खुद को बदलो, देश को बदलो

संजय स्वतंत्र

किस्त : 10

आज घर की दिनचर्या पूरी करने के बाद जब दफ्तर के लिए चला तो देखा कि बाहर पिताजी गमछा-बनियान में ही खड़े हैं और ठेले वाले से सब्जियां खरीद रहे हैं। एक रिटायर आला अफसर को यों इस अंदाज में देख मैं संकोच में पड़ गया। क्या कहूं उनसे? मुझे देखते ही बोले- ‘कहां चल दिए? रुको जरा। अभी आता हूं। शाम की चाय के लिए नमकीन लेकर जाना।’
तरकारी खरीद कर वे लौटे तो मैंने हमेशा की तरह अपनी नाराजगी जताई कि आप से अच्छा तो सफाई कर्मचारी है जो सुबह शर्ट-पैंट पहन कर सड़क पर झाड़ू लगाता है। इस पर पिताजी हंसते हुए बोले, ‘वह अच्छे कपड़े पहन कर दूसरों को प्रभावित तो कर सकता है, पर मेरी तरह एक अच्छी पृष्ठभूमि और गुण कहां से लाएगा?’ उन्होंने एक बार फिर मुझे निरुत्तर कर दिया है। 
……….मेट्रो स्टेशन पहुंच गया हूं। आज मेरी नजर अच्छे परिधान पहनने वालों पर है। दिल्ली बीते दो दशकों में जिस तरह बदली है, उसी हिसाब से यहां के लोगों के परिधानों में भी बड़ा बदलाव आया है। दिल्ली पहले से कहीं अधिक चटख हो गई है। इसका श्रेय हमारे काबिल फैशन डिजाइनरों को जाता है, जिन्होंने दक्षिणी दिल्ली के एक कोने में बैठ कर बरसों मेहनत की और राजधानी से लेकर मुंबई तक धाक जमाई। 
आज हम सभी अच्छा तो दिखना चाहते हैं, लेकिन अच्छा बनना नहीं चाहते। जब मेट्रो में सफर करता हूं तो क्या बच्चे और क्या जवान। हर कोई आधुनिक परिधानों में सजा-धजा नजर आता है। वजह साफ है। कपड़ा उद्योग ने सस्ते दामों में भी इतने आधुनिक परिधान बाजार में उतार दिए हैं कि अब तो पूरी दिल्ली ही युवा दिखती है। इन कपड़ों को पहने बुजुर्ग भी नौजवान लगते हैं। लाल टी शर्ट और ब्लू जींस में कभी इन्हें देखिए। ये तो युवाओं को भी मात देते हैं। 
मेट्रो में सफर करते हुए मैंने पाया है कि युवा लड़कियों ने परिधानों को लेकर सभी बंधनों को तोड़ दिया है। इसे अब पश्चिम का प्रभाव कहना फिजूल की बात है। शिक्षा के साथ विचारों में आए बदलावों ने युवा पीढ़ी को अगर उन्मुक्त बनाया है तो ये मान कर चलिए कि पश्चिम में दकियानूसी विचार डूब चुके हैं और हम उनसे दो कदम आगे जा चुके हैं। पूरब से एक नए भारत का उदय हो गया है।
यों महंगे परिधान में कोई भी साधारण शख्स दूसरों पर रौब गालिब कर लेता है। मगर सरल और सहृदय व्यक्ति योग्यता व गुणों में ज्यादा विश्वास रखते हैं। दूसरों में भी गुण ही देखते हैं, कपड़े नहीं। अभी मेट्रो में सफर करते हुए सोच रहा हूं कि आजादी के दो दशक बाद पैदा हुई हमारी पीढ़ी ने महात्मा गांधी को तस्वीरों में कभी महंगे परिधान में नहीं देखा। इतनी महान शख्सियत ने ताउम्र साधारण धोती में गुजार दी। अचरज होता है कि सादगी संपन्न बापू के इस देश में बाजारवादियों ने अरसा पहले नारा दिया था- देश बदलो, भेष बदलो। यह नारा नई पीढ़ी को केंद्र में रख कर रचा गया था, लेकिन उसका लक्ष्य पूरा भारतीय समाज था। संदेश साफ था कि अच्छे कपड़े पहन कर साहब और मेम साहब की तरह दिखो, नहीं तो लोग चोर उचक्का या अपराधी समझेंगे। इस विज्ञापन ने मुझे बहुत आहत किया था।
कुछ बरस पहले एक खुदरा बाजार की बड़ी शृंखला ने अपने टीवी विज्ञापन में लोगों से पूछा- ‘आप कैसा दिखना चाहते हो, चोर, नौकर या गरीब आदमी?’ ….यानी अच्छे कपड़े नहीं पहनेंगे तो ऐसा ही दिखेंगे। उस विज्ञापन ने समाज को झकझोर दिया था, जिसमें साधारण लिबास में एक आदमी जब अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदी कार की ओर बढ़ता है तो नया चौकीदार उसे रोकता है- ‘ओए किसकी गाड़ी उठा रहा है?’ ………. तभी हमारे एक प्रिय क्रिकेट खिलाड़ी पर्दे पर आते हैं और उस आदमी का बचाव करते हुए कहते हैं- ‘गाड़ी तो तुम्हारी है पर दुनिया तब मानेगी जब मालिक दिखोगे।’ दूसरे विज्ञापन में कहा गया-कपड़े ढंग के नहीं, तो इज्जत भी नहीं। 
तब साधारण कपड़े पहनने वाले हम जैसे लोगों को ये विज्ञापन काफी चुभे थे। खुद भाई धोनी को लेकर सवाल किया गया था कि साधारण परिवार से आए इस युवा को क्रिकेट में पहचान कपड़ों से नहीं, मेहनत और प्रतिभा से मिली है। कंपनी का प्रचार तो अपने वस्त्र उत्पाद बेचने के लिए था। मगर उसने लोगों का दिल तोड़ दिया था। 
……..दफ्तर पहुंचने में मुझे अभी समय लगेगा। तब तक मैं आप से बात कर सकता हूं। मुझे अभी मुंशी प्रेमचंद की सादगी पर उनके पुत्र अमृत राय का लिखा एक संस्मरण याद आ रहा है- ‘……बस्ती के ताराचंद ‘नाशाद’ मुंशी जी से मिलने लखनऊ पहुंचे। उन दिनों वह अमीनुद्दौला पार्क के सामने एक मकान में रहते थे। मकान के नीचे ही नाशाद साहब को एक आदमी मिला, धोती-बनियान पहने। नाशाद ने उनसे पूछा- मुंशी प्रेमचंद कहां रहते हैं, आप बतला सकते हैं? उस आदमी ने कहा-चलिए आपको उनसे मिला दूं। वह आदमी आगे-आगे चला, नाशाद पीछे-पीछे। ऊपर पहुंच कर उस आदमी ने बैठने के लिए कहा और अंदर चला गया। जरा देर बाद कुर्ता पहन कर बाहर निकला और बोला- अब आप प्रेमचंद से बात कर रहे हैं…..। 
कथा सम्राट् मुंशी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी जी ने भी जिक्र किया है कि वे सूती और पुराने कपड़े पहनते थे। वहीं मुझे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सादगी की कहानियां भी याद आ रही हैं। रोज सूट-बूट बदलने वाले आज के नेता सोच भी नहीं सकते कि देश के शीर्ष पद पर बैठने वाला यह महान व्यक्तित्व कितने सादे और कम कपड़े से काम चला लेता था। प्रेमचंद और शास्त्रीजी आज के दौर में होते तो लेखकों-कवियों और पत्रकारों-नेताओं को महंगे कपड़ों में लक-दक देखते तो दांतों तले उंगलियां दबा लेते। और शायद यही पूछते कि भैया, भेष तो बदल लिया लेकिन देश को कब बदलोगे? 
…………राजीव चौक स्टेशन आने की उद्घोषणा हो गई है। मुझे उठना चाहिए। फिर बात होगी। स्टेशन के बाहर भीड़ कम है और आते-जाते यात्री खासकर युवा लड़के-लड़कियों को आधुनिक परिधान में देख रहा हूं? वाकई दिल्ली कितनी चंचल और चटख है। उसकी शोख अदाएं कसम से दिल को बहुत लुभाती हैं। 
तीस साल पहले भी दिल्ली की एक अदा थी। मंथर गति से चलती, साथ निभाने का एक वादा करती हुई। आज यह बिंदास है। कहती है- साथ चलो नहीं तो तुम्हें छोड़ कर आगे निकल जाऊंगी। शोख हसीना की खिलखिलाहट आप महसूस कर सकते हैं, दिल्ली की धड़कन में। कल इसकी अदा और निराली होगी। सीढ़ियां चढ़ते हुए जुबां पर पलाश सेन का गाया एक गीत याद आ गया है-
ये शहर मेरी जान, मेरी सांसों में बसा,
इस हवा का नशा, मेरा दिल मेरा पता,
मेरी शान, दिल्ली है मेरी जान…….। 
भागता फिर रहा, हर निशान यहां,
दिल में बसाए जीने का अरमान।
सबका सहारा, शहर हमारा,
मेरा दिल मेरा पता,
मेरी शान, दिल्ली मेरी जान……….

 

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