एक था रिक्शावाला

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार, किस्त 12

दफ्तर के लिए निकल गया हूं। मगर मेट्रो स्टेशन जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा। न फीडर बस और न ही बैटरी रिक्शा। काफी इंतजार के बाद एक रिक्शावाला आता दिख रहा है। उसे रुकने का इशारा किया है। ओह! इस बंदे की तो पूरी बाजू गायब है। वह एक हाथ से हैंडल पकड़े है। ब्रेक मारते हुए वह मेरे सामने आकर बोला- कहां जाना है। इस रिक्शेवाले को देख कर मैंने अपना इरादा बदल दिया है। मगर उसने भांप लिया है मेरे मन को। ‘......आप घबराइए नहीं। मैं संभल कर चलता हूं। भरोसा कीजिए एकदम सुरक्षित पहुंचा दूंगा।’
उसके चेहरे पर आत्मविश्वास है। हैंडल पर क्या मजबूत पकड़ है। हिचकते हुए उसके रिक्शे पर बैठ गया हूं। अमूमन मैं रिक्शेवालों से दुनिया भर की बातें करता हूं। वे भी अपना दुख-दर्द बांट लेते हैं, मगर मैं इससे नहीं बात कर रहा। इस डर से कि कहीं इसका ध्यान न भंग हो जाए। इसलिए खामोश हूं। अभी कुछ दिन पहले एक मित्र ने वाट्सऐप पर वीडियो भेजा था। उसमें रिक्शेवाले का एक पैर और एक हाथ था ही नहीं। फिर भी मजे से सवारी बैठा कर चला रहा था। उस वीडियो को याद कर तसल्ली मिली कि चलो इसका एक हाथ ही तो नहीं है।
इस रिक्शेवाले पर न जाने क्या विपदा आई होगी। फिर भी देखिए इसका हौसला कितना बुलंद है। इसने चंद मिनटों में ही मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचा दिया है। उसके चेहरे पर एक विजेता की मुस्कान है। रिक्शे से उतर कर मैंने उसे 40 रुपए दिए तो वह बोला-‘बाबू यह ज्यादा है। 30 रुपए ही बनते हैं।’ उसकी बात सुन कर लगा कि गरीब हमसे कहीं ज्यादा ईमानदार है। वरना लुटेरों की कमी कहां है इस देश में। ‘.......नहीं रख लो’, यह कर कर मैं स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं।
सोच रहा हूं......... दिल्ली में कारों की बढ़ती संख्या के बीच रिक्शे की कदर ही कहां रह गई है। क्या ही अजीब बात है कि यह वही रिक्शा है, जिस पर कभी अमीर लोग ही सवारी किया करते थे। आप थोड़ा अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि रिक्शा सबसे पहले 1868 में जापान में दिखा था। तब इसकी सवारी बहुत महंगी होती थी। समझ लीजिए कि वह अभी के ओला या उबर की किसी कैब से कम नहीं रही होगी। यहां तक कि कुछ लोगों के पास पर्सनल रिक्शे भी हुआ करते थे। जरा सोचिए आज शौक के लिए ही सही, एक रिक्शा खरीद कर घर के आगे खड़ी कर दें, तो पड़ोसी ले लेकर मित्र-संबंधी कैसी खिल्ली उड़ाएंगे, आप कल्पना कर सकते हैं।
चलिए बातों-बातों में आजादपुर मेट्रो स्टेशन के प्लेटफार्म पर आ गया हूं। दुनिया के सबसे आधुनिक परिवहन साधनों में से एक मेट्रो पर मुझे सवार होना है। ........ पेट्रोल-डीजल और बिजली से चलने वाले परिवहन के मुकाबले रिक्शा बेशक निरीह हो, लेकिन यह न तो प्रदूषण फैलाता है और न ही इसकी रफ्तार किसी को नुकसान पहुंचाती है। ....... हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आ गई है। हमेशा की तरह आखिरी कोच में सवार हो गया हूं। रिक्शे की सवारी करने के बाद मेट्रो में अभी हवाई जहाज में बैठने जैसा लग रहा है। रिक्शा जहां मानवीय अहसास कराता है, एक संवाद कायम करता है इंसान से इंसान के बीच तो मोटर चालित वाहन मुझे कहीं ज्यादा निर्मम और संवाद से कटा हुआ लगता है।
मेट्रो चल पड़ी है। राजधानी के सीने को चीर कर बनाई गई सुरंग से होते हुए यह मुझे राजीव चौक पहुंचा देगी। मगर दिल्ली में दिल को दिल से जोड़ रहे रिक्शे वालों जैसा संवाद और सम्मान का सुख नहीं देगी। मेट्रो का चालक तो बस चलता जाता है रोबोट की तरह। अपनी धुन में। कोच में निर्धारित घोषणाएं होती रहती हैं। क्या आपने किसी मेट्रो चालक को यात्रियों से बतियाते देखा है। उनसे तो बात ही करना मना है।
दरअसल, रिक्शे जिंदगी की लय के साथ चलते हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्वी भारत तक में रिक्शे की ट्रिंग-ट्रिंग सुनाई देती है। उसका पहिया जब तक घूमता रहता है, यात्रियों को उनकी मंजिल मिलती रहती है। वह गरीब के परिवार का भी पेट भरता रहता है। रिक्शे का न तो किसी से बैर है न किसी से आगे निकलने की होड़। फिर भी उसके प्रति क्यों है समाज की बेरुखी? अदालत की तमाम नसीहतों के बावजूद कहीं कोई संवेदनशीलता नहीं। सच बात तो यह है कि इसके पीछे अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई का समाजशास्त्र है। जब व्यक्ति रिक्शे पर सवार होता है तो उसे कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन जैसे ही वह कार पर सवार होता है, वह रिक्शों को हिकारत भरी नज़र से देखने लगता है। कोलकाता, दिल्ली और पटना से सेकर तमाम शहरों में आप उन्हें दुत्कारे जाते देख सकते हैं।
बातों-बातों में चांदनी चौक स्टेशन आ गया है। सच बताऊं तो चांदनी चौक कई महीने से नहीं गया, लेकिन यहां रिक्शे से घूमने की हमेशा इच्छा होती है। भीड़भाड़ के बीच रिक्शे पर बैठ कर ऐसा लगता है जैसे आप नाव पर बैठे जिंदगी की लहरों पर मंथर गति से चल रहे हों। इतिहास बताता है कि चांदनी चौक वाली सड़क नहर ही थी और यहां नावें ही चला करती थीं। कोई दो राय नहीं कि रिक्शे यहां की जीवन रेखा हैं। मगर इसे यहां से बेदखल करने के लिए जहां बैटरी बसें चलाई गईं, वहीं यातायात पुलिस की इनके प्रति बेरुखी देख कर दिल टूट जाता है।
कोई सात साल पहले 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सवाल उठाया था कि रिक्शों पर अंकुश लगाने के लिए तो आपका जोर है, मगर वाहनों की बढ़ती संख्या पर नहीं। अदालत ने तब ये भी सवाल उठाया था कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में रिक्शों पर पाबंदी लगाने का फैसला करते समय क्या वहां कारों के अवागमन पर आप रोक लगाते हैं? पीठ ने लंदन और अन्य विदेशी शहरों का हवाला भी दिया था, जहां कुछ इलाकों में कार ले जाने के लिए लोगों को शुल्क भी देना पड़ता है।
मुझे अभी इस चिंतन यात्रा पर विराम देना पड़ेगा, क्योंकि राजीव चौक आ गया है। मैं प्लेटफार्म नंबर तीन पर बढ़ रहा हूं। सोच रहा हूं..... कारों की संख्या बेतहाशा बढ़ने के बावजूद मेट्रों स्टेशनों पर भीड़ क्यों रहती है? क्या इस नए परिवहन प्रबंधन में भी कमी है? वाहनों की भागमभाग के बीच रिक्शों और साइकिलों को सड़कों से बेदखल करने की कब तक साजिश होती रहेगी। क्या आने वाले 20-25 सालों में सड़कों पर कारें चलाने के लिए जगह बचेगी?
कई सवाल घुमड़ रहे हैं मन में। किसी समृद्ध देश में विकास का क्या पैमाना हो, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है। दुर्भाग्य से हमारे यहां कारों और विलासिता की चीजों के साथ गगनचुंबी इमारतों को ही विकास का पैमाना मान लिया गया है। दूसरी ओर वाहनों की भीड़ ध्वनि प्रदूषण बढ़ा रही है। हर तरफ घुटन बढ़ रही है। हर तरफ है घुटन.........प्लेटफार्म से लेकर मेट्रो कोच तक में। स्टेशन से बाहर निकलते ही ट्रैफिक जाम में घुटन। एक घुटन हम सबके बीच भी चलता है।
........नोएडा सिटी सेंटर की मेट्रो आ गई है। मैं हमेशा की तरह फिर आखिर कोच में सवार हो रहा हूं। मेरे साथी अक्सर पूछते हैं कि आप लास्ट कोच में ही क्यों बैठते हैं। उन सबको मेरा यही जवाब है कि यहां मुझे घुटन कुछ कम लगती है। आप आगे रहते हैं तो एक होड़ में होते हैं। पीछे रहते हैं तो आगे बढ़ने की उम्मीद लेकर जीते रहते हैं। यही जीवन दर्शन है मेरा। यों आखिरी कोच में भीड़ कम रहती है, तो प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर यात्रियों की कतार भी नहीं दिखती। थोड़ा सुकून और थोड़ी तसल्ली लिए दो पल जी लेता हूं। ....... फिर सीढ़ियों के सामने ही आखिरी डिब्बा लगता है तो झट से स्टेशन के बाहर निकल जाता हूं, जहां कई रिक्शे वाले मुझे देख कर आवाज लगाने लगते हैं।
पिछले साल जून में हुआ हादसा अभी याद आ रहा है। उस दिन अशोक नगर मेट्रो स्टेशन से उतर कर रिक्शे पर बैठा था। रिक्शा वाला मुझे जानता था। उससे मैंने कहा-भाई गोल चक्कर के पास ले चलो वहां मुझे नारियल पानी पीना है। वह मान गया। लौटते समय बुलेट सवार एक युवक ने हमें टक्कर मार दी। उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि मैं सड़क पर जा गिरा। रिक्शेवाले की कंधे की हड्डी खिसक गई। मेरे पैर में गहरी चोट आई। दूर जाकर पलट चुके रिक्शे का एक पहिया नाच रहा था, तो दूसरा घूमने लायक भी नहीं बचा था। रिक्शे वाले को भाड़ा देने के अलावा उसे इलाज कराने के लिए रुपए देकर किसी तरह अफिस पहुंचा।
पैर की हड्डी में गंभीर चोट के कारण लंबी छुट्टी के बाद दफ्तर लौटा। मगर वह रिक्शा वाला मुझे नहीं दिखा। उसके साथियों ने बताया कि वह गांव चला गया है। खैर....... कुछ महीने बाद लौटा तो उसने एक दिन मुझे देख कर हाथ जोड़ दिए और बोला, ‘सर, आप दूसरे रिक्शे पर बैठ जाइए। मैं नहीं जाउंगा।’ वह उस हादसे से अब तक उबर नहीं पाया था। स्टेशन के बाहर खड़े उसके साथियों ने यह बात सुनी, तो इनमें तीन आगे आए और बोले, ‘चलिए बाबू हम आपको छोड़ देते हैं दफ्तर।’ ....... यह था उनका मेरे लिए सम्मान। अब उन तीन रिक्शों वालों ने ही मुझे आफिस पहुंचाने की जिम्मेदारी संभाल रखी है। जो खाली मिलता है, उसी के रिक्शे पर बैठ जाता हूं।
........... अभी मैं अशोकनगर मेट्रो स्टेशन पहुंचुंगा तो उन तीन रिक्शेवालों में से कोई न कोई मेरा इंतजार कर रहा होगा। एक रिक्शावाला बंगाल का है, तो दूसरा यूपी का और तीसरा बिहार का। तीनों की अपनी जीवन गाथा, लेकिन दो वक्त की रोटी के लिए एक जैसा संघर्ष। आप किसी भी रिक्शेवाले से बात कीजिए, ये ज्यादातर इन्हीं तीनों राज्यों के मिलेंगे। आपको यह भी पता चलेगा कि हमारे गांवों से पलायन क्यों हो रहा है? बेरोजगारी की जड़ क्या है? और फिर यहां आकर गरीबों को मिलता क्या है? बमुश्किल दो वक्त की रोटी और और हर पल दुत्कार। वाहन चालक उसे गाली देते हुए धकियाने को बेताब रहते हैं। कब वे हादसे के शिकार हो जाएं कोई नहीं जानता?
..........लीजिए अशोक नगर स्टेशन आ गया है। मैं स्टेशन से बाहर निकल रहा हूं। सीढ़ियों से उतरते हुए बंगाली दादा ने मुझे देख लिया है। वे रिक्शे की सीट को अपने गमछे से पोंछ रहे हैं। मेरे लिए यह किसी रथ से कम नहीं। इस पर बैठ कर खुद को मैं किसी राजकुमार से कम नहीं मानता। दादा तो मुझे सारथी लगते हैं इस रथ के।
तो बाहर आते ही उनके रिक्शे पर बैठ गया हूं। वे कुछ नहीं बोले। अरे, यह क्या। दारू का भभका? संभलते हुए पूछा- ‘क्या दादा, दिन में ही...लगा ली। आप तो पीते न थे।’ यह सुन कर दादा के झरझर आंसू बहने लगे। मैं तो अपराधबोध से ग्रस्त हो गया। लगा कुछ गलत ही कह दिया, जिससे दादा रो पड़े हैं। .........आंसू पोंछते हुए वे बोले-‘क्या करूं बाबू। बेटे ने परेशान कर रखा है। रोज शराब के लिए पैसे मांगता है। आज पैसे नहीं दिए तो मुझे मारने को दौड़ा। दिमाग इतना खराब हो गया कि दिन में मैंने भी चढ़ा ली। बुरा मत मानिएगा बाबू। मैं नशे में नहीं हूं।’
रिक्शे की हैंडल पर दादा की वही मजबूत पकड़ और वही सधी हुई चाल। जिंदगी की बिगड़ी चाल से खुद को संभालते हुए दादा चल रहे हैं। अपना मूड बदलने के लिए उन्होंने अपना पॉकेट रेडियो ऑन कर दिया है। उफ्फ! इस बेवक्त क्या गीत बज उठा है-
दुनिया में कितना गम है,
मेरा गम कितना कम है.....
बंगाली दादा गीत की लय के साथ चले जा रहे हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि उनसे क्या बात करूं......? चलिए रहने देते हैं।

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1 Response

  1. Rachna Bhola says:

    दादा के रथ से जुडी आपकी संवेदना को सलाम संजय जी

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