चिठिया हो तो हर कोई बांचे…

संजय स्वतंत्र

किस्त 13

आज दफ्तर के लिए निकला ही था कि डाकिए ने रास्ता रोक लिया। वह अपनी साइकिल के पीछे बंधे बंडल से कोई पैकेट निकाल रहा है। शायद कोई साहित्यिक पत्रिका रही होगी, जो अमूमन मेरे पास आती रहती हैं। यों सरकारी चिट्ठी-पत्री और चेकबुक आदि लेकर यह डाकिया अक्सर आता है, पर नहीं लाता वह चिट्ठी जो कभी नाना-नानी के घर से आती थी। अब न मौसेरी बहन कोई चिट्ठी भेजती है न कोई चचेरा भाई याद करता है। यहां तक कि दोस्तों ने भी भुला दिया। मुझे याद नहीं आता कि कुशल-क्षेम पूछने के लिए हाल-फिलहाल किसी ने मुझे कोई चिट्ठी भेजी हो। 

साहित्यिक पत्रिका को थामे डाकिए को जाते देख रहा हूं। डाक बांटते-बांटते उसके बाल सफेद हो गए हैं। मगर उसका इंतजार अब कौन करता है? घर के पास सड़क के किनारे लगा लेटर बॉक्स कब का गायब हो चुका है। याद कीजिए जब बचपन में कोई पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पत्र उस डाकपेटी में डाल आया करते थे। कई बार तो उस लेटर बॉक्स के मुंह में हाथ डालकर सुनिश्चित भी करते कि चिट्ठी नीचे चली गई है या नहीं। 
फिर एक दिन जवाब आता उस खत का, जिसे वह डाकिया ही तो लेकर आता और साइकिल की घंटी बजाते हुए दरवाजे पर आवाज लगाता- पोस्टमैन........। तब हम लोग दौड़ते हुए जाते और वह चिट्ठी लेकर पढ़ने के लिए बैठ जाते। जिसका मजमून प्राय: इस तरह होता-
आदरणीय जीजाजी और दीदी,
सादर प्रणाम,
यहां हम सब ठीक से हैं। आशा है आप लोग भी कुशल होंगे। आगे का समाचार यह कि..................... । 
मां-बाबूजी को लिखी मामाजी की इस चिट्ठी में ननिहाल की पूरी तस्वीर खींच जाती। मिट्टी से लिपा-पुता घर-आांगन। शाम ढलते ही लालटेन या ढिबरी जलाने की कवायद। और चूल्हे के सामने बैठी नानी। खदकते दाल-चावल की महक और तरकारी से उठती मसाले की झांस से सोई हुई भूख भी जाग जाती। अब किचन से लेकर फ्रिज तक में न जाने कितनी चीजें पड़ी रहती हैं, लेकिन कुछ खाने की इच्छा नहीं होती। कितना कुछ बदल गया है जीवन में। 
उस दिन न्यूजरूम में खबरों के जंगल से गुजरते हुए एक खबर पर निगाह रुक गई। मुंबई डेटलाइन से खबर थी। अमिताभ बच्चन बता रहे थे कि तकनीक ने लोगों का धैर्य और समय छीन लिया है। दरअसल, अमिताभ के ब्लॉग पर दिए उनके विचारों पर आधारित यह खबर थी, जिसमें हिंदी सिनेमा के महानायक बता रहे थे कि तकनीक हमारे जीवन को किस तरह बदल रही है। किस कदर हम इस पर निर्भर हो गए हैं। अब हम किसी के जवाब का इंतजार नहीं करते, जिससे यह हताशा में बदलता जा रहा है। 
बिग बी आपने सही कहा। आज हम जवाब का इंतजार नहीं करते। इसलिए अब नहीं आती कोई चिट्ठी। कौन लिखे और क्यों लिखें। जिससे उम्मीद करते हैं, उसके पास भी धीरज है न समय। भाग्य को बांचने वाले तो बहुतेरे मिले जाएंगे, लेकिन चिठिया कौन बांचे। 
सूचना क्रांति का यह भ्रामक दौर है। सबके हाथ में मोबाइल है। संवाद के कई माध्यम हैं, मगर फिर भी एक संवादहीनता है। संबंधों के बीच अजीब सा धुंध है। इससे तो वह चिट्ठी वाला दौर ही ठीक था, जहां रिश्ते की हर तस्वीर साफ थी। जब लोग कम शब्दों में ही विस्तार से मन की बात कह देते थे। सुंदर अक्षरों में लिखे उन पत्रों का जवाब महीने दो महीने में आता था, फिर भी धीरज के साथ उसका इंतजार करते। उन दिनों हम ‘राजी-खुशी’ से रहते और एक दूसरे का कुशल-क्षेम जरूर पूछते। 
उन चिट्ठियों में जब यह लिखा होता- थोड़ा लिखा बहुत समझना, तो नहीं लिखी गई बातों का अहसास कर बहुत कुछ समझ जाते। हम जान जाते कि दादाजी बहुत बीमार हैं। मुनिया या बबुनी की शादी तय हो गई है। और मौसी को काफी पैसे की दरकार है। आज हर पल आ रहे वाट्सऐप मैसेज से समझ नहीं आता कि भेजने वाले के मन में क्या चल रहा है। उसकी व्यथा न हम जान पाते हैं और न वह हमारा। तकनीक के इस महायुग में इस संवादहीनता पर तरस आता है। 
.............. बताना भूल गया कि आज मैं मॉडल टाउन स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ा हूं। लास्ट कोच वाली जगह पर नीले रंग की बड़ी थैली लिए एक सज्जन ने मेरा ध्यान खींच लिया है। आखिरी छोर पर बस हम दो यात्री। लिहाजा संवाद न हो, यह नामुकिन है मेरे लिए। ‘इतनी बड़ी थैली में कागज़-पत्तर लेकर कहां जा रहे हैं’, मैंने उन सज्जन से पूछा। उनका जवाब था, ‘जी क्या बताएं डाक का समान है जी। कुछ सरकारी फाइलें और आफिशियल लेटर्स। यही सब है। कश्मीरी गेट जा रहे हैं जमा कराने।’ ‘.........अब लोगों की चिट्ठी- पत्री आती है कि नहीं’, मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा। ‘अजी राम का नाम लो। कौन लिखे है चिट्ठी आजकल?’ डाक बाबू का जवाब था। 
इस बीच हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की घोषणा हो गई है। डाक बाबू अपना थैला संभाल रहे हैं। हम लोग आखिरी डिब्बे में सवार हो गए हैं। सीटें लगभग खाली हैं। डाक बाबू मेरे बगल में बैठ गए हैं। वे बता रहे हैं-एक समय था जब घर-घर चिट्ठियां बांटने से फुर्सत नहीं मिलती थी। सुबह से शाम हो जाती, मगर पूरी डाक नहीं बंट पाती थी। धूप हो या बारिश या फिर सर्दियों के दिन। साइकिल से इस गली से उस गली, पार्सल-मनीआर्डर और चिट्ठियां बांटते शाम हो जाती। आज गिनती की डाक होती है और दोपहर तक काम निपट जाता है। 
डाक बाबू कह रहे हैं- जब सभी के हाथ में मोबाइल है तो कोई चिट्ठी लिखे ही क्यों। दिल्ली में बैठे लोग मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में रह रहे रिश्तेदारों से बात कर लेते हैं। ....... बात तो उनकी सही है। पर क्या यह सच नहीं है कि लोग अब इधर-उधर की तो खूब बातें करते हैं, लेकिन दिल की बात कभी नहीं करते। संवाद का माध्यम तो बदल गया, लेकिन चिट्ठी वाली वो उत्सुकता खत्म हो गई कि आगे का समाचार यह है कि...............। 
अब खूब हो रहा है हंसी-मजाक। चुटकले भेजे जा रहे हैं। आप गुडमॉर्निंग और गुडइवनिंग भी कर ले रहे हैं। मगर कम ही होंगे वो दोस्त और रिश्तेदार जो यह कहें कि बाकी सब तो ठीक है, किसी दिन घर क्यों नहीं आते। साथ बैठ कर चाय पीते हैं। संवादों के बीच भी सन्नाटा पसरा है। संबंधों में न संवेदना है न रिश्तों में पहले जैसी गरमाहट।
डाक बाबू से बात करते हुए कब कश्मीरी गेट आ गया, पता ही नहीं चला। उद्घोषणा हो गई है। गेट खुल गए हैं। डाक बाबू नमस्कार कहते हुए भारी-भरकम थला संभाले स्टेशन पर उतर गए हैं। सोच रहा हूं...... आज उनसे बात न करता तो संवाद की यह यात्रा क्या आगे बढ़ती? यह संवाद ही तो है जो मनुष्य ही नहीं, हर जीव को एक दूसरे से जोड़ देता है।
संचार के आधुनिक साधन बढ़ने के साथ एक बड़े वर्ग में बातचीत की आदत पहले जैसी नहीं रही। हम अपना काफी समय इंटरनेट पर बीता देते हैं। कहीं हम मनोरंजन करते हैं, तो कहीं आभासी संवाद। मगर प्राकृतिक रूप से संवाद का अभाव खटकता रहता है। इसलिए कुछ लोगों को निराशा होती है। जब कोई मित्र यह बताता है कि वह फेसबुक को कुछ समय के लिए अलविदा कह रहा है, तो मैं समझ जाता हूं कि यह उसी निराशा का नतीजा है, जहां संवाद तो है पर उसमें तसल्ली नहीं, जो महज एक चिट्ठी पाकर होती थी। 
अभी मुझे बिग बी की बातें याद आ रही हैं। दरअसल, इस संवाद में भी तो हमारा एकतरफा दबाव होता है। हम सामने वाले की बात ही नहीं सुनते। हम उसके जवाब का इंतजार ही नहीं करते क्योंकि हमारा धीरज चुक चुका है। हम अपने विचार ठेले जाते हैं ...
इस संवाद यात्रा के क्रम में मेरा स्टेशन आ गया है। राजीव चौक पर प्लेटफार्म नंबर तीन पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। मैं यहां अक्सर युवा लड़के-लड़कियों को ‘संवाद में लीन’ देखता हूं। अंखियों के बीच संवाद हो या शब्दों के साथ, मैं निश्चिंत हो जाता हूं कि यह टूटा नहीं है। जो संवादहीनता हमारी पीढ़ी में हैं, वह नब्बे के दशक में पैदा हुई इस नौजवान पीढ़ी में नहीं। एक दूसरे से झगड़ती, रूठती-मनाती इस पीढ़ी में गजब का संवाद है। वह एक दूसरे की झप्पियां लेती है और अहसास कराती है- मैं हूं न। 
प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर पहुंच गया हूं। यहां युवा निजता का अहसास करते हैं। एक दूसरे पर कंधा टिकाए बतियाते दिखते हैं। संवाद से पहले एक दूसरे से गले लगने या पीठ पर धौल जमाते हुए कुछ भी कह सकने का साहस है उनमें। सबके सामने खुल कर संवाद। तकनीक के साथ भी और तकनीक के बिना भी। संकोच के खोल से बाहर निकल रही है नई दुनिया की नई पीढ़ी।
..........नोएडा सिटी सेंटर की मेट्रो आ गई है। आखिरी डिब्बे में सवार होने जा रहा हूं। दीवार के साथ खड़े एक प्रेमी युगल को भी नोएडा जाना है। चुस्त समीज-सलवार में गोरी-चिट्टी उस युवती ने कहा- अब जाने भी दो न। देर हो रही है। युवक ने कहा- अभी नहीं-अभी नहीं। अगली में चली जाना। इस पर युवती का जवाब है- ‘ऐसा करते-करते तो तीन मेट्रो निकल गई है। अब जाने दो।’ ........ युवक ने इसका हाथ जोर से पकड़ लिया है। वह जोर लगा रही है। वह साथी को घसीट कर दरवाजे तक ले आई है।
मुझे नहीं पता इस गोरी का चेहरा गुस्से में लाल है या प्यार में गुलाबी हुआ जा रहा है। जो भी हो। उसका साथी कह रहा है- ‘अभी और बात करनी है तुमसे। रुक जाओ न, दूसरी में चली जाना।’ मुझे फिल्म हम दोनों के देव बाबू याद आ रहे हैं, जो संवाद का सिलसिला खत्म न होने देने के लिए किस तरह साधना से इसरार करते हैं- ‘.... अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं........।’
तो इस युवक का अपनी प्रिया से बातें करते हुए दिल अभी नहीं भरा। फोन पर न जाने कितनी बातें की होंगी। वाट्सऐप पर न जाने कितनी चैटिंग हुई होगी। मगर संवादों का अनंत सिलसिला खत्म नहीं हुआ इनका। युवती दरवाजे के एकदम पास आ गई है, लेकिन उसका मित्र है कि उसे अपनी ओर खींचे जा रहा है। अजीब कशमकश है। इस खिंचाव और जुड़ाव का बिंदु हम सब के जीवन में क्यों नहीं आता। क्यों नहीं एक दूसरे का दुख-सुख बतियाते हुए हम कहते हैं- अभी बैठिए न। फिर चले जाइएगा। 
......... मेट्रो का दरवाजा बंद हो गया है। दरवाजे की ओर बार-बार बढ़ रहे युवती के हाथ अब साथी के कंधे पर है। तो झूठा था यह गुस्सा। देख रहा हूं उसकी मुस्कान। दोनों फिर से बतियाने लगे हैं। मेट्रो चल पड़ी है। दरवाजे पर लगे शीशे के उस पार युगल को देख रहा हूं। संवाद की कड़ी टूटी नहीं है। वे यूं ही दीवार के सहारे खड़े रहेंगे या फिर फर्श पर बैठ जाएंगे। उनके सामने से अभी तीन और मेट्रो निकल जाएगी, लेकिन बतरस से मन नहीं भरेगा उनका। 
मुझे हीरामन की बहुत याद आ रही है। इतनी देर से मोबाइल की एक घंटी भी नहीं बजी है। कोई मुझे याद नहीं करता। तो मन की चिट्ठियों को भला कौन बांचेगा। तकनीक की दुनिया में उलझे, समय गंवाते हुए क्या सच में हम तसल्ली से बात कर पाएंगे कभी, जिसमें चिट्ठियों वाला एक कतरा सुख हो। 
चलिए और कुछ नहीं तो खुद से, अपने मन की मीता से इस गीत के साथ संवाद कर लेते हैं-
सजनवा बैरी हो गए हमार .....,
चिठिया हो तो हर कोई बांचें,
भाग न बांचे कोय, करमवा बैरी हो गए हमार
न कोई संदेश ना कोई खबरिया, 
रुत आए रुत जाए...

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