ग़ज़ल की जरूरत

 

सुशील कुमार

  • जन्म-13/09/ 1964. पटना सिटी (बिहार) में।
  • सम्प्रति : मानव संसाधन विकास विभाग,रांची (झारखंड) में कार्यरत ।
  • संपर्क -  सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा/रांची (झारखंड)–834004

      ईमेल –sk.dumka@gmail. com
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  • प्रकाशित कृतियां– कविता-संग्रह कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग(2011),  जनपद झूठ नहीं बोलता(2012)हाशिये की आवाज (शीघ्र प्रकाश्य) आलोचना पुस्तक -आलोचना का विपक्ष (शीघ्र प्रकाश्य )
  • कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित।

हर रविवार

यह जानते हुए भी कि गजल कविता से कमतर विधा नहीं है, इसके साथ साहित्येतिहास लेखन से मूल्यांकन तक जो दुर्नीति की गई है, उनके कारणों पर मैंने पहले विचार किया है। कविता के सुधीजनों को इस पर विचार करना चाहिए कि गजल विधा अस्तित्व में कैसे और क्यों आई, समय की किन जरूरतों, परिस्थितियों और मानव-हृदय की किस अदम्य लालसा ने उनसे गजल की खोज करवाई ? 
इस समाजशास्त्रीय प्रश्न में ही इसकी जरूरत के कारण गुप्त हैं। सतपाल ख्याल ‘साहित्य-शिल्पी’ में प्रकाशित लेख में कहते हैं कि “तकरीबन 1000 साल से भी पहले ग़ज़ल का जन्म ईरान में हुआ और वहाँ की फ़ारसी भाषा में ही इसे लिखा या कहा गया। माना जाता है कि ये "कसीदे" से ही निकली, कसीदे राजाओं की तारीफ मे कहे जाते थे और शायर अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए शासकों की झूठी तारीफ़ करता था और विलासी राजाओं को वही सुनाता था जिससे वो खुश होते थे। शराब, कबाब और शबाब के साथ राजा कसीदे सुनते थे और विलासी राजा औरतों के ज़िक्र से खुश होते थे तो शायर औरतॊं और शराब का ज़िक्र ही ग़ज़लों मे करने लगे वो चाहकर भी जनता का दुख-दर्द बयान नही कर सकते थे। तो ग़ज़ल का मतलब ही औरतों के बारे मे ज़िक्र हो गया। यही पर इसका बहर शास्त्र बना जो फारसी में था।“ लगभग यही हाल रीतिकालीन कविताओं का था।
स्पष्ट बात यह है कि मनुष्य स्वयं से आगे बढ़ना चाहता है, उसकी प्रवृत्ति हमेशा खोजी रही है। उसे सर्वदा ‘परिपूर्णता’ की तलाश रही है। जब तक सत्ता ईश्वर और सुख का पर्याय रही, लोगों ने अपनी स्वगत प्रवृत्ति ‘मैं’ का विस्तार सत्ता के समीप जाने में किया । इसी समष्टिगत किन्तु सत्तागत अस्तित्व से जुड़ने के क्रम में कला का अंतर्निष्ठ विकास कहन की गजल शैली में उन्मुख हुआ। यह मनुष्य की इच्छाओं के निहितार्थ उसकी उत्तम संभावना का लक्षण के रूप मे फलित हुआ जो उसका श्रेय भी है और उसका प्रेय भी। 
लेकिन जैसे-जैसे दुनिया बदली, सत्ता के अंग-उपांग बदले। अपनी वैयक्तिकता को सम्पूर्ण यथार्थ में बदलने की चेष्टा कविता के साथ-साथ गजल में भी समानान्तर रूप से हुई और यह व्यष्टि से समष्टि की ओर जाने लगी । इस रूपान्तरण में साहित्यकार-कलाकार का यह कर्म एक बहुत ही सचेत और विवेकपूर्ण प्रक्रिया से होकर गुजरा है जिसे असमकालीन होने पर भी नकारा नहीं जा सकता क्योंकि वह विकास की विरासत रहा है। यही कारण है कि गजल अरबी-फारसी होते हुए जब उर्दू की जबान बनी तो इसमें सामाजिकता के अक्स ज्यादा प्रभावकारी ढंग से दृष्टिगत हुए । 
गजल की विकिपीडिया में उल्लेख है कि “अरबी से फारसी साहित्य में आकर यह विधा शिल्प के स्तर पर तो अपरिवर्तित रही, किंतु कथ्य की दृष्टि से वे उनसे आगे निकल गई। उनमें बात तो दैहिक या भौतिक प्रेम की ही की गई किंतु उसके अर्थ विस्तार द्वारा दैहिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम में बदल दिया गया। अरबी का इश्के मजाज़ी फारसी में इश्के हक़ीक़ी हो गया। फारसी ग़ज़ल में प्रेमी को सादिक (साधक) और प्रेमिका को माबूद (ब्रह्म) का दर्जा मिल गया। ग़ज़ल को यह रूप देने में सूफ़ी साधकों की निर्णायक भूमिका रही। सूफी साधना विरह प्रधान साधना है। इसलिए फ़ारसी ग़ज़लों में भी संयोग के बजाय वियोग पक्ष को ही प्रधानता मिली।“
आप उपर्युक्त कथन की पड़ताल हिन्दी की भक्तिकालीन सूफी काव्य-परंपरा से कर सकते हैं। पर उर्दू से हिन्दी में गजल के आने की घटना रचना की एक वशीभूत और अनुभूत यथार्थ के रूप में सामने आता है। वह साहित्य का कोई उन्माद या आकस्मिक घटना नहीं है। गजलकारों ने महसूस किया कि गजलों का रूमानी संस्कारों से ऊपर उठना समय की मांग है। लेकिन खेद का विषय यह है कि नकारात्मक आलोचकीय दृष्टिकोण से इस बात को अब तक मान्यता नहीं मिली है । आचार्य रामविलास शर्मा ने तो यहाँ तक कहा कि “गजल तो दरबारों से निकली हुई विधा है जो प्रगतिशील मूल्यो को व्यक्त करने में अक्षम है।“ एक गंभीर अध्येता की यह टिप्पणी फौरी नहीं थी, बल्कि साजिशन भी थी। जैसे मुक्तिबोध की कविताओं में उन्होंने ‘फ्रायड का प्रभाव’ और ‘अस्तित्ववाद’ खोज लिया और संभ्रांत वर्गीय पाखंडपन के कारण आलोचना के गौरव को धूसरित किया, उसी प्रकार उनको गजलों की रवायत में केवल रीति और रति ही नजर आई । आज भी रामविलास शर्मा परंपरा के वाहक नव्य आलोचना में उन्हीं बातों को दुहराई जाती है जो बहुत अप्रासंगिक और झूठी है। 
परिदृध्य काफी बदल चुका है। हिन्दी भाषा की चर्चित विधा बन चुकी गजल ने अब अपना एक सौदर्यशास्त्र भी ढूंढ लिया है। गद्यकोश में रवीद्र प्रभात ने इन अपनी बातों से अपने एक लेख को समाप्त किया है जिससे सहमत हुआ जा सकता है – “आज अपनी अकुंठ संघर्ष-चेतना और एक के बाद दूसरी विकासोन्मुख प्रवृत्ति के कारण हिन्दी ग़ज़ल एक ऐसे मुकाम पर खडी है, जहाँ वह हिन्दी साहित्य में अपनी स्वतन्त्र उपस्थिति दर्ज कराने को बेचैन दिखती है।“
समकालीन कवि की तरह अब गजलकार भी सृजन में अपने अनुभव को पकड़ता है, उस पर अधिकार रखता है, उसे अपनी स्मृति में रूपांतरित करता है, स्मृति को अभिव्यक्ति में बदलता है और गजल की अंतर्वस्तु के अनुसार उसका रूप निर्धारण करता है। पहले के शाईर की तरह अब उसके लिए भावना ही सब कुछ नहीं। गजल में उसके सोचने की ‘कीमिया’ समकालीन और आधुनिक हो चुकी है। वह अपने काम की जिम्मेवारी समझता है, समय से मुठभेड़ करता हुआ उन तमाम कौशलों, रूपों और परिपाटियों को समझने का यत्न करता है और उसे गजल के अनुशासन के अंतर्गत लाता है। उसकी रचनात्मक ऊर्जा अब रीतिकालीन आवेग में नहीं जाया होती, बल्कि उसे अपने वश में कर सृजन और परिवेश के मध्य उत्पन्न तनाव और द्वन्द्वात्म्क अंतर्विरोधों को भी झेलता है। सृजन के इस क्षण में उसकी कला न केवल यथार्थ के गहन अनुभव से गुजरती है, बल्कि निपुणता से उसे जीती है। दरअसल यही आधुनिक गजल की जरूरत है, जिसकी भिन्न-भिन्न भाव-दृष्टियाँ और कलात्मक कलेवर विभिन्न गजल-रचनाकारों में पाई जाती हैं । 
आप पाएंगे कि समकालीन हिन्दी गजलों में जो गजलगो यथार्थ की अपेक्षा कला से अधिक मोहित है, काव्य की तरह वे गजल में रूपवादी रुझानों की ज्यादा प्रवृत्त है । वह मानवीय संवेदना की बाढ़ को अनुशासित करने के बजाय उसे बुर्जूआ मन के त्रासद ‘मनोरंजन’ और ‘कलाक्रीड़ा’ की ओर धकेल देता है । वह समय की त्रासदियों को गजल में केवल एक प्रेक्षक या दर्शक की तरह देखता है, अपनी कृति में उस मानव-मन की सृष्टि नहीं करता जो विचारों का उत्प्रेरण करे, जो यह निर्णय संस्तुति करे कि ‘यह गलत है , यह चीज बंद होना चाहिए’। 
अर्नेस्ट फिशर ब्रेख्त की ‘कला की द्वन्द्वात्मकता’ को उद्धृत करते हुए कृति के उन गुणों पर बल देते हैं, जो बदलती हुई दुनिया में कला का काम कैसे बदलता है, यह इंगित करे। लेकिन कला को जादू के रूप में देखने वाले कला-उन्मुख बुर्जूआ मति के गजलकार मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी, वशीर बद्र , निदा फाजली, गुलज़ार,वसीम बरेलवी आदि की श्रेणियाँ इस बात की गहराई को नहीं समझती कि :”दुनिया को बदलना ही जिसकी नियति है, उस वर्ग के लिए कला का सारभूत काम जादू करना नहीं , बल्कि प्रबुद्ध करना और कर्म की प्रेरणा देना है” , क्योंकि वे जो जीवन जीते हैं, उससे तो यही लगता है कि उनके लिए कला जीवन से अधिक प्रधान है , जैसा की अर्नेस्ट फिशर ने कहा , “जादू का जो अंश कला में बचा रह जाता है, उसे पूरी तरह निकाल कर फेंका नहीं जा सकता; क्योंकि अपनी मूल प्रकृति के इस सूक्ष्म अवशेष के बिना कला कला नहीं रह जाती । अपने विकास के तमाम रूपों में, गरिमा और ठिठोली में, अभिप्रेरणा और अतिशयोक्ति में, सार्थकता और निरर्थकता में, कल्पना और यथार्थ में कला का जादू से कुछ न कुछ संबंध जरूर रहा है । कला इसलिए जरूरी है कि आदमी दुनिया को समझ सके और बदल सके। लेकिन कला इसलिए भी जरूरी है कि उसमें जादू (आकर्षण) अंतर्निहित होता है। “ 
यही गजल की भी जरूरत है जिस पर भाषा के पेशेवर गजलगो खड़े नहीं उतरते ।

[ नोट : आगे की कड़ियो में हम रूपवादी गजलगो मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी, वशीर बद्र, निदा फाजली, गुलज़ार , वसीम बरेलवी आदि की गजलों का तुलनात्मक अध्ययन जनवादी गजलकार अदम गोंडवी ,रामकुमार कृषक, श्री राम शलभ, डी एम मिश्र,प्राण शर्मा , महेंद्र नेह, कमल किशोर श्रमिक , बल्ली सिंह चिमा, महेश कटारे सुगम, नूर मोहम्मद नूर, डॉ. रमाकांत शर्मा, देवेंद्र आर्य, अनिरुद्ध सिन्हा, राजेश रेड्डी, मालिनी गौतम, डॉ. भावना आदि की गजलों से करेंगे और यह संधान करने की कोशिश करेंगे कि आज समय से किस तरह की गजलें मुठभेड़ करती हुई दुनिया को बदलने का माद्दा रखती हैं और किस तरह की गजलें जनवाद की मुखौटा पहने हुए केवल कला का पक्ष लेती है। ]●

 

हर रविवार को यह स्तम्भ प्रकाशित होता है

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