है(अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें)तथा बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार का सम्पादन ।

देश के तमाम स्तरीय पत्र/पत्रिकाओं में निरंतर ग़ज़लों और आलेखों का प्रकाशन

सम्मान  

बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा, विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,आचार्य लक्ष्मीकान्त मिश्र स्मृति सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित

सदस्य-बिहार फिल्म विकास एवं वित्त निगम

संप्रति –स्वतंत्र लेखन

संपर्क- गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार )811201

Email-anirudhsinhamunger@ gmail.com

Mobile-09430450098    

एक

सभी की सोच अलग है अलग दिशाओं में

ये कैसे लोग हैं  शामिल तेरी  सभाओं में

अभी ज़मीं पे अँधेरा है  आसमां चुप   है

कहीं तो चांद  भी होगा इन्हीं घटाओं  में

कहाँ से आई गुलाबों की ज़ेहन में  खुशबू

किसी का हुस्न महकता है इन हवाओं में

तमाम लोग अकेले खड़े हैं  महफ़िल में

कहीं तो  खोट छुपी  है तेरी वफ़ाओं में

ये शहर  कितना ख़तरनाक हो गया यारो

चलो कि बैठ  रहें  जाके अब  गुफाओं में

 

दो

हर  नई  रात  की आहट से ही डर जाऊँ मैं

सोचता  हूँ  कि अँधेरों  में  किधर  जाऊँ मैं

धूप की  आँच में  निकला  हूँ सफ़र में साहब

हाथ  कुछ आए  तो फिर लौट के घर जाऊँ मैं

बाद  मुद्दत  के मिला है वो मुझे  क़िस्मत से

फिर  उसी  याद  के दरिया में  उतर जाऊँ मैं

जाने किस मोड़ पे कट जाए ये साँसों की पतंग

किसको  मालूम  कहाँ  जा के ठहर  जाऊँ  मैं

जिससे  नाराज़  बहुत  होके   रहा  मैं  तनहा

वो  कभी  टूट के  मिल जाए तो मर जाऊँ  मैं

 

तीन

रहा कुछ खौफ़ का ऐसा असर हर एक सीने में

गुज़ारी उम्र  लोगों  ने लहू  अपना ही पीने में

सुना है  बाढ़ आई  है पड़ोसी  गाँव में लेकिन

यहाँ तो धूप की  बारिश है सावन के महीने में

हमारे पास से सब लोग कुछ हटकर गुज़रते हैं

छुपी है  मेहनतों  की बू  हमारे इस पसीने में

ज़रा सोचो तो क्यों डूबे हो तुम मझधार में आकर

कोई तो छेद निश्चित था तुम्हारे इस सफ़ीने में

सभी रिश्ते हैं मतलब के सभी मतलब के हैं साथी

मज़ा आता नहीं है अब किसी के साथ  जीने में

 

चार

धूप को सर पर लिये  चलता रहा

मैं ज़मीं के साथ  ही जलता रहा

नफ़रतों के  जहर पीकर  दोस्तो

प्यार के साँचे में मैं  ढलता रहा

टूटकर इक दिन बिखर जाऊँगा मैं

मेरे अन्दर  खौफ़ ये  पलता रहा

लौट आया आसमां को  छूके  मैं

जलनेवाला उम्र- भर जलता  रहा

लोग अपनी मंज़िलों को  हो लिये  

वो  हमेशा  हाथ  ही मलता रहा

 

पांच

बढ़ रहा  है तनाव  क्या देखूँ

अब रगों का खिंचाव क्या देखूँ

लिख रहा हूँ ग़ज़ल तहेदिल से

उँगलियों का कसाव क्या देखूँ

बाहरी  रख-रखाव  में गुम  हूँ

मन के भीतर का घाव क्या देखूँ

जो है  मजबूरियों से ही कायम

वक़्त का वो  दबाव क्या देखूँ

क़र्ज़ पीकर फसल न घर आई

अब दलालों का भाव क्या देखूँ

 

छह

मंज़िल न मिल सकी कोई रस्ता न मिल सका

अंधे को  आइने  का  सहारा  न  मिल सका

पत्थर के  तेरे शहर  में  रुकते  भी हम कहाँ

वो धूप थी  कि पेड़  का साया  न मिल सका

हैरान है  वो  घर की  अदावत  को  देखकर

अपनों के बीच भी  कोई अपना न मिल सका

अपने लबों की  प्यास  बुझाता मैं किस तरह

दरिया की बात छोड़िए क़तरा न मिल  सक

जिसके  लिए  गुज़ारते  अपनी  तमाम उम्र

इस ज़िंदगी में  एक भी ऐसा  न मिल  सका

You may also like...

1 Response

  1. राजेश"ललित"शर्मा says:

    “क़र्ज़ पी कर फ़सल घर न आई”
    अब दलालों काभाव क्या देखूँ ”
    अनिरूद्ध सिन्हा की लाजवाब ग़ज़लें।

Leave a Reply