आराधना सुमन की कविता ‘नाजायज’

नाजायज शब्द बड़ा “नाजायज “लगता है मुझे
क्योकि अक्सर ये वहाँ प्रयोग होते है
जो जीवन का पवित्र मन्त्र है
उच्चारण है आवाहन की
जीवित जीवन की सुंदरता की ….

नाजायज रिश्ते की परिभाषा नहीं मिलती
एक दाग धब्बा को कहकर लोग निकल
लेते है…..!
हर रिश्ते मे मौजूद लोग खुद निर्धारित करें
बिना किसी पूर्व आधारित परिभाषा को सोचे
शायद ऐसा कोई रिश्ता न मिले
और जो मिला गौर से समझना
वो पूर्व बनी अवधारणा है
हमारे विचार नही
रिश्ते नाजायज नही होते है…सोचे होती है!!

चलो मान लिया गर रिश्ते नाजायज भी हुए
कौन सी कसौटी और किस अवधारणा से
बच्चे नाजायज हुए….?

“बच्चे और बचपन कभी नाजायज नही होते”

नाजायज शब्द नही
नाजायज सोच से बचने के प्रयास जरूरी…!

 

You may also like...

Leave a Reply