कमलेश भारतीय की दो कविताएं

एक

जादूगर नहीं थे पिता

पर किसी जादूगर से कम भी नहीं थे

 सुबह घर से निकलते समय

 हम जो जो फरमाइशें करते

शाम को आते ही अपने थैले से

सबको मनपसंद चीजें

हंस हंस कर सौंपते

 जैसे किसी जादूगर का थैला हो

अब पिता बन जाने पर

समझ में आया कि जादूगर की हंसी के पीछे

कितनी पीडा छिपी होती है

 सच , जादूगर नहीं थे पिता

पर किसी बडे जादूगर से कम भी नहीं थे

दो

ईर्ष्या से भर गई है दुनिया

प्रेम के लिए बची नहीं

कोई भी जगह

और कोई भी वजह

जबकि हम सब जानते हैं कि

 ईर्ष्या मिटाने के लिए

 प्रेम ही सबसे ज्यादा जरूरी है

 लेकिन वही हम

किसी दूसरे को देना नहीं चाहते

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