ओम नागर की चार कविताएं

तुम और मैं

तुम मंच पर
मैं फर्श पर बैठा हूँ
एक सच्चे सामाजिक की तरह

तुम्हें चिंता है अपने कलफ़ लगे कुर्ते पर
सिलवट उतर आने की
मुझे तो मुश्क़िल हो रहीं यह सोचते
कि अभी और कितनी खुरदरी करनी हैं तुम्हें
तथाकथित तरक्की की राह

तुम किस अजाने भय से रहते हो इन दिनों
डरों नहीं,कुर्सियां किसी की सगी नहीं हुई
तुम्हारी भी नहीं होगी,यही सच है

मुझे क्या,तुम्हारी सारी कुर्सियां मुबारक़ तुम्हें
मैं तो तुम्हारे भाषण के कूड़े से
बेशकीमती कौड़ी ढूँढ रहा था बस
फ़िर भी तुम हो कि तुम्हारे चेहरे से डर की
छाया नहीं जाती
सियासत में इतना डर ठीक नहीं

तुम कुर्सियों के इर्द-गिर्द पक्का कर रहे हो अपना बचना
ऐसे में तुम में जो मनुष्यता बचनी थी,नहीं बची

मेरा क्या मैं तो रचता रहूँगा शब्द
यूँ ही अनवरत
जिन शब्दों को बृह्म होने का वरदान है

तुम मेरे रचने से डर रहें हो
रचो,रचो मेरे रचने के ख़िलाफ़ कोई साज़िश रचो
जो तुम मंच के लिए भी यही रचते रहे,रचो बेधड़क
मैं मनुष्यता के लिए रच रहा हूँ शब्द
फिर भी डर रहे हो तुम।।

लेकिन

बोलते बहुत अच्छा हो लाल किले से तुम भी
लेकिन भाषण से रोटी नहीं बनती

नाचते भी क्या खूब हो तुम,दुनिया भर में
लेकिन हमारे घर का आँगन टेढ़ा हैं जरा-सा

गाते भी हो बहुत खूबसूरत हमारे दुःख
लेकिन तुम्हारे राग से न मेह बरसे न आँख झरे हैं

तुम्हारे दो कदम चलने से मिलता बादशाहत का पता
लेकिन पगथलियाँ तुम्हारी छालों से अपरिचित हैं

बहुत अच्छा ही खाते होंगे,जब मन करें तुम तो
लेकिन कभी कोई रीती डकार आई हो तो बताना

कविता तो तुम भी कर ही लेते हो अच्छी -सी
लेकिन करते क्या हो इसके सिवा बताना जरा।

रिश्ता 

मनुष्य ने
जब -जब भी काटी
जंगल की देह

तब -तब
जीना हुआ दूभर

ज्यों रेगिस्तान
पसर गया
साँसों की संभावनाओं पर।

ठूँठ होना
ठूँठ होना
आसान नहीं होता

सतत् दोहन से
गुजरना होता है पेड़ को
ठूँठ होने के लिए

ठूँठ होने के लिए भी
चाहिए होती हैं
जीवन के प्रति आस्था

ठूँठ भी कई बार होता हैं
बसंत के आगमन पर
हरा -भरा।
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: परिचय :

ओम नागर
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जन्म: 20 नवम्बर, 1980, अन्ताना, तह. अटरु, जि. बाँरा (राज.)
शिक्षा: एम. ए. (हिन्दी एवं राजस्थानी) पीएच-डी, बी.जे.एम.सी.
प्रकाशन: 1. ‘‘छियांपताई’’, 2. ‘‘प्रीत’’, 3. ‘‘जद बी मांडबा बैठूं छूँ कविता’’ (राजस्थानी काव्य संग्रह), 4. ‘‘देखना एक दिन’’ (हिन्दी कविता संग्रह) 5 . “विज्ञप्ति भर बारिश “(हिंदी कविता संग्रह ) 6.”निब के चीरे से”
( कथेत्तर गद्य-डायरी)
राजस्थानी अनुवाद – ‘‘जनता बावळी हो’गी’’ (रंगकर्मी व लेखक शिवराम के जननाटक), ‘‘कोई ऐक जीवतो छै’’ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी के कविता संग्रह ‘‘अनुभव के आकाश में चांद’’ और ‘‘दो ओळ्यां बीचै’’ श्री राजेश जोशी के कविता संग्रह ‘‘दो पंक्तियों के बीच’’ साहित्य अकादमी द्वारा अनुवाद योजना के अन्तर्गत प्रकाशित।
प्रकाशन व प्रसारण: देश की प्रमुख हिन्दी व राजस्थानी पत्र पत्रिकाओं में रचनाएॅ प्रकाशित। आकाशवाणी कोटा, जयपुर और जयपुर दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारण।
पुरस्कार व सम्मान:
01 . कथेतर गद्य की पांडुलिपी “निब के चीरे से ” के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार -2015
02  . केन्द्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी कविता संग्रह ‘‘जद बी मांडबा बैठू छूँ  कविता’’ पर ‘‘युवा पुरस्कार-2012’’
03 . राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा हिन्दी कविता संग्रह ‘देखना, एक दिन’ पर सुमनेश जोशी पुरस्कार, 2010-11
04 . राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा शिवराम के जननाटक  ‘‘जनता पागल हो गई है’’ के राजस्थानी अनुवाद ‘‘जनता बावळी होगी’’ पर ‘‘बावजी चतरसिंह’’ अनुवाद पुरस्कार- 2011-12
05 . प्रतिष्ठित साहित्य पत्रिका “पाखी ” द्वारा “गांव में दंगा ” कविता के लिए “शब्द साधक युवा सम्मान
06 . राजस्थान सरकार जिला प्रशासन बारां व कोटा, काव्य मधुबन, साहित्य परिषद, आर्यवर्त साहित्य समिति, शिक्षक रचनाकार मंच, धाकड़ समाज पंचायत सहित कई साहित्यिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
सदस्य: राजस्थानी भाषा परामर्श मण्डल, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली।
संप्रति: लेखन एवं पत्रकारिता
पता: 3-ए-26, महावीर नगर तृतीय, कोटा – 324005(राज.)
मोबाइल-9460677638

E-mail-omnagaretv@gmail.com

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