कविता बनाम ग़ज़ल : भाग 2

    सुशील कुमार

  • जन्म-13/09/ 1964. पटना सिटी (बिहार) में।
  • सम्प्रति : मानव संसाधन विकास विभाग,रांची (झारखंड) में कार्यरत ।
  • संपर्क -  सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा/रांची (झारखंड)–834004

      ईमेल –sk.dumka@gmail. com
      मोबाइल न. –09431310216 / 09006740311

  • प्रकाशित कृतियां– कविता-संग्रह कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग(2011),  जनपद झूठ नहीं बोलता (2012)हाशिये की आवाज (शीघ्र प्रकाश्य) आलोचना पुस्तक -आलोचना का विपक्ष (शीघ्र प्रकाश्य )
  • कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित। 

हर रविवार

हिंदी साहित्येतिहास का काल विभाजन बड़ा ही विभ्रमपूर्ण है। इसके मनीषियों और आचार्यों ने आधुनिक हिंदी काल की जो रूपरेखा प्रस्तुत की, उसमें हिंदी गजलों को कोई स्थान नहीं दिया। हद तो यह है कि अभी तक साहित्येतिहास का कोई ऐसा प्रामाणिक ग्रंथ नहीं , जिसे देखकर यह कहा जा सके कि इसमें कहानी, उपन्यासों, कवितादि की तर्ज पर गजलों की भी कालक्रमानुसार अलग से चर्चा की गई है! अधिक से अधिक आपको इस ओर कहीं-कहीं फुटकर निबन्ध ही मिलेंगे। एक तरफ तो उर्दू को केवल मुसलमानों की भाषा के सियासतदानों ने , तो दूसरी ओर उर्दू के कुछ स्वार्थी गजलकारों ने उसे हिंदी के करीब आने से रोका। 
जिनको उर्दू गजल में अपनी अस्मिता की पहचान अलग से बनानी थी, उन्हें हमेशा यह डर सालता रहा कि उर्दू गजल का हिंदी गजल में 'एसिमिलेशन' होने से गजल की दुनिया में उनकी प्रभुसत्ता 'डायल्यूट' हो सकती है। कुछ ने तो केवल देवनागरी को नाममात्र के लिए अपना बाजार खड़ा करने के लिए अपनाया, उसकी आत्मा उर्दू -फारसी प्रसूत ही रही। इसलिए यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि इनका हिंदी से कोई अपनापन नहीं ।


प्रसंगात, यह भी महसूस करने वाली बात है कि हिंदी के आचार्य अकादमिक लेखन के पंडित थे ही , जान-बूझकर हिंदी गजलों के प्रति उनकी जो अन्यमनस्कता रही , वह यही दर्शाती है कि अपनी वर्गीय अवस्थिति के कारण वे हिंदी साहित्य में दूसरी भाषाओं की विधा को , जो अब हिंदी के बहुत करीब आ चुकी थी, के प्रति कितने अनुदार और ब्राह्मणवादी बने रहे! हालाकि एक समय भारत सरकार की इन विभेदपूर्ण नीतियों का फिराक गोरखपुरी जी के द्वारा पुरजोर विरोध किया गया था। पर सरकार पर इसका कोई असर न हुआ। 

यह व्यक्त करना कितना दुखद है कि साहित्येतिहास लिखते वक्त देश की आजादी की लड़ाई में भी गजलों के योगदान पर कहीं कोई चर्चा न हुई। राम प्रसाद बिस्मिल , अशफाक आदि की गजलें भी कभी साहित्य का इतिहास लिखते वक्त उनको याद तक न आयी! फिर भी हिंदी के अनेक रचनाकारों ने इस विधा को अपनाया जिनमें निराला, शमशेर, बलबीर सिंह रंग, भवानी शंकर, जानकी वल्लभ शास्त्री, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन , कुंअर बेचैन आदि प्रमुख हैं। लेकिन इस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रसिद्धि दुष्यंत कुमार को मिली। देखिए , निराला की गजलों की कुछ पंक्तियां -

【गजल / निराला 】 "निराला

अजब नक-चढ़ा 

आदमी हूँ 
जो तुक की कहो बे-तुका आदमी हूँ 
बड़े आदमी तो बड़े चैन से हैं 
मुसीबत मिरी मैं खरा आदमी हूँ 
सभी माशा-अल्लाह सुब्हान-अल्लाह 
हो ला-हौल मुझ पर मैं क्या आदमी हूँ 
ये बचना बिदकना छटकना मुझी से 
मिरी जान मैं तो तिरा आदमी हूँ 
अगर सच है सच्चाई होती है उर्यां 
मैं उर्यां बरहना खुला आदमी हूँ 
टटोलो परख लो चलो आज़मा लो 
ख़ुदा की क़सम बा-ख़ुदा आदमी हूँ 
भरम का भरम लाज की लाज रख लो 
था सब को यही वसवसा आदमी हूँ" । 


यह बड़ी बात है कि छायावाद की प्रेत-छाया और छंदों से मुक्त करने वाले छायावादी स्तम्भ स्वयं निराला ने हिंदी गजल लिखकर हिंदी काव्य में इसका बीज-संकेत डाल दिया था कि यह कोई साहित्येतर विधा नहीं । पर इस किसी का ध्यान नहीं गया।
हम यह भी जानते हैं कि हिंदी खड़ी बोली के विकास से आधुनिक हिंदी काव्य साहित्य की कड़ियाँ जिस तरह जुड़ती हैं और उसके पहले की जो पूर्व पीठिकाएँ बनती हैं ,उसमें इस भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि युग-युग में इसका नाम परिवर्तित होता रहा है। कभी 'वैदिक', कभी 'संस्कृत', कभी 'प्राकृत', कभी 'अपभ्रंश' और अब - हिन्दी। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उसी प्रकार हिंदी गजलों का 'ओरिजिन' अरबी- फारसी से उर्दू के जरिए हिंदी तक हुई है। कहने को हिंदी का इतिहास 1000 वर्षो तक का गिनाया गया है । पर इसका असली 'आधुनिक' विकास-यात्रा 1850 से अब तक यानी लगभग 150 सालों की है। यही हाल हिंदी गजलों का है। हिंदी गजलों का भी आविर्भाव लगभग इसी वक्त हुआ। उसके पहले के 750 वर्षो तक वह अरबी-फारसी से ही संपृक्त रही।
यहाँ मूल प्रश्न यह है कि साहित्य की अन्य विधाओं यथा; कहानी, कविता, नाटक, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण आदि को जब विदेशी भाषा साहित्य कहकर नहीं नकारा गया और उसके स्वतंत्र इतिहास लेखन की जिम्मेदारी पूरी सहृदयता से स्वीकार की गई तो फिर यह भेदभाव हिंदी गजलों की सुदीर्घ परम्परा के साथ क्यों कर हुआ ? क्यों हिंदी गजल साहित्यिक राजनीति का शिकार होती रही? हिंदी जैसा प्राणवंत भाषा-साहित्य जो बिना किसी राजनयिक एवं सत्ता सहयोग के निरंतर संघर्ष करता हुआ आज विश्व-साहित्य के समकक्ष अपने दम पर खड़ा है, जिसमें अन्य भाषाओं के सत्व-गुण और शक्ति को अर्जित कर उनको स्वयं में समाहित करने की 'नदियों के समुद्र में गिरकर मिलने जैसी' अपार क्षमता निहित है , में हिंदी गजलों को स्वीकार न किया जाना सत्ता पोषित उर्दू मंचीय गजलकारों के और हिंदी आचार्यो द्वारा रचा गया वितंडा ही लगता है , जो इसे संभ्रांत वर्ग तक सीमित रखकर अपनी-अपनी वर्गीय अवस्थिति को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। यह उनके रीति, रति और भोगवाद की चरम दशा है जो उनकी स्वार्थपरता के कारण हिंदी गजलों को जनकृत करने से रोक रही और उर्दू के सम्भ्रांत नजरिये से उसे अपने खाने-कमाने का जरिया बनाए रख रही। पर यह भी देखना उतना ही रुचिकर है कि कुछ आधुनिक हिंदी गजलगो ने उस जमीन को निरंतर तोड़ा और उसे जनोन्मुख बनाकर उर्दू गजलों के एकाधिपत्य को समाप्त करने की दिशा में सराहनीय प्रयत्न किया है। गजलों के बाज़ार के बाजार और उसकी प्रकृति पर ग़ौर करते हुए यहाँ मुझे कवि शमशेर की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं जिसे यहाँ देना लाज़िमी होगा -
"इल्मों-हिक़मत, दीनो-इमां, हुस्नो-इश्क
जो चाहिए कहिए, 
अभी बाज़ार से ले आता हूँ।" 
जितना संघर्ष हिंदी कविता ने रीतिकाल से अब तक किया है, उससे कम संघर्ष हिंदी गजलों ने नहीं किया । लेकिन विषाद की बात यह है कि साहित्य में जहाँ एक ओर उर्दू कलावादी गजलों (की देवनागरी लिपि) को सिर पर उठाया गया , वहीं हिंदी जनवादी गजलों को झोलाछाप बनानेका  कुत्सित प्रयत्न हुआ । 
इतना होते हुए भी आज हिंदी गजलों ने हिंदी साहित्य में जो मुकाम हासिल किया है, भाषा, शिल्प, बनक , प्रतिमान और अभिव्यक्ति शैली के स्तर पर इनके जितने विविध और समृद्ध रूप दृष्टिगत हो रहे कि इसने कलावाद की अलंघ्य सीमा को भी बखूबी लांघकर उसे ठोस जनवादी आधार प्रदान किया है। इन पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है जो आगे की कड़ियों में क्रमवार लिखना चाहूंगा। 
. सर्वश्री रामकुमार कृषक, श्री राम शलभ, डी एम मिश्र, महेश कटारे सुगम, नूर मोहम्मद नूर, देवेंद्र आर्य, ध्रुवगुप्त , अनिरुद्ध सिन्हा, राजेश रेड्डी , मालिनी गौतम, डॉ. भावना , महेंद्र नेह, कमल किशोर श्रमिक , बल्ली सिंह चिमो आदि ऐसे ही कई नाम हैं जो हिंदी जनवादी गजलों की जमीन को उर्वर कर रहे। पर इन्हें मुश्किल से मंच मिलते हैं और हिंदी कवियों की तरह केवल जनवाद का झोला ढोते हैं , सच की जमीन तलाशते हैं। कृति और जीवन दोनों इनके संघर्षो से अटा पड़ा है । पर इनमें अधिकतर ऐसे हैं जो लोकधर्मिता की धार अपनी गजलों में कम नहीं होने देते । इनमें स्व. अदम गोंडवी तो अव्वल हैं! 
पर उर्दू से आए हिंदी की देवनागरी लिपि पर कब्ज़ा किए मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी, वशीर भद्र , निदा फाजली, गुलज़ार, आदि ऐसे भी कलावादी गजलगो की भी श्रेणियां यहीं हैं जो जनवादिता का हिपोक्रिटिक मुखौटा पहनकर हिंदी में छा गईं , खूब लोगों की तालियां बटोरी और खूब खाया-कमाया । इनसे हिंदी जनवादी गजलों का भला नहीं हुआ क्योंकि इनकी कथनी और करनी अलग - अलग हैं। ये गजलों को जीते नहीं, उनसे खेलते हैं , जिनके लिए लोकचेतना नुमाईश और शौक की चीज़ है।गजल चरित चमकाने का एक जरिया है। इनकी गजलें इनकी पेशवर बुद्धि से निःसृत होती है ,जहाँ सुधी पाठकों को काफी सचेत होने की आवश्यकता है। 
यही हाल गीतों और नवगीतों का भी है जिस पर अलग से लेखन समीचीन लगता है।

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