गांव पर डी एम मिश्र की पांच ग़ज़लें

डी एम मिश्र

एक

नम मिट्टी पत्थर हो जाये ऐसा कभी न हो
मेरा गाँव, शहर हो जाये ऐसा कभी न हो।

हर इंसान में थोड़ी बहुत तो कमियाँ होती हैं

वो बिल्कुल ईश्वर हो जाये ऐसा कभी न हो।

बेटा, बाप से आगे हो तो अच्छा लगता है
बाप के वो ऊपर हो जाये ऐसा कभी न हो।

मेरे घर की छत नीची हो मुझे गवारा है
नीचा मेरा सर हो जाये ऐसा कभी न हो।

खेत मेरा परती रह जाये कोई बात नहीं
खेत मेरा बंजर हो जाये ऐसा कभी न हो।

गाँव में जब तक सरपत है बेघर नहीं है कोई
सरपत सँगमरमर हो जाये ऐसा कभी न हो।

दो

किसी जन्नत से जाकर हुस्न की दौलत उठा लाये
हमारे गाँव से क्यों सादगी लेकिन चुरा लाये।

बताओ चार पैसे के सिवा हमको मिला ही क्या
मगर सब पूछते हैं हम शहर से क्या कमा लाये।

हज़ारों बार इस बाज़ार में बिकना पड़ा फिर भी
खुशी इस बात की है हम ज़मीर अपना बचा लाये।

तुम्हारी थाल पूजा की करे स्वीकार क्यों ईश्वर
ये सब बाज़ार की चीज़ें हैं, अपनी चीज़ क्या लाये।

इसे नादानियाँ समझें कि क़िस्मत का लिखा मानें
समन्दर में तो मोती थे मगर पत्थर उठा लाये।

इसी उम्मीद पर तो टूटती है नींद लोगों की
नयी तारीख़ आये और वो सूरज नया लाये।

तुम्हारे हुस्न के आगे हज़ारों चाँद फीके हैं
तुम्हारे हुस्न को ही देखकर हम आइना लाये।

तीन

ग़ज़ल ऐसी कहो जिससे कि मिट्टी की महक आये
लगे गेहूँ में जब बाली तो कंगन की खनक आये।

मेरे घर भी अमीरी चार दिन मेहमान बन जाये
भरे जोबन तेरा गोरी तो शाख़ों में लचक आये।

नज़र में ख़्वाब वो ढालो कि उड़कर आसमाँ छू लें
जलाओ वो दिये जिनसे सितारों में चमक आये।

दुखी मन हो गया तो भी मेरे आँसू नहीं सँभले
बहुत खुश हो गया तो भी मेरे आँसू छलक आये।

क़लम से रास्ता लेकिन बनाया जा तो सकता है
बुझे तब प्यास जब गंगा मेरे अधरों तलक आये।

चार

बेाझ धान का लेकर वो जब हौले-हौले चलती है
धान की बाली, कान की बाली दोनों सँग-सँग बजती है।

लॉग लगाये लूगे की, आँचल का फेंटा बाँधे वो
आधे वीर, आधे सिँगार रस में हिरनी-सी लगती है।

कीचड़ की पायल पहने जब चले मखमली घासों पर 
छम्म-छम्म की मधुर तान नूपुर की घंटी बजती है।

किसी कली को कहाँ ख़बर होती अपनी सुंदरता की
यों तो कुछ भी नहीं मगर सपनों की रानी लगती हैं। 

किसी और में बात कहाँ वो बात जो चंद्रमुखी में है
सौ-सौ दीप जलाने को वो इक तीली-सी जलती है।

खड़ी दुपहरी में भी निखरी इठलाती बलखाती वो
धूप की लाली, रूप की लाली दोनों गाल पे सजती है।

पांच

गाँव – गाँव हो गया भिखारी
ये कैसी माया सरकारी।

विधवा बनकर पेन्शन लेती
देखा एक सुहागन नारी।

वोट के बदले नोट मिलेगा
खुला ख़ज़ाना है सरकारी।

स्वाइन -फ्लू आ गया यहाँ भी
सूअर बाँट रहे बीमारी।

हाड़ के पीछे कुत्ते लड़ते
बीच सड़क पर मारा – मारी।

महाकुम्भ के इस मेले में
बुढ़िया गिरी पिसी बेचारी।

मोदी हों या राहुल भैया
देश से ज़्यादा कुर्सी प्यारी।

कुछ कवि जनता का दुख गाते
कुछ गाते कविता दरबारी

 

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2 Responses

  1. Chhaganlal garg says:

    सार्थक धरातलीय महक देती गजले।

  2. राजेश"ललित"शर्मा says:

    गाँव की महक आई डी एम मिश्र की ग़ज़लों से और दिल ने महसूस भी की।

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