आत्मसंघर्ष के महत्वपूर्ण कवि तेजिंदर गगन

सुशील कुमार

“यह कविता नहीं
एक बयान है कि
अब चिड़िया को कविता में
आने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

चिड़ियां, पेड़, बच्चा और मां
– इनमें से कोई भी नहीं आएगा
कविता में
यहां तक कि कविता भी नहीं ।

समय के ऐसे दौर में
जब बादशाह खाता है रेवड़ियाँ
और बाँटता है टट्टी,
मैं हैरान हूं कि
तुम्हें पेड़ और बच्चे याद आ रहे हैं।” (कविता ‘बयान’ का अंश/ तेजिंदर)

आज आपका परिचय मैं एक ऐसे कवि से कराता हूँ जिन्हें आप उपन्यासकार-कहानीकार के रूप में तो जानते होंगे पर शायद कवि के रूप में नहीं। अगर जानते भी हों तो उनकी कविताएँ संभवत: नहीं पढ़ी होंगी। (क्योंकि सोशल मीडिया या ब्लॉग पर उनकी कविताएँ उपलब्ध नहीं, न ‘कविताकोश’ में ही किसी ने लगाई, और पुस्तक भी फिलहाल उपलब्ध नहीं।) यह हिन्दी साहित्य की विडम्बना ही कही जाएगी। इस वरिष्ठ साहित्यकार का नाम है – श्री तेजिंदर (गगन)। पैंसठ वर्षीय तेजिंदर गगन जी के अब तक चार उपन्यास, दो कहानी संग्रह, एक डायरी, एक जीवनी और एक कविता संग्रह “बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ (1997) आ चुके हैं। कहना चाहूँगा कि मुक्तिबोध, धूमिल और कुमार विकल की काव्य-परंपरा के अत्यंत दृष्टि-सम्पन्न कवि श्री तेजिंदर पिछले तीस वर्षों से ऊपर लेखन-कार्य में रत हैं।
अक्सर यह देखा जाता है कि स्पष्ट पक्षधरता और विचारधारा के बावजूद आजकल खराब कविताएँ भी प्रभूत मात्रा में लिखी जाती हैं, गोया कि परिदृश्य में विचारधारा मात्र के प्रबल पूर्वाग्रह से युत खराब कविताओं की भरमार है। इस स्थिति में तेजिंदर की कविताएँ प्रतिबद्ध विचारधारा के साथ सर्जनात्मक प्रतिभा और काव्यात्मक सार्थकता का बखूबी भान कराती है – वस्तु और रूप दोनों स्तरों पर- और अपना प्रतिमान भी खुद बनाती हैं। ऐसी कविताओं को आलोचकों के प्रतिमानों की जरूरत न हुई , न कभी होगी। कवि की पक्षधरता से आप उनकी कविता के प्रतिमान को स्वयं भलीभाँति समझ सकते हैं। मेरी दृष्टि में इनकी कविताएं संघर्ष और विद्रोह की अनुपम कविताएँ हैं – संघर्षरत, युद्धरत, बेचैन मनुष्य की खालिस कविताएँ। तेजिंदर जी के यहाँ यह संघर्ष जीवन और कविता दोनों स्तरों पर मौजूद है। यहाँ कवि केदारनाथ सिंह या उदय प्रकाश की कविताओं की तरह कोई ‘ड्रामेबाजी’ या ‘फैंटेसी’ का स्वप्नलोक नहीं, बल्कि सीधी सपाट शैली में बिंबों के नायाब प्रयोग से कविताएँ बनावट और बुनावट में समाज के आंतरिक यथार्थ को खोलती हुई इतनी सघन अर्थ-स्फीतियाँ रचती हैं कि पाठक कवि की ‘कहन के जादू’ से स्वयं सम्मोहित हो जाता है – ‘घास खाकर बिच्छू उगलना’, ‘पेड़ और माँ की वर्दी में सामंती क्रूर चेहरों का रूप बदलना’ और ‘गिद्ध पर कविता लिखने की कवि की जरूरत का महसूस होना’, आदि कुछ ऐसे ही अद्भुत बिम्ब आप उनकी ‘बयान’ कविता में आगे देखेंगे –
“तुम लिखो यह बयान कि
इस शहर में अब सिर्फ
उन्हीं बच्चों को पैदा होने की छूट दी जाएगी
जो हाथों में तीर कमान लिए पैदा होंगे ।

हम युद्ध के मैदान में है इन दिनों।
यह समय मां और चिड़िया को याद करने का नहीं
घास खा कर
बिच्छू उगलने का है।

वे वर्दियों में है तरह-तरह की
मैं स्पष्ट कर दूं कि
वह पेड़ और माँ की
वर्दी में भी हो सकते हैं
उन्हें पहचानने के लिए
जरूरी है कि
तुम गिद्ध पर कुछ लिखो इन दिनों।”

कहना न होगा कि तेजिंदर जी की कविताएँ देर तक स्मृति में इसलिए भी टिकती है कि अपने संघर्ष या जद्दोजहद में वे बड़बोलेपन का रास्ता अख़्तियार नहीं करते, जो तुरत-फुरत क्रांति चाहने वाले विद्रोही कवियों की प्रदर्शनप्रियता का हिस्सा हो, बल्कि मानव मन को झंकृत कर उसकी संवेदना के भीतर एक भावोद्वेलन पैदा करती हैं। कवि का यह आत्मसंघर्ष घर, परिवार, गाँव, शहर, सड़क, खेत आदि आदमी की रोज़मर्रा की जरूरतों की किल्लत से गुजरता हुआ एक व्यापक जन-विद्रोह का आकार लेता है; जो जाहिर है, ममत्व और प्रेम की कोख से ही पैदा होता है –
“यह कविता नहीं
एक बयान है कि
अब कविता में चिड़िया को
आने की इजाजत नहीं दी जाएगी
न ही पेड़, बच्चे और मां को।

इन शब्दों के अर्थ में
हमारी समूची दुनिया है
और वे उन्हें हमसे छीन ले जाना चाहते हैं।

ये तमाम शब्द हमें संभाल कर रखते हैं
लड़ाई जीत जाने के बाद
प्यार करने के लिए लिए ,
इसलिए कविता में इनका इस्तेमाल
फिलहाल, वर्जित घोषित किया जाता है।”´( ‘बयान’ कविता का अंतिम अंश )
कवि कुमार विकल की तरह तेजिंदर मानवीय संघर्ष की कठिन प्रक्रिया से पूरी तरह भिज्ञ हैं, इस प्रक्रिया में वे मूल मानवीय रागात्मकताओं और सहज जीवनासक्ति को नहीं भूलते, बल्कि उसका हिस्सा बनकर संघर्ष में शामिल होते हैं। यही आधुनिक कविता के लिए बड़ी बात है जो उसे जीवंत बनाती है। ‘नई कविता’ के साठ के दशक के अस्तित्ववादी कवियों की तरह तेजिंदर गगन अनास्था, कुंठा, संत्रास, अजनबीपन, परायेपन और मानवीय रिश्तों के भग्नावशेष पर निस्सहाय होकर अपना काव्य-मुहावरा नहीं बनाते हैं, बल्कि ज़िंदगी की टूटन और तकलीफ़ों से लड़ने के लिए अपनी मुहावरा को ताकत देते नजर आते हैं। इस कारण उनकी कविताओं का आवेग हमेशा एक जीवित समाज को लक्ष्य करता है –
“तुम्हारी यह गर्वीली हंसी मुझे बहुत प्यारी लगती है
सोजेलिन खाखा
और मैं तुम्हारे हाथ थामना चाहता हूं
तुम्हारा माथा चूमना चाहता हूं
इसलिए नहीं कि तुम्हें मेरी जरूरत है
और मैं तुम पर कृपा करने आया हूँ
बल्कि इसलिए कि
तुम भूख के घराने का सबसे सुंदर राग हो

तुम्हारी हथेलियों से मुझे डर भी लगता है
क्योंकि मेरे भीतर अपराध-बोध का
एक शहरी कैक्टस है
और मैं अपना चेहरा छिपा लेता हूं बार-बार
तुम्हारी देह, तुम्हारी आवाज, तुम्हारा मौन, तुम्हारे हाथ –
मुझे अच्छे लगते हैं
क्योंकि ये सब
भूख के विरुद्ध तुम्हारी लड़ाई के अलग-अलग हथियार है।
– कवितांश “समझदार होती आदिवासी युवती के लिए” / तेजिंदर
सच में मुझे तेजिंदर की कविताएं पढ़ते हुए बार-बार कुमार विकल की याद आती है – ‘जनता एक बहुमुखी तेज हथियार है
जो अकेली लड़ाइयों को आपस में जोड़ता है (कविता ‘मिथक’ / कुमार विकल) •

जीवन की छोटी-छोटी बातों पर कविता लिखना आसान काम नहीं। कविता बड़बोलेपन , भद्रलोकाचरण और आभिजात्य संस्कारों से टूटती है , अपनी असली ताकत, अर्थ और क्षमता को खोती है, जबकि अपनी अनगढ़ता और श्रमशील लोकजीवन से वह नई ऊर्जा और ताकत ग्रहण करती है। बक़ौल मुक्तिबोध, “यह सही है कि जीवन के छिटपुट चित्रों में भी भाव-गंभीरता है तथा सच्चाई होती है (नहीं भी होती है)। फिर भी उससे संतोष नहीं हो पाता। कुछ और चाहिए, और, और, ! – वह चाहिए जो जीवन को उसकी समग्रता में, उसकी सारी विशेषताओं सहित, प्रकट करे। केवल छिटपुट प्रयत्नों में (और उसकी वाहवाही) अब मजा नहीं आता। इसलिए कुछ लोग खोज पर विश्वास करते हैं। सतत अन्वेषण, सतत अनुसंधान के पथ का नाम लेनेवाले लोग कम नहीं। किन्तु अनुसंधान और अन्वेषण का थियोंराइजेशन (theorization, केवल विचारणा, केवल सिद्धान्त-स्थापना) ही किया जाता है। अधिक से अधिक, वह आत्मान्वेषण और आत्मानुसंधान बनकर रह जाता है, जिसके आवेग में दो-चार, पाँच-दस, दस-बीस कविताएँ बनाकर मामला ठप्प हो जाता है। और ऐसी कविताओं में आवृति, पुनरावृति, आवृति-पुनरावृति। फिर वही दुष्चक्र चालू। संक्षेप में, एक घेरा बन जाता है, उसमें से निकलना मुश्किल है। (‘नई कविता: निस्सहाय नकारात्मकता’/ पुस्तक: डबरे पर सूरज का बिम्ब /पृ सं -69)।“
मुक्तिबोध की उपर्युक्त बातों के परिप्रेक्ष्य में कुमार विकल और तेजिंदर की कविताओं को एक ही कोण से देखना बहुत रुचिकर होगा , क्योंकि इनकी कविताएँ अक्सर छोटी दुनिया की उन छिटपुट चीजों से बनी होती है जिस पर प्रायः हम अन्यमनस्क रहते हैं या कम ध्यान देते हैं। इन कम महत्त्व की चीजों में मानवीय सरोकारों को खोजना और उसे मूर्तिमान करना दोनों कवियों का अभिलक्षण है जो अपने जीवन के अनुभवों का कच्चा माल कविता की पूंजी की तरह ‘इन्वेस्ट’ करते हैं। जीवन के यथार्थ-चित्रों को कविता में बिलकुल अनौपचारिक-स्वाभाविक तरीके से रखना और उसे उनके अंतर्द्वंदों, अंतर्विरोधों और बाह्यांतर दबावों के बीच न्यस्त कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने में दोनों कवियों का ख़ास फ़न हासिल है! आप देखेंगे कि नेपथ्य से यानि परिदृश्य में कहीं दूर से अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करना इनकी कविताओं का मूल मकसद होता है।
संदर्भवश पहले कुमार विकल की एक कविता “खिड़कियाँ”देखिए –
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं /उनमें रहने वाले बच्चों का /सूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है?/ सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान—सा लगता है/ जो किसी सुदूर शहर से/ कभी—कभार आता है/ एकाध दिन के लिए घर में रुकता है/ सारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है/ और जाते समय/ उन सबकी मुठ्ठियों में/ कुछ रुपये ठूँस जाता है।“
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/वहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती है/जैसे किसी बच्चे के बीमार पड़ने पर/ माँ की कोई सहेली मिजाजपुर्सी के लिए तो आती है/ किंतु घर की दहलीज़ से ही/ हाल पूछ पर चली जाती है।“
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/वहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा—/कुछ इस तरह से होती है/जिस तरह राखी के कुछ दिनों बाद/घर के सामने से/पोस्टमैन के गुज़र जाने के बाद/पहले पोस्टमैन को कोसती है/बाद में रसोई में जाकर/अपने भाई की मजबूरी समझ कर/बहुत रोती है।“
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/ उनमें रहने वाले बच्चों का /चाँद के साथ रिश्ता किस तरह का होता है /वह उन्हें अद्भुत चोर–सा लगता है/जो हर रात किसी गुप्त दरवाजे से आता है /उनके हिस्से की रोटियाँ चुराके ले जाता है।“ – कविता ‘खिड़कियाँ’ /कुमार विकल
यथार्थ और जीवन-संघर्ष की इन्हीं कौतुक-वृतियों से पगी अब तेजिंदर जी की एक कविता – ‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ को देखिए –
“बच्चे अलाव ताप रहे हैं
भरी ठंड में

बच्चे आग से नहीं डरते
आग की तपिश है
उनके चेहरों पर

आग का रंग क्या होता है
मैं उनसे पूछता हूं
भरी ठंड में ताप उनके चेहरों पर है
और वे जवाब देते हैं
आग का रंग ताप होता है

बच्चों को ताप से डर नहीं लगता
वे कहते हैं – आज से हमारी दोस्ती है
जो ताप बन कर
हमारे भीतर उतरती है
और फिर
अलग-अलग आकृतियों में
बाहर निकलती है
कभी गिल्ली-डंडा बनकर
और कभी टप्पे खाती गेंद की तरह ।

बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और उनके चेहरों पर ताप है
टप्पे खाता हुआ ।

मैं हैरान हूं कि हूं कि
वे उस ताप से खेलते हैं
जिसे छूते ही
मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं

मैं वापिस बच्चा बनना चाहता हूं
और सड़क किनारे
बच्चों के साथ बैठ
अलाव तापना चाहता हूं
वहीं सड़क के उस मोड़ पर
जहां बच्चे भी ठंड में
अलाव ताप रहे हैं ।

अलाव तापते बच्चों की आंखों में
शेर की आंखें हैं
सुंदर और आदिम
आने वाली दुनिया
इन्हीं आंखो पर टिकी है
टेलीविजन के पर्दे पर
या चिड़ियाघरों में कैद शेर देखने वाले बच्चे
जल्दी अंधे हो जाएंगे
बच्चे अगर बचेंगे, तो वही
जो शहरी किनारे, गांव की चौखट पर
भरी ठंड में
अलाव ताप रहे होंगे ।

खत्म हो जाएंगे
बंधुआ और छद्म शेर बच्चे
खत्म हो जाएंगे, वे भी
जो खुरदुरे नहीं हैं
पिघल जाएंगे उनके चेहरे जल्द
जिन्हें अलाव तापने की आदत नहीं ।

बचेंगे केवल वे ही
जो लाल हैं
आग और ईंट की तरह ।

गाँव की चौखट पर
बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और मैं आश्वस्त हूँ कि
इतनी जल्दी खत्म नहीं होंगी
यह दुनिया।“ (‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ / तेजिंदर)
आप गौर करेंगे कि दोनों कवियों की कविता में बच्चे उपस्थित हैं। कुमार विकल जिस तरह सूरज-चाँद, खिड़की, रोशनी, राखी, चिट्ठी, आदि लोकजीवन के मर्मस्पर्शी संदर्भों से जुड़कर आदमी की आर्थिक तंगी और विपन्नता का गहन बोध कराते हैं, आभिजात्य सौंदर्य से अलग लोकचेतना की वर्गीय अभिव्यक्ति को उभार और नई दृष्टि प्रदान करते हैं, उसी प्रकार तेजिंदर भी भरी ठंड में बच्चों के अलाव तापने की बात कर हमारी संवेदना को बहुविध रीति से उद्वेलित करते हैं। सृजन की अंतर्वस्तु और उसके आत्मसंघर्ष में दोनों कविताओं में गहरा अंतर होते हुए भी दोनों में प्रकट वर्गीय वैशिष्ट्य देखने के लायक है।
तेजिंदर की कविता में दार्शनिक उठान अधिक है तो कुमार विकल की कविता में काव्यानुभव और सौंदर्य अधिक। तेजिंदर कहते हैं कि ‘मैं हैरान हूं कि हूं/ कि वे (बच्चे) उस ताप से खेलते हैं / जिसे छूते ही / मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं’। – इन पंक्तियों की लक्षणा कितनी बेधक है ! अलाव का ताप तेजिंदर के बच्चों में भीतर से उठता हुआ अगल-अलग आकृतियों में बाहर आता है, मसलन गिल्ली-डंडे या टप्पे खाते गेंद की तरह। पर यह कवि की विनोदप्रियता का हिस्सा मात्र नहीं , बल्कि उस ताप को पाने के लिए तेजिंदर का कवि फिर से बचपन में लौटना चाहता है। यहाँ अलाव का ताप जीवन को बचाने का ताप है – ‘बच्चे अगर बचेंगे तो वही/जो शहर किनारे, गांव की चौखट पर / भरी ठंड में / अलाव ताप रहे होंगे’ – कविता में अंतर्द्वन्द्वात्मक संघर्ष उन बच्चों के ताप से है जो अभिजात वर्ग से आते हैं, जो कि समाज का लघु-वर्ग है, यानि सुविधा-सम्पन्न वर्ग। जो बच्चे शहर के किनारे और गाँव की चौखटों पर कड़ी ठंड मे अलाव ताप रहे , उनके ही चेहरे के ताप, आँखों की लाल चमक और खुरदुरे चेहरे में कवि को अपनी दुनिया बचाने की उम्मीद कायम है। दोनों कविताएं अपनी-अपनी तरह से समाज की वर्गीय ढांचों के अतर्विरोध को पूरी काव्यात्मक सार्थकता के साथ व्यक्त करती नज़र आती हैं ।
कहना न होगा कि दोनों कवियों ने इन कविताओं में मिलता-जुलता गहन लोकचेतस काव्यविवेक का इस्तेमाल किया है जो भिज्ञ यथार्थ को काव्यात्मक बनाने का ‘सायास प्रयत्न’ भर नहीं प्रतीत , न कविता को तराशता या परिष्कृत करता है, बल्कि अपनी अनगढ़ शिल्प के साथ पाठकों की चेतना में धँसने का उपक्रम करता है और इस क्रिया-व्यापार मे सफल भी होता है।
आमजन की बेबसी, लाचारी के बीच उसकी ईमानदारी और मानवीय लगाव का बना रहना, जनता के सुख-दुख में अटूट हिस्सेदारी, साहस, सहृदयता, जनप्लावित करुणा आदि कुछ ऐसे काव्येतर मूल्य हैं जो कविता में लोकचेतना को बिलकुल नई अर्थवत्ता और प्रखरता देते हैं । इसको गतिशील करने में कवि के सघन इंद्रियबोध और जीवनानुभव का भी उतना ही अप्रतिम योगदान है। इनके वगैर कोई कवि साधारण जीवन की अच्छी कविताएँ लिख ही नहीं सकता। संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए आप महसूस करेंगे कि इसी को पाने के लिए तेजिंदर का कवि बेचैन है। यह उनके आत्मसंघर्ष का एक अहम पहलु है जो उनकी कविताओं को पठनीय व जनोपयोगी बनाता है। इसके उलट, कविता के सुनिश्चित प्रतिमानों में ढली खास शैली और काट की कविताओं में इस तरह का आकर्षण नहीं होता, न देर तक पाठक के जेहन में ही ठहर पाती हैं। आज कवि के आत्मसंघर्ष से व्युत्पन्न इस तरह की लोकचेतना सिक्त कविताओं की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है जहाँ जोर काव्यात्मक मूल्यों से अधिक मानवीय मूल्यों पर हो और जो बहुत पीछे से कविता में आकर पाठकों की संवेदना से नैतिकतापूर्ण आग्रह के साथ गहराई से जुड़ेे और भीतर तक उसे आलोड़ित भी करे। (क्रमश:…जारी..)●
© सुशील कुमार /0 9006740311
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कृतियाँ : उपन्यास 1.वह मेरा चेहरा (1990) 2.काला पादरी (2000), 3. हेलो सुजित (2004),4.सीढ़ियों पर चीता (2010) , डायरी-सागा सागा 2005 ,टिहरी के बहुगुणा ,जीवनी 2011 । कविता संग्रह : बच्चे अलाव ताप रहे हैं(1997) दो कहानी संग्रह : ‘घोड़ा बादल (1994)और क्या तुम नहा चुके ? 2014

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