गौतम कुमार ‘सागर’ की चार कविताएं

एक
उम्र  की सुराही से
रिस रहा है
लम्हा लम्हा
बूँद बूँद
और
हमें मालूम तक नहीं पड़ता
कितनी स्मृतियाँ
पुरानी किताब के
जर्द पन्ने की तरह
धूमिल पड़ गई
हमें मालूम तक नहीं पड़ता
बिना मिले , बिना देखे
कितने अनमोल रिश्ते
औपचारिकता में
तब्दील हो जाते है
हमें मालूम तक नहीं पड़ता.
हमें मालूम तक नहीं पड़ता
कल  कौन ,  कब,   कहाँ
साथ   छोड़   जाएगा
या
कोई
कब
कहाँ
नया
हमसफ़र
मिल जाएगा
…….जीवन ऐसा ही है
थोड़ा …पानी के उपर
थोड़ा
पानी के भीतर….
हमें मालूम तक नहीं पड़ता.

दो

कितने लघु हैं हम

सचमुच
कहाँ रुकने वाला है कुछ
मुर्झाते रहेंगे फूल
खिलती रहेंगी कलियां
गुलशन-ए-दयार में
होती रहेंगी तब्दीलियाँ

नदी पर लोहे के पुल के नीचे से
गुजर गया कितना पानी
दरिया जितना बड़ा है
एक बूँद के बनने की कहानी

कितने महल जाने अनजाने
गहरी कब्रों पर आबाद हैं
कितनी कब्रें …कितने ही
ताजमहल की बुनियाद है

समय के एक विशालतम रथ
में हजारों सदियों के पहिये हैं
ब्रह्मांड के अनंत बरामदे में
चाँद सूरज जैसे असंख्य दीये हैं

कितने लघु हैं हम
अहंकार में डूबे
महज जुगनू हैं हम……!!!

 

 

तीन

गुमशुदा 

मेरे भीतर  एक दीवाना सा लड़का  रहता था
सालों पहले
तुम्हारे भीतर की शर्मीली लड़की से प्यार करता था
सालों पहले
किसी दिन मेरे भीतर का वो जवान लड़का

मुझे जमाने की तरह बनता देख कर
घर छोड़ कर भाग गया
मैं आज सालों ….बाद तुमसे पूछने आया हूँ…..
क्या मेरे भीतर का वो ..सैलाब सा बेचैन लड़का
तुम्हारे भीतर की शर्मीली-सी लड़की से …. कहीं मिला फिर ….
कहीं देखा ….तुमने उसे…….
……तुमने रोते –मुस्कुराते कहा —
…”मेरे अंदर की वो शर्मीली लड़की भी ….
उसी दिन से गुमशुदा है .
मैंने किसी से नही कहा …
क्योकि …मेरी उदासी- से ये बात
आम हो जाती …
और मेरे भीतर की भागी हुई लड़की
बदनाम हो जाती !”
……तुम हँसी …बड़ी फीके से चाँद की तरह
और कहने लगी ,” अब तक तो वे अपनी गृहस्थी भी
बसा चुके होंगे !
अपनी मोहब्बत वाली दुनिया में……. खुश होंगे
और हमें भुला चुके होंगे !!

 

चार

और  ह तैयार हो गये

दंगो में चमचे ,

चिमटे भी हथियार हो गये
भीड़ जहाँ देखी..

…. उसके तरफदार हो गये !

शोहरतमंदों का ग्राफ…..

नीचे गिरा

तो कब्र बन गये
और उँचा हुआ तो..

गर्दने ऐंठ गयी

कुतुब मीनार हो गये !

अजब रोग है …

इन खूब अमीर

मगर गुनाहगार लोगों का
मुक़दमे की……..

हर तारीख पे ……..

.बीमार हो गये !

सियासत गंभीर मुद्दा

….. या अँग्रेज़ी वाला “फन “
क़व्वाली-ए-चुनाव में……..

बेसुरे भी

फनकार हो गये !

बचपन में……..

माँ जब स्कूल भेजती थी
बालों में तेल चुपड़ कर..

कंघी की… और  ह्म तैयार हो गये !
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गौतम कुमार  “सागर”

वरिष्ठ प्रबंधक (प्रशिक्षण संकाय)

बैंक ऑफ बड़ौदा

बड़ौदा अकॅडमी

सूरज प्लाज़ा , सयाज़ीगंज

बड़ौदा  ( Mob:- 7574820085)

 

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