जगजीत गिल की तीन कविताएं

जगजीत गिल

उप संपादक पंजाबी त्रैमासिक साहित्यक पत्रिका ’अक्खर’,

काव्य संग्रह ’मील पत्थरां बिन शहर’ और ’रेत के घर’ प्रकाशित।

कहानी संग्रह ’हदबस्त नंबर 211’ प्रकाशन हेतु।
095920-91048

याद
याद अकेले,
कभी आती नहीं,
गाल सुर्ख़,
तो आंखें नम भी हैं।
बसती रुह अगर,
चेहरे में किसी के,
रुकी सीने में,
कहीं धड़कन भी है।
पगडंडी गांव की उसके,
मस्तिष्क में मेरे,
बजती पैरों में कोई,
पायल भी है।
गाया मल्हार तो लगा जैसे,
सूखी आंखों में मेरी,
सावन भी है।
रातें सर्द उसकी तो क्या हुआ,
पास उसके जलता बदन भी है……

मिल ही गया दस का नोट
मिल ही गया आखिर दस का नोट,
तकिए के नीचे से,
दे गया था अजनबी,
उसके बदन को सारी रात नोचने के बदले में,
आ जाएगी इससे दो या चार रोटियां उसके लिए,
या फिर आधा गिलास दूध,
भूखे बच्चे के लिए,
दमे की औषधि,
विकलांग पति के लिए,
एक या दो दीये,
रात में अन्धकार को मिटाने के लिए,
जो होंगे बहुत कम,
अन्धेरे की मात्रा के मुकाबले में……..
दस रुपये हैं पर्याप्त,
ज्वर से कराह रही बुढ़िया के लिए,
खिलौनों के अभाव में,
खुद ही की परछाई से खेलती गुड़िया के लिए,
मिल जाएगी भूरे बालों वाली एक डॉल,
जीने के लिए नहीं चाहिए,
रोटी या दूध जिसे,
जाने लगेगा अब तो मुन्ना भी स्कूल,
बैठ गया था जो घर पर,
कापी पेंसिल के अभाव में,
दस रुपये में हो जाएंगी,
उसकी सारी चिंताएं दूर,
होगा सूर्योदय,
जीवन का छंटेगा अंधकार,
जागेगा भाग्य,आएगी बहार,
मात्र रात भर किसी के साथ सोने से,
जिंदा हो कर भी जिन्दा न होने से,
जिस्म के जागने,आत्मा के सोने से……..!
मिल ही गया आखिर दस का नोट,
तकिए के नीचे से,
दे गया था अजनबी,
उसके बदन को सारी रात नोचने के बदले में,

एक स्वप्न तो देख लो यार !
प्रत्येक माह,मिलने पर वेतन,
देखूंगा जी कर,
अपने लिए भी एक दिन,
सोचता हूं हर बार,
अवश्य लूंगा इस बार
अपने लिए भी कुछ,
लगे जिससे कि जी रहा हूं मैं भी अपने लिए,
लेकिन निकलता जा रहा है जीवन,
माह दर माह,वेतन दर वेतन,
बिन छाते के सावन,
बिन चश्मे के नयन,
बिन प्रकाश के रैन,
सोचता हूं लूंगा इस बार साकिल,
महंगा बहुत हो गया है ईंधन,
पूछने पर कह दूंगा,
बहुत बढ़ गया है प्रदूषण,
बेचैन कर देता पर्यावरण
कह दूंगा-लगती नहीं गर्मी,
घिस चुकी कमीज़ न बदलने पर,
चुभती है नयी,ऐसा है मेरा बदन,
बहुत कुछ अनिवार्य है,
जो लेना बाकी है,
इन सब से पहले!
पत्नी के अंदर के परिधान,
बेटे के लिए धूम वाली मोटर साकिल,
बहन के लिए महंगा उपहार,
भाई के लिए प्रवेश शुल्क,
माता पिता को कराने हैं दर्शन हज़ूर साहेब के,
लौटाना है ऋण सब का,
क्षण क्षण करके,
चार दहाकों के हज़ारों दिन,
हज़ारों दिनों के लाखों घंटे,
लाखों घंटों के करोड़ों पल,
मेरे जीवन की बस यही है पूंजी,
जी लिये इन में से कुछ पल मां बाप के लिए,
कुछ भाई-बहनों,,बीवी बच्चों,
कुछ मित्रों,सखों,अपनों के लिए,
नहीं बचा पाया एक भी पल अपने लिए,
अपने सपनों के लिए,
जीऊँगा अपने लिए भी एक दिन,
लूंगा अपने लिए भी एक स्वप्न,
अगले माह,अगले वेतन या अगले जन्म……..!!!

6 comments

  1. जगजीत जी यदि अपनी पन्जाबी रचना”अक्खर” मैगजीन में भेजनी हो तो उसका पता या इ-मेल मुझे दे।मेरा इ-मेल;-lalitsharma27081956@gmail.com
    कैसे भेजनी हैं डाक से या फिर इ-मेल से।
    आभारी रहूँगा।
    राजेश”ललित”शर्मा

  2. जगजीत जी तीनों ज़मीन से जुड़ी कविताएँ अच्छी लगीं।
    राजेश”ललित”शर्मा

Leave a Reply