जरा नज़रों से कह दो जी…

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार

द लास्ट कोच : किस्त 7
आज मेट्रो में भीड़ की वजह से सीट नहीं मिली है। तो ऐसी हालत में हमेशा की तरह गेट के किनारे खड़ा हो गया हूं। हर स्टेशन पर यात्री ऐसे घुस रहे हैं, जैसे अगली मेट्रो कभी आएगी ही नहीं। मेरी हालत यह है कि मैं कभी अपने आफिस बैग को संभालता हूं तो कभी चश्मे को। इस धक्कामुक्की में कहीं यह टूट न जाए, यह चिंता सताने लगी है। लास्ट कोच का यह हाल देख कर मुझे ब्लूलाइन वाला दौर याद आ गया, जब एक दिन यात्रियों से ठसाठस भरी बस में मेरा चश्मा गिर कर टूट गया था। तब मैं गिरते-पड़ते किसी तरह घर लौटा था। सच में दूर की नजर कमजोर हो तो आदमी कुछ नहीं कर पाता, चाहे वह जीवन का मसला हो या भविष्य का। 
सैकड़ों यात्रियों को लादे हुए यह मेट्रो अभी विश्वविद्यालय स्टेशन पहुंची है। भीड़ के चक्रव्यूह को भेदते हुए कालेज के लड़के-लड़कियों ने भी घुस कर अपनी जगह बना ली है। पढ़ाई के बोझ में दबे और भविष्य की चिंता में डूबे ज्यादातर युवा चश्मा पहने दिख रहे हैं। ये फैशनेबल भी है और पारंपरिक भी। अगले स्टेश्न पर यात्रियों का फिर दबाव बढ़ा है। धक्कामुक्की में एक छात्रा का चश्मा गिर पड़ा है। इस भीड़ में भी नज़रों से नज़र मिला कर बात कर रहा उसका मित्र भी उसे नहीं संभाल पाया। चश्मा जिस भी यात्री के पैर के नीचे गया होगा, वह साबुत तो नहीं ही बचा होगा।
लड़की को उसके दोस्त ने सहारा दे रखा है। वह लगभग चीखते हुए बोली- ओ माई गॉड। अब मैं घर कैसे जाऊंगी। चश्मे के बिना मुझे साफ दिखता भी नहीं। दोस्त ने उसे दिलासा दिया-चिंता न करो। मैं तुम्हें घर पहुंचा दूंगा। तुम नया चश्मा बनवा लेना। लड़की रुंआसा हो उठी है। हालांकि बिना चश्मे में कहीं अधिक सुंदर दिख रही है। सच कहूं तो यह चश्मा अच्छे-भले दिखने वालों का चेहरा बेढब कर देता है। उम्र बढ़ने के साथ धुंधला दिखने की पीड़ा झेल रहे लोगों के लिए यह बेश्क मजबूरी है, मगर वक्त ने इसे फैशन स्टेटमेंट की तरह किस तरह बदल दिया है, यह दिलचस्प है।
बात कोई 20 साल से ज्यादा पुरानी है। एमफिल की पढ़ाई अधबीच में छोड़ मैं अखबार की नौकरी में लगा था। माइक्रोसॉफ्ट में अभी बड़े ओहदे पर काम कर रहे मेरे अनन्य मित्र बालेंदु दाधीच उन दिनों साथ ही थे। एक दिन उन्होंने कहा-.....यार नजर का नया चश्मा बनवाना है। तुम भी साथ चलो। कालेज के दिनों का बनवाया मेरा चश्मा भी पुराना पड़ चुका था। तो उनके साथ मैं भी चला गया। गर्मियों के वे दिन थे। चश्मा बनवा कर जब हम दफ्तर लौटे तो हमारे चश्मे के ग्लास पारदर्शी होने के बजाय डार्क नजर आ रहे थे। दफ्तर के साथियों ने पूछा भी कि ये क्या चश्मा बनवा कर ले आए? इस पर मेरे मित्र ने जवाब दिया- कुछ खास नहीं। यह धूप में डार्क और छाया में नार्मल हो जाता है। तब इस तरह के चश्मे का चलन शुरू ही हुआ था। 
तब तक मुझे यह अहसास हो चला था कि जो बात हम नजरों से कह सकते हैं, उसमें निगोड़ा चश्मा आड़े आ जाता है। वैसे भी कोई आपको देखता है तो सबसे पहले उसकी निगाह चश्मे पर ही जाती है। जूते और कमीज-पतलून का नंबर तो बाद में ही आता है। जाहिर है यह अब मेकअप, आभूषण और ब्रांडेड कपड़े से भी अहम है। तो हम उन दिनों चश्मे का ज्यादा खयाल रखने लगे थे। दोनों ये भी सोचते कि काश कार के शीशे की तरह चश्मे पर वाइपर भी लगा होता तो कितना अच्छा होता। बारिश के दिनों में आराम हो जाता।
मेट्रो अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही है। यात्रियों की भीड़ के बीच लड़की की रुलाई फूट पड़ी है। उसका मित्र उसे बार-बार समझा रहा है। ....... ये चश्मा हम जैसे लोगों के लिए किसी बुजुर्ग की लाठी की तरह है। इसके बिना चार कदम भी चला नहीं जाता। एक जमाना था जब लोग चश्मा बनवाते थे, तो पास-पड़ोस या घर-दफ्तर में इस बात पर दुख जताया जाता था कि अच्छे-भले आदमी की नजर कमजोर हो गई है। बेचारे को चश्मा लग गया है। जैसे कोई रोग लग गया हो। तब चश्मा पहनने वाले औरों से अलग दिखते। और बंदे को भी इस बात का अहसास रहता। मगर अब डाक्टर लोग बताते हैं कि जीवन शैली बदलने, खानपान में बदपरहेजी और भागदौड़ की जिंदगी में बढ़ते तनाव का असर आंखों पर भी पड़ता है, तब असल बात समझ में आती है। आज पास-पड़ोस से लेकर दफ्तर और बसों व मेट्रो में हर दूसरा तीसरा आदमी चश्मा लगाए दिखता है, तो मुझे आश्चर्य नहीं होता क्योंकि चश्मा तो मैं भी लगाता हूं। 
सफर के दौरान अक्सर कुछ लोग रंगीन चश्मा लगाए दिखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों में हीरो लोग कभी-कभार दिख जाते हैं। सोचता हूं काश कि हम भी ऐसा कर पाते। मगर यह मुमकिन नहीं। खासतौर से जिनकी नजर कमजोर हो चुकी है। माफ कीजिएगा रंगीन चश्मे पहनने वाले ये भद्र पुरुष वो लोग हैं, जिनकी नजरें न जाने कहां-कहां गड़ी होती हैं। कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना। 
मेरे खयाल से उस लड़की को कतई परेशान नहीं होना चाहिए। क्योंकि उसका दोस्त उसके साथ है। वह चश्मे के किसी भी शोरूम में जाएगी तो अपना पुराना फ्रेम भूल जाएगी। एक से बढ़ कर एक फ्रेम देख कर उसका दोस्त भी मचल जाएगा। नज़र छोड़िए, उसका नज़रिया भी बदल जाएगा। आज जिन्हें चश्मे की जरूरत नहीं, वे भी नए स्टाइल के चश्मे पहन रहे हैं। अब बोल्ड लुक के रंगीन फ्रेम वले चश्मे पहने मित्र-सहयोगी और सहयात्री दिख जाते हैं। याद कीजिए दादाजी और नानाजी के मोटे फ्रेम वाले चश्मे। जिन्हें हम लोग हाल के बरसों तक पसंद नहीं करते थे। अब ये फिर से लोकप्रिय हो गए हैं। मेरा यह चश्मा पुराण आपको शायद इसलिए न अखरे, क्योंकि आप में से ज्यादातर चश्मा पहनते हैं। आप समझ सकते हैं कमजोर होती नजर और चश्मे की अहमियत। 
राजीव चौक पर भीड़ छंट गई है। वह लड़की अपने दोस्त के साथ स्टेशन पर उतर गई है। कोच से मैं भी बाहर आ गया हूं। उन्हे मैं जाते हुए देख रहा हूं। अंग्रेजी के कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने लिखा है- पारखी नजर से जब कोई किसी चीज को देखता है तो इसमें छिपी ऐसी बहुत सी चीजें भी नजर आ जाती हैं जो आमतौर पर नहीं दिखाई देतीं। उन्होंने सही कहा। ये पारखी नजर प्रेमी की हो, तो वह प्रेयसी की आंखों में झील भी देखने लगता है। और अक्सर उसमें कूदने के लिए वह मचलता भी रहता है। सोचिए अगर उसे मेरी तरह चश्मा लग गया है तो भला क्या कूदेगा उस झील में, जहां नायिका उसके भावों की गहराई नापती हुई खुद भी डूबती-उतरती है। 
बहुत मुश्किल कर दी है इस बजरबट्टू ने। तभी तो फिल्म 'कोरा  कागज' में जया भादुड़ी के ये कहना पड़ा था-बैरन चश्मा बीच में आए दूरी मिटे कैसे.....रूठे-रूठे पिया मनाऊं कैसे.......। यानी रूठे पिया को मनाने में भी चश्मा सौतन बन जाता है। बहुत बारीक सी बात है, पर समझेंगी वही, जो इस प्यारी सी मुश्किल से गुजर रही होंगी। 
चलिए बातों ही बातों में मुझे नोएडा वाली मेट्रो मिल गई है। युवा यात्रियों के कारण इस लास्ट कोच में उल्लास है। एक मस्ती है। ज्यादातर युवाओं ने बेशक चश्मे पहन रखे हैं, लेकिन शीशे के आर-पार होती उनकी नजरें आने वाले कल पर है। वे नए भविष्य को गढ़ रही हैं। इस चश्मे ने कितना कुछ बदल दिया है- आपका चेहरा, आपका व्यक्तित्व, और आपका अंदाज, सभी कुछ। 
ये सब सोचते हुए मैंने अनायास ही अपना चश्मा उतार लिया है और रूमाल से पोंछ कर फिर से पहन रहा हूं। अब मुझे पहले से भी कहीं अधिक सब साफ दिख रहा है। सच में चश्मा भी यही चाहता है कि आप उसका ध्यान रखें जैसे आप कार से लेकर अपने कपड़े तक की देखभाल करते हैं। मगर हम में से कितने लोग ऐसा कर पाते हैं? खैर...... बगल में बैठे बुजुर्ग जेब में रखे मोबाइल से हेमंत दा का पुराना गीत सुन रहे हैं-
जरा नज़रों से कह दो जी
निशाना चूक न जाए.......
इसे सुनते हुए मैं मुस्कुराए बिना नही रह पा रहा। आप भी थोड़ा मुस्कुरा दीजिए। 

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