एक कवि की डायरी

जयप्रकाश मानस
संपादक,

www.srijangatha.com
कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक)
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
मो.-94241-82664

23 सितंबर 2009

आम आदमी के पास

ऊर्जा नगरी कोरबा में हाहाकार मचा हुआ है । बुरी-ख़बर से मन व्याकुल है । कोरबा, एनटीपीसी, छत्तीसगढ़ के पावर प्लांट में लगी चिमनी के ढह जाने से सैकड़ों लोगों के हताहत होने की आंशका है । जो मारे गये वे सभी ग़रीब, मज़दूर और मजबूर हैं । जिनके कारण मारे गये वे सब-के-सब पढ़े-लिखे, वैज्ञानिक प्रकृति के लोग । ईश्वर शक्ति दे दुख सहने की परिजनों को । प्रार्थना है मेरी । एक आम आदमी के पास प्रार्थना और शुभकामना के अलावा है भी क्या इस जनतंत्र में ?

दूसरों का रंगारंग

आज मैं शहर से गुज़र रहा था । मैंने उडिया भाषी लोगों की बस्ती में देखा – वे गरबा रास कर करे हैं । मन को सुकुन मिला । इसे ही कहते हैं संकुल संस्कृति। न अपने होने का भान न दूसरों के रंगारंग को अपनाने का संकोच । भारतीयता इसी का तो नाम है । समन्वय और सद्भाव ।

29 सितंबर, 2009

जनता देखती रह जायेगी

रावण फिर नहीं मारा जा सका। राम भले ही इतरा रहे हों भाइयों के साथ । कुछ लोंगो के भीतर वह छुप गया वेश बदलकर । अब के बार कहीं वह दंगा करवायेगा कहीं वह मंदिर ढहायेगा और कहीं मस्ज़िद और कुछ नहीं तो घुस जायेगा संसद में जहाँ सीता फिर चोरी कर ली जायेगी । जनता देखती रह जायेगी । जनता रावण को कभी नहीं पहचानती है ?

चिड़िया है नींद

एक चिड़िया है नींद । उड़ती है तो सुकून हैं । डाल पर बैठ जाती है तो कुछ ना पूछिए । किसी बहेलिया से बहुत डर लगता है इसे । बिखर ना जाये जागने से पहले ही…

28 फ़रवरी 2011

कल श्रीकांत वर्मा की नगरी बिलासपुर, छग में पाण्डुलिपि के तीसरे अंक का विमोचन हुआ । सोहबत रहा – वागर्थ के पूर्व संपादक विजय बहादुर सिंह, अजय तिवारी, रमेश दवे, उद्भ्रांत, रघुवंश मणि त्रिपाठी, श्रीप्रकाश मिश्र, प्रफुल्ल कोलख्यान, श्रीभगवान सिंह, पंकज पाराशर, भारत भारद्वाज, डॉ.देवराज, प्रभात त्रिपाठी, बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ. शैलेंद्र कुमार त्रिपाठी, रमेश खत्री सहित देश के प्रमुख 100 साहित्यकारों का…..

18 मार्च 2011

आलोचना का जल

आलोचना की नदी आज अस्मिता के संकट से जूझ रही है । कहीं उस पर बांध बनाये जा रहे हैं ताकि उसके जल से ख़ास इलाक़ों की सिंचाई कर सकें तो कहीं उसके जल की चोरी हो रही है, तटवर्तियों की अवैध प्यास के कारण । कोई उसमें नौकायन का धंधाकर रहा है, मौज़-मज़लिस को ध्यान में रखकर तो कोई माँसाहारी मछुआरा वहाँ मत्स्याखेट में मगन है । चतुर-चालाक पंडे भक्तों की वृद्धि के लिए अपने-अपने घाट में लठैतों के साथ मुस्तैद हैं …

1 अप्रैल 2011

बुद्धिमान और मूर्ख

कुछ बु्द्धिमान कभी कभी इतने मूर्ख हो उठते हैं कि उन्हें अपने अलावा कोई दूसरा प्रतिष्ठित और बुद्धिमान नज़र नहीं आता । कुछ बुद्धिमान कभी कभी इतने ज्ञानी बन जाते हैं कि उन्हें अपने अलावा दूसरों की मूर्खताओं से कोई लेना-देना नहीं होता ।

अपना पक्ष – पराया पक्ष

कुछ लोग किसी का समर्थन जाने – अनजाने इसलिए करते हैं कि उन्हें कहीं ना कहीं, किसी ना किसी रूप में आंशिक लाभ दिखायी देता है । जबकि वास्तव में वे उनके साथ नहीं होते । इसी तरह कुछ लोग किसी का विरोध जान-अनजाने अपनी पक्षधऱता दिखाने के लोभ में करते हैं जबकि वे अपना पक्ष स्वयं नहीं जानते । उन्हें यह भी नहीं पता होता कि जहाँ वे खड़े हैं वहाँ ज़मीन है भी या नहीं है ।

इतनी मोटी पत्रिका

पांडुलिपि…इतनी मोटी पत्रिका और अक्ल का पिटारा। इतनी बड़ी मेग्ज़ीन किसी ने हिंदुस्तान में देखी है क्या ? नहीं देखी तो देख लो अब….कविताएँ कहानी बचपना लेख सब कुछ इतने सस्ते में । संपादक बधाई के बहुत बड़े पात्र हैं जिसमें सारा संसार समा जाये । पत्रिका को सलाम, संपादक मंडल को सलाम‌ !

क्रमश:

(अगले  शुक्रवार को पढ़ें अगला भाग)

2 comments

  1. एक कवि की डायरी में जयप्रकाश जी का निराला लेखन पढ़ने को मिला । ‘आलोचना का जल ‘ में निहित कटाक्ष पसंद आया ।

  2. लिट्रेचर प्वाईंट ने एक और नगीना जड़ा।एक और नई शुरुआत।स्वागत।जयप्रकाश मानस जी सर्वोपयुक्त रचनाकार हैं।

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