डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

 

उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच नदी की धार पर वे उनका अंतिम साथ दे रहे होंगे। फिर वे उनसे मुक्त हो जाएंगे। भैया उदास थे, बहुत उदास। फिर भी वे, पिता को अंतिम विदाई देने के लिए पूरी तरह तैयार थे।

मैं तट पर अकेली थी। दूर जाते पिता के पीछे आंसुओं का अर्घ्य लिए। यह जानते हुए भी कि पिता को पानी से बहुत लगाव था और यह भी कि वे गहरी से गहरी नदी भी पार करने का शौक रखते थे। उन्हें पानी की कमी बर्दाश्त नहीं होती थी। पिता आज गहरे, बहुत गहरे तक जल में डूब जाएंगे और फिर कभी पानी की कमी नहीं होगी उन्हें।

भैया लौट आए थे। वे अपनी जगह और मैं अपनी जगह जल में डूबे थे। गंगा अपनी गोद में पिता को पाकर अधिक प्रसन्न थी। यह प्रसन्नता 75 बरस पहले की तरह थी, गंगा के माथे सोने की बिंदिया चमक रही थी। उसने सुनहली जरीदार साड़ी पहन रखी थी। उसकी साड़ी सरसराती तो कई बार उसकी सुनहली चमक हमें भी स्पर्श कर जाती, फिर हम दिगन्त तक फैल जाते। वह रात में चांदी के बूटों वाली जरीदार साड़ी पहनती और चांदी की बड़ी सी बिंदिया भी लगा लेती है।

हमने गंगा को प्रणाम किया और तट के बाहर हो लिए। आज हम पिता को छोड़ आए थे। उन्होंने हमसे जाने को नहीं कहा, परंतु हम चले आए उनसे दूर, हमेशा के लिए। हम सचमुच उदास थे। तब मैं अवाक रह गई थी। मध्यम आकार की गंगाजली से जल उछल-उछल रहा था। मैंने जल को आंचल से पोछा, तो हैरान हुई कि पिता उसमें छल-छल हंस रहे थे। वे गंगाजली में अपनी तुष्ट मुस्कान बिखेर रहे थे।

हम घर पर थे। हम निश्चिंत थे कि पिता जी की हर वस्तु के साथ, हम अपनी समझ से जैसा चाहें बर्ताव कर सकते थे। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। जब भी किसी ने पिता की कोई वस्तु बाहर फेंकनी चाही, पिता हमें उसकी उपयोगिता समझाते, उसे संजो लेते थे, और जब पिता जी अपनी कोई वस्तु किसी को देना चाहते तब हम उसकी कीमत आंकते, उन्हें रोक लेते थे। प्रायः यह हुआ कि पिता अपना छाता, पीछे गलियारे में किसी को दे आते। वह थोड़ी सी हंसी उन्हें देता, तो वे जी भरकर हंसते-हंसते वापस आते। घर की ड्योढ़ी पर पहुंचते ही वे अपनी हंसी समेट लेते, गोया कि वह गलियारे से यहां तक पीछे कोई चमकीली लकीर छोड़ती आई हो और उस पर किसी की नज़र न पड़े। रोटी बेलती हुई भी, उनके बंद होठों को मां सुन लेतीं और बिना पलकें उठाए पूछतीं, ’’क्या फिर किसी को दे आए छाता ?’’

वे बोलते – ’’अरे तो क्या हुआ ? अब मैं जाता कहा हूँ छाता लेकर ?’’ टिकले पर बेलन अधिक तेजी से घुमाती हुई मां, आधी खुश होती और आधी दुःखी। उनके बांई ओर भैया-भाभी होते और दाहिनी ओर पिता। पिता जी का छाता बहुत बड़ा होता था। वे अक्सर कहते थे, ’’अरे इतना बड़ा छाता तो होना ही चाहिए कि कोई भीग रहा हो तो उसे भी बगल से ले लें। छाता, छाता की तरह से हो, छतरी नहीं।’’

एक बार दिसम्बर के अंतिम दिनों में पानी टपक पड़ा था। हुड़हुड़ाती हुई मां पिता का कंबल ढूंढ रहीं थी। कहीं नहीं मिला। पिता ने अपना फैसला सुना दिया था कि बंद कमरे में ठण्ड लगती ही कहां है, इसीलिए वे सिर्फ अपनी शाल ओढेंगे। बाद में, वह कंबल एक रात, भैया को पिछवाड़े ’चंदू बाबा’ के घर नज़र आई कंबल ओढ़े चंदू बाबा कुछ-कुछ खांस रहे थे और गोरसी पास में उदास पड़ी थी। पिता अपनी छांव और आग बांटते फिरते। अक्सर गलियारा मध्यम चांदनी से नहा उठता और मखमली धूप खिलखिला उठती। वे आनंद के व्यापारी थे, जो देते वही लेते।

आज पिता की हर वस्तु जहां जी चाहा, दान दी जा रही है। यहां तक कि उनकी गाढ़ी कमाई के कुछ रूपए भी कई गुना करके पंडित को दे दिए गए। भैया ने आज पंडित को दिए दान पर पिता का असंतोष नहीं देखा। दान देते हुए आज पहली बार वे पिता को पीछे छोड़ आए थे। पिता ने भी अपनी हर चीज़ के ख़ारिज होने पर भी आज कोई प्रतिवाद नहीं किया।

भोजन परोसने वालों के बीच मैंने एलान किया था – ’’सम्हाल कर परोसना, जूठन न बचे।’

भैया ने बेहद उदार हंसी हंसते हुए कहा – ’’बहना चिंता मत कर। पिता जी का काम है। बहुत बनवाया है। कुछ भी कम नहीं पड़ेगा।’’

’’नहीं, फेंकने से क्या लाभ ?’’ मैं अपने शब्दों पर अडिग थी।

’’बचेगा तो गलियारे में बांट देंगे।’’ और मैंने पाया पिता ठीक वहीं थे जहां मैं थी। वे तुष्ट थे। हमेशा की तरह मैंने आज उन्हें कंजूस नहीं समझा था।

पिता जी को बहुत सी भाषाएं आती थीं, जो उन्होंने किसी पुस्तक में नहीं पढ़ी और न कभी लिखीं। हमने उन्हें प्रायः पौधों और वृक्षों से बतियाते देखा था। कई बार पौधे उनके सामने निरीह खड़े होते, तो वे तुरंत समझ जाते कि उन्हें पानी चाहिए या खाद या कि उन्हें कीड़े काट रहे हैं, तो उन्हें नीमपत्ती की ’भुरकी’ चाहिए या राख। उनकी ज़रूरत के मुताबिक वे बहुत कुछ करते थे। कई बार पेड़ उनके सामने हंसते-हंसते खड़े हो जाते। तब पेड़ और पिता दोनों खुश होते। कुछ पल वे बतियाते। उनके सूखे फूल या फल पिता की आंखों में समाते और एक मीठी मुस्कान लिए पिता आगे बढ़ जाते। पीले पड़ते पेड़ों की दवा भी पिता जानते थे। फल-फूल से लदे पेड़ों के भीतर की छटपटाहट भी वे समझ लेते  और उनके फूल-फल पीछे गलियारे तक पहुंचा आते। वे पक्षियों और झब्बू कुत्ते से भी बतियाते थे। वे सब भी सबसे अधिक उनसे ही अपनी बातें कहते हैं, पर आज वे सब चुप थे।

हमने बचपन से देखा सुबह बिस्तर से उठते ही पिता अपने कर्मठ हाथों से बतियाते। फिर वे धरती को प्रणाम करते, उससे भी कुछ कहते और फिर आकाश की ओर आंखें उठाते। पिता उन सबसे बतियाते थे, जिन्हें हमने कुछ कहते नहीं सुना। वे उनसे भी बतियाते थे, जिनसे बातें करना हम व्यर्थ समझते थे। वैसे वे बहुत कम बोलते थे। पिता जी हमें कई बार डांट-डपटकर, गंगा स्नान कराने लाते। तब वे न मालूम क्या-क्या गंगा से भी कहते थे। उनके होंठ हिलते फिर अकस्मात सूर्य की ओर उन्मुख होते और सूर्ख हो जाते।

तब मैं चुपचाप गंगा को सुनती। सद्य स्नात बच्चे की तरह शोर मचाती दौड़ती हुई गंगा मुझसे कुछ-कुछ कहती थी। मैं उसे समझती हुई खुश होती, ठीक उन दिनों की तरह जब मैं बहुत छोटी होती, मां की गोद में। मां मुझे दूध पिलाती और मैं नन्हें हाथों उन्हें थपकती थप-थप। उस वक्त मां मुझसे बहुत कुछ कहती। वे जोर-जोर से कहतीं, आंखों को ख़ूब फैलाती, फिर मेरे गालों को स्पर्श करती, मुझ पर झुक जातीं। मां की भाषा या बोली न जानती हुई मैं, उनकी बातें समझ जाती और खिलखिला कर हंस देती। मां मेरे प्रत्युत्तर से लोट-पोट हो जाती, बेहद खुश गंगा की तरह। बचपन से ही मैं, पानी ठीक वैसा ही थपथपाती आई और आज भी वैसी ही खुश होती। पिता अक्सर आंखों से वर्जना प्रकट करते और अपनी ही तरह नाक बंद कर डुबकी लगाने कहते। मेरा मन न चाहता हो तो भी………। मैं पूछना चाहती क्यों, पर ऐसा पूछ नहीं पाती, क्योंकि मेरा प्रतिवाद पिता द्वारा स्थापित आदर्श के घेरे में नहीं था। वो अक्सर कहते ’’इधर हिन्दी कमजोर है।’’ मुझे उनकी बात नागवार होती क्योंकि मुझे लगता कि मेरी हिन्दी बहुत अच्छी है। मेरे चुपचाप रहने का प्रश्न, पिता, बिना पूछे ही समझते थे और कहते थे – ’’ओ और औ की स्पष्टता बताओ जरा ?’’ वे ’इ’ और ’ई’ के बीच अंतर स्पष्ट सुनना चाहते थे। तब मैं अपनी हथेलियों से मुंह छिपाए, अपने कंधे के पीछे हंसने का प्रयास करती थी।

समय के साथ-साथ गंगा तट से हम दूर होते गए। पिता का भी गंगा-स्नान का अंतराल बढ़ता गया। उस बीच सबके साथ पिता का संवाद सिमटने लगा। वे अपने भीतर और सिमटने लगे। उनके समर्थन प्रतिरोध और बाधाएं एक-एक कर उनसे छूटने लगे।

बहुत दिनों बाद पिताजी बोलने की तरह बोल रहे थे – ’’पूर्ण कुंभ है, संभवतः मेरे जीवन का आखिरी हो, मैं जाऊंगा।’’ भैया ने समझाईश दी – ’’इस उम्र में असंभव है। इतनी भीड़ और ठण्ड में आपके लिए कैसे संभव होगा ?’’ परंतु बरसों बाद वे इस बार बोलने की तरह ही बोल गए थे। दोबारा कुछ भी कहना उन्होंने उचित नहीं समझा।

आखिर हम उन्हें लेकर कुंभ पहुंच गए। तीन बजे रात से कंबल ओढ़े सब निकल पड़े थे। एक रस्सी से बंधे, सभी अलग-अलग। रास्ता एक था, लक्ष्य भी। सभी बढ़ रहे थे। केवल पिताजी रह गए, जहां रूके थे, बस वहां। वहां से निकलने के पूर्व ही उन्हें फैसला सुना दिया गया – ’’मुश्किल है। आप नहीं जा सकेंगे। आपके लिए गंगाजल यहीं आ जाएगा।’’

और हम सब जा चुके थे। वे वहीं रह गए अकेले। आज वे बिल्कुल निस्तब्ध थे। आंखे आकाश थीं और उनमें घनघोर बादल भी, बरसने का नाम नहीं। एक भयानक नीरवता थी उनमें। आज आंखें भी जीभ की तरह चुप व स्थिर हो रही थीं।

लौटते हुए सभी मेले में थे। मैं तेज़ कदमों बस तक पहुंची। वे खिड़की के अंदर सिमटे बाहर ताक रहे थे। वे सारी खिड़कियों में थे निस्तब्ध व निश्चल। मेले में होकर भी अपना न होना दर्ज कराते। आज मैंने स्वयं में पिता को अडिग पाया। अपने भीतर पिता का शोध मैंने पहली बार किया था मैं अपने साथ रिक्शा लेती आई थी। उन्हें सहारा देकर उतारा। रिक्शे वाले का भरपूर सहयोग था। असहयोग तो केवल उनका था, जो सहयोग के नाम पर सील-सिक्कों के साथ जमे थे। एक तो रिक्शे वाले पर पिल ही पड़ा। अपनी पूरी ताकत के साथ। उसका डंडा रिक्शा वाले के सिर के ठीक ऊपर था, पर उसके सिर पर पहुंचते-पहुंचते उसका बल कई दिशाओं में विकेन्द्रित हो गया। वह विकेन्द्रीकरण गुरूत्वाकर्षण के हिसाब से था। गुरूत्व था, कुछ भीड़ में, कुछ वर्दी में, कुछ रिक्शा की सवारी में और कुछ मेरी पर्स में। उसके डंडे की चोट रिक्शा वाले की सहनशीलता को नहीं पछाड़ पाई। इस वक्त मुझे पिता से अधिक रिक्शा वाले की चिंता थी। विवश होकर मैंने पर्स में हाथ डाला। मेरा हाथ जब पर्स से बाहर फैलने लगा धीरे से डंडे वाला हाथ खिसक लिया।

अब मैं बूढ़े पिता को सहारा दिए, नदी की धार में खड़ी थी। वे ठंड में थरथरा रहे थे। फिर भी उनके भीतर नदी की उमंग थी और बहाव भी। मेरी चिंता में सिर्फ पिता थे। शेष सब कुछ मैं जहां का तहां छोड़ आयी थी। पर इसके ठीक विपरीत थे, पिता। वे अपना सब कुछ कुछ अपने साथ लेते आए थे। वर्तमान के साथ अतीत और भविष्य भी। पहले उन्होंने याद किया उन्हें जो अब नहीं थे, फिर उन्हें, जो चाहकर भी आज यहां साथ नहीं आ पाए। पिता ने उन्हें भी याद किया जो पीछे की गली में होते और जिन्हें हम कभी अपने साथ नहीं ले जाते थे। उन्होंने घर की धंवरी बछिया और झब्बू तक को याद किया था, जैसे कोई अनमोल खजाना लुटा रहे हों।

मैं हैरान थी। पिताजी को मैंने बूढ़ा कैसे समझ लिया ? वे तो अपना समूचा संसार जैसे कंधे पर लेते आए थे, जबकि मैं सब कुछ छोड़ आई थी।

’’बस कीजिए, तबियत खराब हो जाएगी ?’’ मैं धीरे से बुदबुदायी पर पिता अब अपने लिए डुबकियां ले रहे थे, फिर वे खड़े हुए सूरज से कुछ कह रहे थे। गंगा के माथे पर सोने की बिंदिया थी, पिता ने अंजुली भर जल से उसे धोया तो उसकी चमक कई गुना बढ़ गई। वे लगातार जैसे गंगा से कुछ कह रहे थे। गंगा उनकी अंजुली में मुग्ध स्मिता सी स्थिर हो रही – निरभ्र, पारदर्शी। मुझे लगा पिता स्वयं गंगा हो गए, पीढ़ियों के आर-पार और पिता की जगह इस समय मैं खड़ी थी, उनकी थरथराती देह को सम्हालने के प्रयास में। मेरा जी चाहता था, गंगा को अपनी बाहों में लपेट लूं, जैसे बड़ी होने के बाद भी मुस्कुराती हुई मां को लपेट लेती थी और फिर मां और अधिक हंसती हुई छूटने का प्रयास करतीं। उनके रोम-रोम से वात्सल्य झरता, झर-झर। मैंने यह भी चाहा कि मैं वह सब जान लूं जो थप-थप करते जल और बुदबुदाते ओठों के मध्य था, पर ऐसा कुछ भी नहीं हो सका था। उन्होंने कांपती हथेलियों से बमुश्किल मेरा सिर छुआ था, मानो कोई वजनी ताज मुझे पहना रहे हों।

मैं अब उस ओर बढ़ रही थी, जिस दिशा से मैं पिता को साथ लेती आई थी और उन्हें छोड़कर पहली बार वापस हो रही थी, यह मानती हुई कि पिता…………नहीं लौटेंगे। मैंने पलट कर देखा तो गंगा उदास थी, मैंने उससे कहा नहीं, आज कुछ सुना भी नहीं। न जाने क्यों आज उसके वात्सल्य को मैंने शिशु भाव से थपथपाया भी नहीं। पर गंगा रूकी नहीं, वह बढ़कर मेरी आंखों में समा गई और मैंने उसे सबसे छिपा लिया था।

जीवन में पहली बार मैं गंगा को गंगाजली में लेती हुई आई हूं और उसे आलमारी में स्थापित कर दूंगी। आलमारी जो पिता के न होने पर भी, पूरी तरह पिताजी जी की है। इस वक्त तक पिता तस्वीर बनकर दीवार पर टंग चुके थे। सभी ने जान लिया, पिता हमेशा के लिए जा चुके हैं, ऐसी जगह जहां से कभी नहीं लौटेंगे। तभी दरवाजे पर झब्बू आ खड़ा हुआ और बिजली बछिया भी। लपक कर भैया ने पहली बार पानी भरा टब बाहर कर दिया। पिता मुस्कुराने लगे। अब वे हमें अपनी वह भाषा सिखाते होते हैं, जिसे सीखने में हमने बड़ी देर कर दी। जिसे उन्होंने जड़ से चेतन तक और बिन्दु से अनंत तक विकसित किया था, जो अलिखित और सार्वकालिक है।


डाॅ. मृणालिका ओझा

पहाड़ी तालाब के सामने

बंजारी मंदिर के पास,

कुशालपुर, रायपुर (छ.ग.), 492001

 

 

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1 Response

  1. Rishi Kamal says:

    रूला दिया ।

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