एक कवि की डायरी : भाग 3

जयप्रकाश मानस
संपादक,

www.srijangatha.com
कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक)
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा
रायपुर, 

18 अक्टूबर, 2011

माँ और घर

माँ आज शाम की ट्रेन से गाँव लौट गयी । घर ख़ाली-ख़ाली नज़र आता है । माँ का रहना घर का भरा-पूरा होना होता है । माँ का रहना घर को होना होता है …. माँ के संघर्ष भरे बीते दिनों की याद आने लगती है मुझे । याद आने लगती है माँ पर लिखी गई मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक, जिसे मुझे भिलाई के एक आयोजन में खुद नरेश मेहता जी से सुनने का सौभाग्य मिला था –

 

माँ

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी-
पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है
गोबर के घर-आँगन,
जो भी
जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,
जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मैथी की भाजी,
जो भी
जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिये निहारता होता है
दूर तक का पथ-
वही,
हाँ, वही है माँ ! !

 

हाट-बाज़ार

बस्तर के हाट-बाज़ार की रौनक दिन ब दिन घटती जा रही है । पहले जैसा नहीं रहा अब बस्तर में दैनंदिन । मुझे अब भी यह साप्ताहिक हाट रह रहकर बुलाता है…

 

7 नवंबर, 2011

पास रहकर भी दूर

इन दिनों क्या लिख रहे हैं? पूछने पर अजित कुमार बताते हैं – “कुछ ललित निबंध लिखे हूँ। कुछ अधूरे हैं, जिन्हें पूरा कर निबंध संग्रह दिल्ली हमेशा दूर प्रकाशन के लिए देने जा रहा हूँ। इसमें मेरे निबंध शामिल हैं, जो सत्ता के क़रीब रहकर जिए और भोगे गए समय को रेखांकित करते हैं। पास रहकर भी दिल्ली मुझसे हमेशा दूर रही । श्रीकांत वर्मा छत्तीसगढ से दिल्ली आकर उसके क़रीब हो गए। कांग्रेस महासचिव तक बने। जीवित रहते तो मंत्री या उपराष्ट्रपति तक बन सकते थे, लेकिन मैं दिल्ली से बाहर फेंका जा सकता हूं। अपने इन निबंधों के ज़रिए मैंने अपने जैसे आम आदमी के सत्ता से दूर रह जाने पर विचार किया है, जो जनवरी तक छपकर आ जाएगा।”

 

खुशी कि बात यह है कि वे अल्पसंख्यक किन्तु गंभीरतम विधा ललित निबंध में लिख रहे हैं…

 

नई किताब

साहित्येत्तर विषयों और ख़ासकर इंटरनेट रिलेटेट हिंदी किताबों का टोटा को देखते हुए विचार उठा कि क्यों ना कुछ किया जाये ताकि अंगरेज़ी नहीं जानने वाले बहुसंख्यक हिन्दी समाज को इंटरनेट आधारित अपराधों से बचने की चेतना विकसित हो । हम तीन लेखकों (साथ में आईपीएस द्वय श्री विश्वरंजन और श्री आर. के.विज) ने मिलकर शुरू किया तो तैयार हो गई कुछ महीनों में एक लोकोपयोगी किताब । प्रकाशक श्री राहुल शर्मा ने हाथों हाथ उठा लिया । छप कर आ गई है किताब – इंटरनेट, अपराध और कानून  । प्रकाशक – यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली ।

 

गाँधी जी का पता

आजकल के गांधीवादियों की प्रसिद्धि पर कल बात हो रही थी । विश्वरंजन जी ने बताया – “भई, गांधी जी जैसे जनप्रिय होना कठिन है । जब ब्रिटेन से किसी ने उनके नाम एक पोस्टकार्ड भेजा, उसमें पते के नाम पर सिर्फ़ मोहन दास करमचंद गांधी, इंडिया लिखा था। इतने पर भी पोस्टकार्ड साबरमती आश्रम तक निर्धारित समय में ही पहुँच गया । इसे कहते हैं गांधी जी का पता ।”

यह पोस्टकार्ड आज भी साबरमती आश्रम में रखा हुआ है… वाक़ई गांधी जी का पता समूचा भारत था । ताज्जुब होता है ना आज…

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