अनुपम निशान्त की चार कविताएं

अनुपम निशान्त

चुनार (मिर्जापुर) में जन्म। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से पत्रकारिता में परास्नातक। देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में काम। संप्रति अमर उजाला, वाराणसी में वरिष्ठ उप संपादक।

1- अपना शून्य गढ़ो

कभी-कभी 
जिंदगी के लिए जरूरी खुशी
करीब होकर भी गुम जाती है
तलाशने लगो तो मिलती ही नहीं।
जैसे
किराए के छोटे मकान में अक्सर
चौकी के नीचे, कूलर के पीछे
हमारे कई जरूरी सामान कब-कैसे
सरकते चले जाते हैं और 
हमें पता तक नहीं चलता।
बेटी का हेयर बैंड और कलर-ब्रश
मेरे मोजे और तुम्हारा सेफ्टी पिन
अक्सर वक्त पर नहीं मिलता।

जैसे बारह महीने, चौबीसों घंटे 
खुद को भूल तुम जुटी रहती हो 
अपने उपद्रवी-विक्षिप्त-छितराए
से पति को सहेजने और 
एक के बाद एक फरमाइशों की 
लम्बी फेहरिस्त लिए खड़ी बेटी के
आज और कल को गढ़ने में,

ठीक वैसे ही कभी-कभी
तुम्हें अपने भीतर एक शून्य बनाना चाहिए
एक ऐसा एकांत जिसमें सिर्फ तुम रहो
इसमें न तुम्हारे झड़ते बालों की चिंता हो
न आंखों के नीचे गहराते काले घेरों की
और न मेरी अकड़ती रीढ़ का दर्द।
शायद यह शून्य सदियों पुरानी 
चिंताओं और थकन से तुम्हें राहत दे...।

2- सबका अपना बनारस

सबका अपना बनारस होता है
बनारस एक शहर नहीं, 
एक गंध, ध्वनि और शब्द है,
आस्था, विश्वास और प्रारब्ध है।

कोई यहां जीना चाहता है
कोई यहां मरना चाहता है
जैसे सबकी अपनी-अपनी चाहतें
वैसे सबका अपना-अपना बनारस।

किसी का टूटता-बिखरता,
किसी का संवरता-निखरता।
किसी के लिए बुद्ध की मुस्कान, शिव का वास,
किसी के लिए कबीर, तुलसी और रैदास।

किसी के लिए सर्व विद्या की राजधानी
किसी के लिए गंगा के मौजों की रवानी।
किसी के लिए घंटे-घड़ियाल की पवित्र गूंज
किसी के लिए बेतरतीब ट्रैफिक का शोर।

किसी का बनारस मंदिर-घाट-सीढ़ियां-गालियां
तो किसी का मॉल-होटल-बार-कारखाना
किसी के लिए डम-डम डमरू का अनहद नाद
किसी के लिए करघों की खटर-पटर, खटर-पटर।

किसी को दिखता नहीं
किसी को दर्शन देता है
किसी के लिए मोक्ष तो
किसी के लिए धंधा।

सबका अपना बनारस होता है
किसी के पास, किसी से दूर
किसी के सपनों में जिंदा
किसी के सामने दम तोड़ता
किसी के लिए आसक्ति
किसी के लिए विरक्ति।

बहुत मुश्किल है 
बनारस को बता पाना
यह शहर बताया नहीं जाता
सिर्फ महसूस होता है।

3- मैं और तुम

मैं आकाश का सितारा थी
लेकिन तुमने चाहा तो मैंने
छोड़ दिया चमकना और
टूटकर तुम्हारे क़दमों में आ गिरी।

मैं बहती-बलखाती नदी थी 
लेकिन तुमने चाहा तो मैंने
रोक दिया अपना बहाव
शांत कर दिया अपनी लहरों को
तुम्हारे बाँध के बंधन में बंध गई।

मैं उन्मुक्त-मदमाती हवा थी
लेकिन तुमने चाहा तो मैं
थम गई, बेड़ियां डाल लीं 
ख़ुद ही अपने नाज़ुक पैरों में।

मैं कली थी खिलने को आतुर
लेकिन तुमने चाहा तो मैं
ख़ुद-ब-ख़ुद अपनी शाख़ से टूट गई
मुरझा गई खिलने से पहले ही।

मैं उल्लास थी वसंत का
लेकिन तुमने चाहा तो मैंने
अपने सारे रंग तुममें घोलकर
पतझड़ की वसीयत अपने नाम करा ली।

मैं दुर्गा थी शक्ति स्वरूपा
लेकिन तुमने चाहा तो मैंने
अपना रूप तुम्हारे अनुरूप किया
और कमनीय कामिनी बन गई।

इन सबके बदले मैंने 
सिर्फ़ इतना ही चाहा
कि तुम सिर्फ़ मुझे चाहो
लेकिन तुमसे ये भी न हो सका..!

4- अब जाने हम-तुम कहां मिलेंगे

तुम्हें याद है न
आम का वो बाग़
जहां तुमने मुझे पहली बार
बुलाया था मिलने के लिए
तुम्हें याद है न...!

वो मदमाता बसन्त था और
तुम उस पेड़ के नीचे बैठी
अपना दुपट्टा उंगलियों में उलझा रही थी,
तुम्हारी देह से आम के बौर की महक आ रही थी।
हम दोनों बाग़ में उस आम के पेड़ के नीचे
घन्टों बैठे रहे चुपचाप
एक-दूसरे की गंध में खोए
महसूसते रहे एक-दूसरे को
उस आम के पेड़ के नीचे...।

जानती हो !
वो बाग़ उजड़ गया
उन्होंने काट डाले सारे पेड़
उस पेड़ को भी नहीं छोड़ा
जिस पर तुमने बांधा था
हमारे प्रेम के रंग में रंगा
एक रेशमी धागा...।

उन्होंने एक बार भी न सोचा
उसे बेरहमी से काट डाला
और वहां खड़ा कर दिया
काला-विषैला धुआं उगलता
एक विशालकाय कारखाना।

जब वो बाग़ रहा ना वो पेड़
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
गांव के बाहर बहती-बलखाती
वो बरसाती नदी।
अक्सर साँझ ढले जिसके किनारे
मेरे आमंत्रण पर मुझसे मिलने तुम आती थीं।
जानती हो, वही नदी अब नहीं रही...!
उसकी अकाल मौत हो गई
उन्होंने घोंट डाला नदी का गला।
धीरे-धीरे पाट डालीं झीलें, मिटा दिए तालाब
और वहां खड़ी कर दीं ऊंची अट्टालिकाएं।

जब वो नदी रही ना उसका किनारा
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
वो सर्पीली पगडंडियां, वो लहलहाते खेत,
सरसों के खिलखिलाते पीले फूलों पर टिकी ओस
जिन्हें अलसुबह एक-एक कर हमारी आँखें चुनती थीं,
नील गगन को तकते-तकते जीवन के सतरंगी सपने बुनती थीं।
जानती हो, अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा..!
उन्होंने ख़त्म कर दिए खेत
बेच डाली फूलों की मुस्कान, खेतों की हरियाली
और वहां तान दिए बेजान मकान।

जब वो खेत रहे ना सरसों के फूल
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
वो गर्वीला-विशाल पहाड़
जो सूरज ढलने पर अक्सर
हमको पास बुलाता था
अपनी बूढ़ी आंखों से जो
हम पर नेह बरसाता था।
वही जिसने हमें बताया था,
अपनी उस कंदरा का पता
जहां हजारों-हजार साल पहले
उसने ही आदिम प्रेम को दी थी जगह।
वहीं जहां बहते उस झरने ने
हमें प्रेम का आदिम राग सुनाया था।
उस निविड़-शांत-एकांत जगह पर
प्रेम करना प्रकृति ने हमें सिखाया था।

जानती हो, अब वो सब कुछ नहीं रहा...!
उन्होंने बारूद लगाकर उजाड़ दिए पहाड़
जिन्दा पहाड़ को तोड़-तोड़कर
राजधानी में बनवा दीं निष्प्राण प्रतिमाएं।
जो भी सत्ता में आया,
अपने पुरखों की निशानी के लिए,
बेचारे पहाड़ को ही निशाना बनाया।

उन्होंने ख़त्म कर दिया सब कुछ
बाग़-बग़ीचे, नदियां-तालाब,
खेत-हरियाली, जंगल-पहाड़।
हमारे प्रेम से जुड़ी सारी स्मृतियां
तहस-नहस कर डालीं।
बंद-बेजान कमरों के सिवाय
कोई जगह नहीं छोड़ी प्रेम के लिए...।
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

 

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