एक कवि की डायरी : भाग 2

जयप्रकाश मानस
संपादक,

www.srijangatha.com
कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक)
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा
रायपुर, 

9 अप्रैल, 2011

ज़िम्मेदारी

अन्ना ने जीतना सिखा दिया, अब यह करोड़ों लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे ना तो ख़ुद भ्रष्ट हों, ना दूसरे को भ्रष्टाचार करने दें, आयेगी यह नैतिकता क्या सारे लोगों में ?

आप व्यक्तिगत तौर पर अभी तक कितने बार रिश्वत ले चुके हैं ? या अपना काम कराने के लिए कितनी बार रिश्वत दे चुके हैं ? औरों के रिश्वत लेने और देने की बात सुनकर इससे पहले कब कब उन्हें सबक सिखाने के लिए कुछ ख़ास कर गुजरे हैं ? या फिर रिश्वतखोरी के विरोध या समर्थन में अब तक तटस्थ बने रहे हैं ? यदि आपके व्यक्तिगत स्तर पर इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है तो आज आप ख़ुद को क्या कहलाना पसंद करेंगे ? टीम अन्ना के सदस्य ? टीम सरकार के सदस्य ? या कुछ और ही टीम के सदस्य ?

अख़बार से पता चला –

रामलीला मैदान में गांधी टोपी, टी शर्ट, तिरंगा आदि अनाप-शनाप रेट पर बिके । अन्ना टीम का कोई भी सदस्य वहाँ हो रहे इस भ्रष्टाचार पर कुछ नहीं बोला है... कौन बोलेगा फिर....

बिकने का मतलब

बिक जाना यानी सिर्फ़ चांदी के खनकते सिक्कों से बिक जाना नहीं होता । कई बार हम अपनी उथली भावनाओं, मूर्खताओं, जड़ताओं, कुंठाओं, अकारज अंहकार और जिद्दी की गिरफ़्त में आकर भी मन और विचार से इतने दरिद्र और दयनीय हो जाते हैं कि हमें बिकने की ज़रूरत नहीं होती और हमें पता भी नहीं लगता कि हम बिक चुके हैं । क्या 'बिकना' इसे नहीं कहते ?

कैसे लोग हैं ये ?

कुछ लोग भारत की बहुलता को स्वीकारते हैं किन्तु वे सारे देश, मनुष्य, उसके विचारों, जीवन-शैली को एक ही और सिर्फ़ एक ही विचारधारा या सिंद्धांत से हाँकना चाहते हैं । कैसे लोग हैं ये ?

5 सितंबर, 2011

कैसे तय होगा ?

एक बार अकाल पड़ गया । लोग हाहाकार । सभी प्यास मिटाने नदी के पास पहुँचे । नदी ने कहा - "मित्रो ! मुझमें किसी एक की प्सास बुझाने लायक जल बचा है । आप लोग तय कर लें कौन जल पीयेगा ?"

सबने कहा - “नहीं । हम बाँटकर पीना चाहते हैं ।”

नदी ने शंका जाहिर की – "चुल्लू भर जल और यह सदिच्छा ?"

भूखे-प्यासे लोग आगे बढ़ गये नदी से मुँह मोड़कर । अब सारे किसी नाले के किनारे डेरा डाल चुके हैं । उस नदी की पीड़ा है कि लोग अब गंदे लाने का जल पीते हैं ।

कैसे तय होगा कि कौन सही नहीं है – नदी या वे लोग ?

 

न विद्यार्थी न शिक्षक

कुछ शिक्षक जीवन भर विद्यार्थी होते हैं और कुछ विद्यार्थी शुरू से ही शिक्षक। कुछ न कभी विद्यार्थी बन पाते हैं ना ही कभी शिक्षक । आख़िर ये कौन लोग होते हैं ?

ख़तरनाक

आस्तिकों से अधिक ख़तरनाक वे भी होते हैं जो सारी दुनिया को नास्तिकता का पाठ पढ़ाते हैं । ऐसे नास्तिकों के घर-परिवार-संबधियों के नाम अक्सर ईश्वर के होते हैं जिनका ये कभी विरोध नहीं किया करते । अंधविश्वास में इन्हें पीर-पैंगबर के दरवाज़े माथा टेकते भी देखा जा सकता है । नज़र लगने के भय से इनकी माएँ-पत्नियाँ लाड़ले को काज़ल भी लगाते हैं । इनमें से अधिकांश ठीक वैसा किया करते हैं जैसे राकेट प्रक्षेपण के समय हमारे वैज्ञानिक किया करते हैं – नारियल फोड़कर, अगरबत्ती दिखाकर ।

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1 Response

  1. राजेश"ललित"शर्मा says:

    जयप्रकाश जी सार्थक डायरी।

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