डॉ० छेदी साह की कविता ‘मुस्कान’

मुर्दे में भी डाल देगी जान
उषा की प्रथम किरणों सा
तुम्हारी लम्बी बाहें
संगमरमरी देह
बालों पर
छाई सावन की घटा
हिरणी सी आँखें
देखती हो जब तुम

और होती आँखें चार
तब तुम्हारी मीठी मुस्कान
मुझे लगती है
बड़ी ही कान्तिमान,

 

 

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