गौतम कुमार सागर की कविता ‘मन’

ना जाने किस किस कूल फिरे

यह नादान नाव -सा मन

लहरें, जाल , रेत , नमक

मछुआरे के गाँव -सा मन

सर्द इच्छाएँ.. जमा इर्द गिर्द

मधिम मधिम अलाव सा मन

कभी सिमटा कभी खुला रंग

मोर पंख की छाँव सा मन

पुरखे ,पीपल , नदी , नहर

दूर रह गये गाँव सा मन !!

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गौतम कुमार सागर

सीनियर मैनेजर (बैंक ऑफ बड़ौदा )

अक्षर पॅरडाइस , अटलद्रा

वडोडरा ( गुजरात)

 

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