अभी तो दुनिया में अन्धेर है

जयप्रकाश मानस

एक कवि की डायरी : किस्त 7

29 अगस्त, 2015

अभी तो दुनिया में अन्धेर है

दिन कब का ढल चुका है, जबकि मेरे भीतर हेमंत दा का स्वर गूँज रहा है, प्रदीप का यह अमर गीत, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल का लाजबाब संगीत के साथ, जो मेरे जन्म से 2 साल पहले ‘हरिशचन्द्र तारामती’ के लिए लिखा गया…जगत भर की रोशनी के लिए, करोड़ों की ज़िंदगी के लिए, सूरज रे जलते रहना, सूरज रे जलते रहना….

 

पोखर किनारे बैठकर

आप मिलेंगे मेरे बिलकुल नये दोस्त से ? दोस्त नहीं, नाराज़ हो उठेंगे वे । छोटा भाई कहिए!सुदूर असम के जोरहाट में घर है उनका। हिंदी के अनन्य प्रेमी युवा । ग्रेजुएट हैं । बढ़िया हिंदी बोलते, समझते हैं । नाम है मनोज बोरोदोलोई । बड़े ही उदार विचार के धनी । जीवन यापन के लिए कपड़ों की एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं । बाक़ी समय देश के कवियों से बतियाते रहते हैं । बिहू के बढ़िया वादक, नृत्यकार और गायक ।

 

मैंने कहा – “भाई, यह तो मेरा सबसे प्रिय संगीत में से है, सुनाइए  ना….!”तो झट वे गुनगुना उठे – असम का सबसे पुराना बिहू गीत….और मेरा रोम-रोम पुलकित…हयने आईता न-कछारी चारि गाँवर दाव कटारी बरि गाँवर तामौले  पाणे आइता रहिमला रोइ रोइ धेमालि करो

 

वे बताते हैं – ”असमिया लोगों के घर जाने पर वे सर्वप्रथम मेहमान को पान, ताम्बूल ही पेश करते हैं। प्रत्येक घर में पान-तामूल रखने का पीतल का ‘सोराइ’ बर्तन होता है। तालाब पोखरों में बंसी (कांटा) फँसाकर मच्छियाँ मारना यहाँ आम ग्रामीणों की दिनचर्या है। ”

 

तो सुंदर संयोग यह भी कि मुझे अगले माह ही उनके हाथ से पान खाने का सुअवसर मिल रहा है और उनके साथ किसी पोखर किनारे बैठकर मच्छियों को देखने का भी ।संभव हुआ तो बिहू गीत सुनना भी ।

 

बहनें, जो सगी नहीं थीं

रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने डाली थी, जो सगी नहीं थीं । रक्षाबंधन जुड़ता है सिंधु घाटी की सभ्यता से । 6000 साल पहले । याद करें आज बहन रानी कर्णावती और भाई सम्राट हुमायूं को, भाई कृष्ण और बहन द्रोपदी को….

 

आज बहनों से दूर हूँ किन्तु बहनें हैं मेरे ही पास……

 

नई भाषा

साहित्य मूलतः एक ‘नई’ भाषा है।

 

सिर्फ पत्नी नहीं थी रत्नावली

जिस रत्नावली ने तुलसीदास को महाकवि बना दिया, उसे लगभग सभी केवल तुलसी की सहधर्मिणी के रूप में जानते हैं । मूर्धन्य साहित्य मनीषी डॉ. धीरेन्द्र वर्मा और रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘हिंदी साहित्य कोष’ में भी उन्हें केवल ‘तुलसीदास की पत्नी’ से अधिक कुछ भी नहीं बताया गया है ।सच्चाई यह है कि रत्नावली शास्त्र, व्याकरण और पिंगल शास्त्र की ज्ञाता थीं। एक विदूषी और संवेदनशील कवयित्री भी । वह दोहे लिखा करती थीं । एक-दो दोहे ये रहे –

अनजाने जन को रतन, कबहुँ न करि विश्वास

वस्तु न ताकि खाई कछु, देही न गेह निवास ।

पाँच तुरंग तन रथ जुटे, चपल कुपथ लै जात

रत्नावली मन सारथी ही, रोकि सकै उत्पात ।

 

और यह तो पता ही है –

 

अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीति

होती जो अस राम सों, होती न तव भव भीति ।

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