कविता बनाम ग़ज़ल : भाग एक

    सुशील कुमार

  • जन्म-13/09/ 1964. पटना सिटी (बिहार) में।
  • सम्प्रति : मानव संसाधन विकास विभाग,रांची (झारखंड) में कार्यरत ।
  • संपर्क –  सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा/रांची (झारखंड)–834004

ईमेल –sk.dumka@gmail. com
मोबाइल न. –09431310216 / 09006740311

  • प्रकाशित कृतियां– कविता-संग्रह कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग(2011),  जनपद झूठ नहीं बोलता (2012)हाशिये की आवाज (शीघ्र प्रकाश्य) आलोचना पुस्तक -आलोचना का विपक्ष (शीघ्र प्रकाश्य )
  • कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित।
हर रविवार

ग़ज़लों की दुनिया जितनी निराली है, उतनी ही प्रेरक , लेकिन जिन्होंने ग़ज़लों को अपना पेशा बनाया, वे खूब बिके। अगर वे साहित्यालोचना में यह उम्मीद रखते हैं कि उनको भी इस दायरे में लाया जाए तो यह उनकी भूल है। उनसे केवल यह गुजारिश करूँगा कि पहले अपने कमाए पैसे और शोहरत गरीबों में बाँट आओ , फिर हम गरीबनवाजी करेंगे । कहने का मतलब है वे ग़ज़लें जनसरोकार से जुड़ी हुई मानी जाती हैं जो निस्वार्थ भाव से जन-समर्थन में समर्पित हों, उनकी कीमियागरी को बेचा न गया हो। मेरा विचार है कि बाकी सब को कूड़ा ही मानिए।
कवि डी एम मिश्र ने आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की दुनिया में जो हस्तक्षेप किया है , वह केवल रदीफ़ और काफिया के अनुशासन के कारण प्रतिक्रिया के योग्य नहीं है, बल्कि उसके कंटेंट भी उतनी ही चर्चा के काबिल हैं।
पत्थर को प्रार्थना के स्तर तक ले जाने वाली उनकी ये ग़ज़लें सम्वेदना के उन नूतन शब्दों की आहट हैं जिसमें न केवल मन की आत्मीयता का अविकल विभोर है , बल्कि यहाँ जनचेतना को एक ऐसा साकार रूप मिला है जो जितनी हृदयस्पर्शी है ,उतनी ही जनपीड़ा को व्यक्त करती हुई , समष्टि में प्रवाहित , देखिए कवि डी एम मिश्र की एक ग़ज़ल –

प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया।

रूप आँखों में किसी का यूँ बसा
अश्रु को आराधना तक ले गया।

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं
पीर को संवेदना तक ले गया।

हारना मैने कभी सीखा नहीें
जीत को संभावना तक ले गया।

मैं न साधक हूँ , न कोई संत हूँ
शब्द को बस साधना तक ले गया।

अब मुझे क्या और उनसे चाहिए
एक पत्थर ,प्रार्थना तक ले गया।

कम ही सुधीजन यह जानते हैं कि आधुनिक हिंदी ग़ज़लों की नींव निराला, शमशेर के द्वारा रखी गई । लेकिन उसका पल्लवन हिंदी के प्रखर कवि और ग़ज़लगो दुष्यंत कुमार ने किया। दुष्यंत ने उर्दू रवायतों और बिम्बों से उसे बाहर निकाल कर जनचेतना से जोड़ने का जो साहित्यिक और ऐतिहासिक काम किया , वह इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि उनके इस कर्म से ग़ज़लों के अबाध विकासक्रम का मार्ग प्रशस्त हो गया । उसे सही दिशा मिली और उनमें प्रगतिशीलता के तत्व का अवगाहन हुआ।
अनेक आंदोलनों से गुजरती हुई जिस प्रकार हिन्दी कविता ने एक लंबी यात्रा तय की है, उसने कई पड़ावों के आत्मसंघर्षों को झेलते हुए अपनी सही जमीन बनाई है , भंगिमा और स्वरूप बदले हैं , उसी प्रकार , यह परिवर्तन ग़ज़लों के क्षेत्र में भी गोचर हुए। भले ही इन पर अब तक कम लिखा गया हो! ग़ज़ल को कविता से अलग मानने का हो-हल्ला कतई नोटिस लेने लायक नहीं। क्यों न नियम-संस्कार यहाँ मुक्त-छंद की कविता से अधिक कड़े हों, पर इनके विकास, इनकी कला, प्रभावान्विति और संप्रेषणीयता से हम कतई मुंह नहीं मोड़ सकते। अगर ग़ज़लगो प्रवीण हो तो ग़ज़ल कहीं-कहीं कविता से भी गहरी अर्थच्छवियाँ रचती हैं।
यह भी कि, कवितान्दोलनों का ग़ज़ल पर भी ख़ासा प्रभाव पड़ा है। यह भी अपनी रूढ़ि, रीति और पुराने संस्कारों से आज ज्यादा मुक्त दिखती है। इस कारण समकालीन बेहतरीन ग़ज़लें अपने प्रगतिशील तत्वों और कला की उदात्तपन के कारण हिंदी कविता में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं । स्व. अदम गोंडवी, रामकुमार कृषक, डी एम मिश्र, मालिनी गौतमडॉ. भावना आदि बहुतेरे नाम हैं जो हिंदी ग़ज़लों को लगातार ऊंचाइयों पर ले जा रहे और उसे लोकचेतना की सही जमीन से युज्य कर रहे।
ऐसे में अगर कोई यह समझता है कि समय के साथ ग़ज़लें बहरों और काफियों के अनुशासन और नियमबद्धता के कारण समाप्तप्राय होती चली गईं तो उसकी भयंकर भूल होगी। आज भी ग़ज़लों में *साये में धूप * कितनी पढ़ी जाती है, आप जानते हैं! किस कविता संग्रह के दर्जनों संस्करण और आवृत्तियाँ *साये में धूप* जैसी छपी या छपती हैं?
इसलिए जब तक धरती पर मानव बचा है, उसके उर में ग़ज़ल एक इच्छा-बीज की तरह जन्म लेती रहेगी, फले-फूलेगी, क्योंकि यह मनुष्य की आदिम छटपटाहट और उसके राग को व्यक्त करने का बहुत माकूल और सशक्त विधा व माध्यम है।

लेकिन हिंदी ग़ज़ल को हिंदी कविता विधा से दूर रखने की संप्रति जो चालें चली जा रहीं, लोकचेतना से जिस तरह अलगा कर उसे देखा जा रहा , उसे एक अलग परम्परा और घराने की बात कहकर संकुचित घेरे में बंद रखा जा रहा, उन्हीं कुप्रवृत्तियों का यह परिणाम है कि कविता भी दिनानुदिन पाठकों से अलग-थलग होती जा रही। खूब कूड़ा-कविताएँ रोज लिखी जा रही । कवि ही आपस में पढ़ रहे, पढ़वा रहे। जनमानस को इन कूड़ा कविताओं से क्या मतलब ?
प्रसंगवश यहाँ ग़ज़लगो डी एम मिश्र की ग़ज़ल *तमाशा देखेंगे* आपके सामने रखना चाहता हूं । आप खुद तय करें कि यह कितनी ग़ज़ल है और कितनी कविता ! यह भी कि , यह ग़ज़ल कविता से कितनी कमजोर या मजबूत है?
अपनी जनधर्मिता में हिंदी कविताओं के साथ जितनी मजबूती से यह ग़ज़ल खड़ी है ,उतनी ही समसामयिक प्रवृतियों की वाहक भी है । फिर ग़ज़ल और कविता को एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बनाकर कवियों,- आलोचकों द्वारा ग़ज़ल विधा को कविता-विधा में समाहित करने से इतना ऐतराज क्यों ? ●

आइए यह गजल देखकर इस सवाल को ढूंढें-
गजल / डी एम मिश्र / तमाशा देखेंगे
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कोई ‘हिटलर’ अगर हमारे मुल्क में जनमे तो।
सनक में अपनी लोगों का सुख-चैन चुरा ले तो।

अच्छे दिन आयेंगे, मीठे – मीठे जुमलों में,
बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो।

मज़लूमों के चिथड़ों पर भी नज़र गड़ाये हो,
ख़ुद परिधान रेशमी पल-पल बदल के निकले तो।

दूर बैठकर फिर भी आप तमाशा देखेंगे,
जनता से चलनी में वो पानी भरवाये तो।

कितने मेहनतकश दर -दर की ठोकर खायेंगे,
ज़ालिम अपने नाम का सिक्का नया चला दे तो।

वो मेरा हबीब है उससे कैसे मिलना हो,
कोई दिलों में यारों के नफ़रत भड़काये तो।

जिसके नाम की माला मेरे गले में रहती है,
वही मसीहा छुरी मेरी गरदन पर रख दे तो।

आँख मूँदकर कर लेंगे उस पर विश्वास मगर,
दग़ाबाज सिरफिरा वो हमको अंधा समझे तो।