कुल्हड़ की वो चाय

संजय स्वतंत्र

बिहार की उस मिट्टी से जन्म का नाता है, जो अभावों और सपनों के संघर्ष के साथ एक इंसान बनने की तमीज पैदा करती है। जब हिंदी पट्टी विचार और बाजार से जूझ रहा था, तब पिता की सरकारी नौकरी के कारण देश की राजधानी दिल्ली में सत्ता के गलियारों में बचपन गुजरा। सिविल लाइंस के मॉडल स्कूल के बाद हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग में समाज, सत्ता व शक्ति के जोड़तोड़ को समझना शुरू कर स्वदेश, अमृत प्रभात, देशबंधु, सांध्य टाइम्स और नवभारत टाइम्स जैसे अखबारों में लिखना शुरू किया। समाज और सरोकार के साथ जुड़ने की इसी धुन ने जनसत्ता जैसे अखबार के साथ जोड़ा। अखबार में तथ्यों के साथ तटस्थ रहना सीखने के साथ साहित्य में जिंदगी के जश्न को ढूंढ़ने की कोशिश की। इनकी रचनाएं परिवार, बचपन, प्रेम, दोस्ती जैसी बुनियादी चीजों पर बातें करती हैं। जीवन की छोटी-छोटी चीजों को बिना किसी बौद्धिक जुगाली के सहज तरीके से रख देने की इनकी शैली इन्हें फेसबुक जैसे उस माध्यम पर लोकप्रिय बना चुकी है जहां लेखक और पाठक आमने-सामने होते हैं।
पुस्तकें : बाप बड़ा न भैया (व्यंग्य संग्रह), बालेंदु शर्मा दाधीच के साथ दो बालकथा संग्रह ‘परी की बांसुरी’ और ‘अनोखा ताबीज’।

 

द लास्ट कोच : किस्त 2
सुबह उठा तो पड़ोस की आई (झाई) सबको अलविदा कह इस दुनिया से जा चुकी थीं। यों जीवन के प्रति नश्वरता का बोध अक्सर होता रहा है, लेकिन कल तो बेइंतिहा हुआ। हम इस दुनिया में आए हैं तो एक दिन सभी को जाना ही है। आज इस आभासी दुनिया में हम लोग रोज मिलते हैं, मगर यहां से भी कोई न कोई गुम होता ही जाएगा। 
आई जी चली गर्इं हैं सदा के लिए, लेकिन मैं जा रहा हूं अपने दफ्तर, जहां से मैं औचक छुट्टी नहीं लेता। और इस बात का भी अहसास है कि समय पूरा होने पर एक दिन यहां से हमेशा के लिए छुट्टी मिल जाएगी। फिर एक दिन इस संसार से भी। मगर आज तो जाना ही होगा। ....... तो मैं हमेशा की तरह मेट्रो के आखिरी डिब्बे में बैठा हूं अभी। ठीक वैसे ही जैसे जिंदगी की जद्दोजहद में हम आखिरी कतार में खड़े होते हैं और जब तक नंबर आता है, आपको खाली हाथ लौटा दिया जाता है।
कोच में बैठे सहयात्रियों को देखता हूं। सब अपनी दुनिया में खोए हैं। सबकी अपनी कहानी। सब चल रहे हैं। मगर कोई किसी के साथ नहीं। नश्वरता पर मैं इतना क्यों सोच रहा हूं? क्या ये श्मशान वैराग्य है? मालूम है इससे उबरते ही माया मुझे घेर लेगी। मोबाइल की घंटी ने मेरे चिंतन को भंग कर दिया है। स्क्रीन पर अनजाना सा नंबर चमक रहा है। कौन है यह। मैं कॉल सुनता हूं। दूसरी ओर से आवाज आई- ‘सर मैं मुक्ति सिन्हा बोल रही हूं। आप कहां है?’ मैंने उसे पहचान लिया। दिल्ली जैसे महानगर में नौकरी के लिए संघर्ष कर रही बनारस की युवती। वह दो साल पहले मिली थी।
मुक्ति ने बताया कि वह एक टीवी चैनल में इंटरव्यू देकर लौट रही है। उसने पूछा- ‘सर आप राजीव चौक पहुंच रहे हैं, तो आप वहीं रुकिएगा। मैं भी वहीं आ रही हूं।’ मैंने कहा- ‘कुछ खास? नौकरी लग गई तुम्हारी?’ मुक्ति का जवाब था- ‘अभी नहीं। आ के बताती हूं। प्लीज जाइएगा नहीं। आपसे हर बार मुलाकात टल जाती है। आपके पास टाइम ही नहीं होता।’ मैंने उसकी शिकायत दूर करने की कोशिश की- ‘अच्छा ठीक है, तुम आओ। मैं मिलूंगा। मगर तुम इतने दिनों बाद मुझे पहचान लोगी?’ इस पर मुक्ति का जवाब था-‘आप निश्चिन्त रहिए, पहचान लूंगी आपको। मगर आप पहचान लेंगे मुझको? वैसे मैं वाइट ड्रेस में हूंं। मैंने कहा- हां, कोशिश करूंगा। 
मुक्ति से बात करते हुए मैं राजीव चौक पहुंच गया हूं। स्टेशन पर बहुत भीड़ है। सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर के प्लेटफार्म पर जा रहा हूं। नोएडा जाने वाली ट्रेन के अंतिम डिब्बे के पास खड़ा रहूंगा। मुक्ति यही मिलेगी। उसने यही बताया है। समय गुजर बीत रहा है। एक के बाद एक मेट्रो जा रही है, लेकिन मुक्ति का कोई अता-पता नहीं। इंतजार करते हुए आधा घंटा से एक घंटा हो गया, तो मैंने ही कॉल किया- ‘कहां हो तुम? उसका जवाब था-बस कुछ मिनट सर। आ रही हूं।’ 
........एक और मेट्रो आ रही है। इसमें जरूर होगी मुक्ति। आखिरी डिब्बा मेरे सामने रुक गया है। वह दरवाजे के पास खड़ी है। उसने मुझे पहचान लिया है। उसके चेहरे पर थकान है, फिर भी मु्स्कान से सराबोर। गेट खुलते ही वह मेरे सामने थी। वह मेरी नाराजगी भांप गई है। मैं कुछ कहता उससे पहले ही मुक्ति ने खेद जताया- ‘सर आापको मेरी वजह से यहां एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। आई एम सॉरी। आप आफिस के लिए लेट हो गए। मगर एक कप चाय तो पीनी ही पड़ेगी मेरे साथ। चाय पीते हुए बात भी हो जाएगी।’ मैंने मना किया तो उसने फिर जिद की-‘सर चलिए न। चाय पीकर कर मैं यमुना बैंक तक आापके साथ चलूंगी।’
मुक्ति की बार-बार जिद के आगे झुकना पड़ा है। वह मुझे फूडकोर्ट ले गई है। उसने अपने लिए टमैटो सूप लिया है और मेरे लिए चाय और वह भी कुल्हड़ में......! इस बीच मुक्ति ने बैठने के लिए सीट देख ली है। वह एक हाथ में सूप दूसरे हाथ में चाय लेकर मेरे साथ चल रही है। 
उसने बैठते ही कुल्हड़ वाली चाय मेरे आगे रख दी है। छोटी सी कुल्हड़ में लबालब चाय। एक घूंट पीता हूं। एक अनोखी मिठास और माटी की सोंधी महक मेरी सांसों में घुल रही है। कुल्हड़ इतनी छोटी है कि चाय कब खत्म हो गई पता ही नहीं चला। सोच रहा हूं जिंदगी भी तो इस चाय की तरह है। कब खत्म हो जाती है, पता नहीं चलता और हसरतें इस कुल्लड़ की तरह खाली रह जाती है। फिर सोच रहा हूं.....नहीं यह देह ही कुल्हड़ की तरह है। जिस तरह यह कुल्हड़ मिट्टी में मिल जाएगा, वैसे हम सब की देह को भी मिट्टी में मिल जाना है। 
खयाल आया कि मैं तो दफ्तर जा रहा हूं और अब तक आई का अंतिम संस्कार हो चुका होगा। उनकी देह राख बन कर मिट्टी में मिल चुकी होगी। अब कुम्हार फिर मिट्टी उठा कर अपने चाक को घुमाएगा और फिर एक कुल्हड़ बनाएगा। एक नया जन्म लेंगी आई...........। इस कुल्हड़ की मिट्टी की आवाज सुन रहा हूं। आपने सुना है? मैं खाली कुल्हड़ को अब भी ध्यान से देख रहा हूं। यह दोबारा मिट्टी में मिलने के बाद फिर कुल्हड़ बन कर किसी के हाथ में होगा.....। 
मुझे लगातार खयालों में डूबे देख मुक्ति ने ही टोका-सर क्या सोचने लगे? और चाय लेंगे क्या? मैंने कहा-नहीं। अब हमें चलना चाहिए। .....कुल्हड़ के बहाने जिंदगी का एक मर्म समझ गया हूं। मैं मन ही मन बोलता हूं- थैंक यू मुक्ति आज की इस मुलाकात के लिए और जिंदगी से एक साक्षात्कार कराने के लिए।
* (मुक्ति मेरे भावी उपन्यास की नायिका है, जो अक्सर यादों में आकर झकझोरती है और कहती है कि जिंदगी को समझना है तो मृत्यु को भी जानो। इस सफर में कई लोग मिलेंगे। मगर कोई साथ न चलेगा। अगर चलेगी तो सिर्फ मुक्ति। चलोगे मेरे साथ.....?)

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