उजाले की संभावना तलाशती कहानियां

किताब

कहानी संग्रह : बबूगोशे

लेखक : स्वदेश दीपक

प्रकाशक :   जगरनॉट बुक्स

मूल्य : 250 रुपए

सत्येेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

इस साल 7 जून को कथाकार स्वदेश दीपक की गुमशुदगी के ग्यारह साल पूरे हो गए। इन ग्यारह सालों  में उन्हें चाहने वाले ठीक वैसे ही बेचैन रहे, जैसी बेचैनगी उनके किरदारों में दिखती है। एक ऐसी बेचैनी, जिसका कोई अन्त नहीं। अपने कथ्य और शिल्प से तूफ़ान मचा देने वाली कहानियों के लेखक स्वदेश दीपक की अंतिम और अप्रकाशित कहानियों का नया संग्रह ‘बगूगोशे’ ऐसे चाहने वालों के लिए किसी सौगात से कम नहीं।

इस संग्रह में कुल आठ कहानियां हैं—‘बगूगोशे’, ‘बनी-ठनी’, ‘काला पगोडा’, ‘गन्ने वाला’, ‘घुड़चढ़ी’, ‘प्लेटफार्म पेड़ और पानी’, ‘मैं घर में नहीं हूं’ और ‘समय खंड’। समय खंड उनकी अधूरी कहानी है।

बीमारी की वजह से 1991 से 1997 तक दुनिया से कटे रहने के बाद स्वदेश दीपक जब वापस लौटे, ये तब की कहानियां हैं। उनकी वापसी के बाद की इन कहानियों में उन सात सालों की तड़प, अंधेरा, यातना खूब झलकते हैं। इनमें कल्पना की मिठास है तो सच्चाई की कड़वाहट भी है, रिश्तों के स्याह रंग हैं, तो मुर्दा व्यवस्था पर व्यंग्य भी। ऐसे ही व्यंग्य की एक मिसाल देखिए—“सारे गांव के लोग इस बात पर एकमत हैं कि दिल्ली से डरना चाहिए और वह यह अशब्द प्रार्थना ज़रूर करते रहते हैं कि प्रभु जी दिल्ली से उनकी रक्षा  करें।” (प्लेटफार्म, पेड़ और पानी)। इस कहानी में गांव के लोगों की राजनीतिक चेतना शून्य है लेकिन वो दिल्ली की ताक़त को समझते हैं। इस संग्रह की कहानियों में व्यवस्था पर इस तरह के करारा व्यंग्य खूब मिलेंगे।

‘काला पगोडा’ कहानी राजनीति पर स्वदेश दीपक की मजबूत पकड़ को दिखाती है। यह कहानी बताती है कि स्वदेश सियासी शतरंज खेलने वाले नेताओँ के हर दांव, हर चाल से कैसे वाकिफ़ थे। इस कहानी में जहां एक ओर राजनीति का चरम पतन दिखता है, तो वहीं प्रतिरोध का चरम उत्कर्ष भी। देश की जड़ व्यवस्था के हर पहलू पर बड़ी ही करारा चोट करती है यह कहानी। ‘घुड़चढ़ी’ कहानी में इस बात का चित्रण बड़े ही प्रभावी ढंग से किया गया है कि हाशिए पर पड़े लोगों को झूठे सपने दिखाकर सियासतदान किस तरह उनका इस्तेमाल करते हैं।

स्वदेश की कहानियों में महिला किरदार जिस बोल्डनेस के साथ सामने आती हैं, वो केवल चौंका देती है बल्कि कभी कभी हताशा और क्षोभ में डूबे नायक को अंधेरे से निकाल कर रोशनी में भी लाती हैं। चाहें वो ‘बबूगोशे’ की मां हों,  ‘काला पगोडा’ की अंकुश या गरिमा सान्याल हों या फिर ‘मैं घर में नहीं हूं’ की सरयू राणा। अगर ये महिला किरदार अगर ऐसी ना होंती तो शायद अंधेरे में उजाले की संभावना की पड़ताल अधूरी ही रह जाती।

इस संग्रह की कहानियां अपने कथ्य और शैली से झकझोरती हैं। अंदाज़, संवाद और क्लाइमेक्स ऐसा कि पाठक सन्न रह जाता है। इस कहानियों के बारे में कृष्णा सोबती ने बहुत सही कहा है, “ऊपर से शान्त और एकसार दिखने वाली सतह को स्वदेश दीपक इस तरह उधेड़ते हैं कि भीतर का सारा विद्रूप, सारी दरारें और बदसूरती साफ़ दिखने लगती है।” जिन्हें अच्छी कहानी की तलाश रहती है, उन्हें इस ‘बबूगोशे’ के स्वाद से बिल्कुल वंचित नहीं रहना चाहिए।

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