डॉ डी एम मिश्र की पांच ग़ज़लें

डॉ डी एम मिश्र

उ0प्र0 के सुलतानपुर जनपद के एक छोटे से गाँव मरखापुर में एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में जन्म । शिक्षा -पीएच डी ,ज्‍योतिषरत्‍न। गाजियाबाद के एक पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में कुछ समय तक अघ्यापन । पुनश्च बैंक में सेवा और वरिष्ठ -प्रबंधक के पद से कार्यमुक्त ।

विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में 400 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित और कई बार आकाशवाणी व दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण ।

‘इज्जतपुरम्’ , ‘उजाले का सफर’ , ‘ रोशनी का कारवॉ ’ , ‘यह भी एक रास्ता है’ ‘‘ आईना - दर - आईना ’’ , सहित कविता और गजल की मिलाकर नौ पुस्‍तकें प्रकाशित ।

कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से पुरस्कृत । अवधी अकादमी का ‘ ‘जायसी पंचशती सम्मान’ , भारत - भारती का ‘ लोकरत्न सम्मान’ , राष्ट्रीय साहित्य पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘ भारती -भूषण सम्मान ’ , प्रेमा देवी त्रिभुवन अग्रहरि मेमोरियल ट्रस्ट अमेठी द्वारा प्रशस्ति पत्र , , दीपशिखा सम्मान , रश्मिरथी सम्मान आादि !

 एक

रग-रग में कंटक-सी चुभती श्वास लिए भटकूँ
अपने काँधे पर मैं अपनी लाश लिए भटकूँ।

लोगों की हमदर्दी का मॅुहताज़ हो गया हूँ
सूनी-सूनी आँखों में आकाश लिए भटकूँ।

जश्न मनाओ तुम अपना मैं दर्द सहूँ अपना
सारे रिश्ते-नातों से अवकाश लिए भटकूँ।

मैंने मांगा इक छोटा–सा मीठा–सा झरना
ऐसा खारा मिला समन्दर प्यास लिए भटकूँ।

दो

हमने गर आसमाँ उठाया है
जगहें सबके लिए बनाया है।

सूर्इ ने कब कहाँ सिलाई की
धागे को रास्ता दिखाया है।

कोई तालाब बन गया होगा
कोठी ऊँची अगर उठाया है।

आँखें रखने का है गिला हमको
अंधों ने आइना दिखाया है।

बेसुध हो लोग सो गये जब-जब
हमने आवाज़ दे जगाया है।

तीन

घर से बाहर तो आकर हँसा कीजिए
दर्द सहकर सभी का भला कीजिए।

इस जहाँ का चलन भी निभा दीजिए
और अपने भी दिल का कहा कीजिए।

खोज में आप जिसकी परेशान हैं
पास में ही न हो ये पता कीजिए।

एक भी आप दुश्मन नहीं पायेगे
बस ,ज़रा और दिल को बड़ा कीजिए।

प्यार जैसा मज़ा पा लिया है अगर
मुस्कराकर सितम भी सहा कीजिए।
 
चार
 प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया।

रूप आँखों में किसी का यूँ बसा
अश्रु को आराधना तक ले गया।

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं
पीर को संवेदना तक ले गया।

हारना मैने कभी सीखा नहीें
जीत को संभावना तक ले गया।

मैं न साधक हूँ , न कोई संत हूँ
शब्द को बस साधना तक ले गया।

अब मुझे क्या और उनसे चाहिए
एक पत्थर ,प्रार्थना तक ले गया।

पांच
प्राणों में ताप भर दे वो राग लिख रहा हूँ
मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ।

मेरी जो बेबसी है, उस बेबसी को समझो
उजडे़ हुए चमन को मैं बाग लिख रहा हूँ।

दामन पे मेरे जाने कितने लहू के छींटे
धोया न जा सके जो वो दाग लिख रहा हूँ।

दुनिया है मेरी कितनी ये तो नहीं पता, पर
धरती है मेरी जितनी वो भाग लिख रहा हूँ।

कितने अमीर होंगे दस बीस फ़ीसदी बस
कमज़ोर आदमी का मैं त्याग लिख रहा हूँ।

सब लोग मैल अपनी मल-मल के धो रहे हैं
असहाय साबुनों का मैं झाग लिख रहा हूँ।
 

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3 Responses

  1. Pooja says:

    All poems are awesome 4th and 5th are the best.

  2. कुमारकलहँस} says:

    वैसे तो प्रत्येक ग़ज़ल लाजबाब है पर चौथी तो अद्भुद बन पड़ी है। छोटे बहर में जादू भरने की कला अगर किसी को सीखनी है तो जैसे एकलव्य ने द्रोणचार्य की प्रतिमा सामने रख अद्भुद धनुर्धारी बन गया था उसी तरह उसे इस ग़ज़ल को मंत्र मानकर इसी तरह लिखने की कोशिश करनी चाहिए। और मिश्र जी की लेखनी के बारे में क्या कहूँ, क्या है जो अबतक कहा न गया हो।बस यही कामना है कि आपकी लेखनी से ऐसे ही एक से बढ़कर एक नायाब मोती निकलते रहें। साधुवाद।

  3. Chhaganlal garg says:

    1- स्वार्थ एवं परवशता की चुभन मे व्यक्तित्व की कसक को उकेरती गजल सार्थक संघर्ष को बयां करती है बहुत ही लाजवाब गजल 2-असमानता व विषमता के कारण ज़िन्दगी जटिल हो गई है, कवि ने प्रतिको के माध्यम से शोषण की छाती पर कोठी का उदगम , ओर जागरण की आवाज से सोयों को उठाया हैं 3- घूटन सत्यता को स्वीकार कर आनंद के लम्हें तलाशता कवि गजल में अधिक मुखर हुआ हैं 4- लौकिक प्रेम में सम्पूर्ण जीवन की अंतिम रस की दशा का बिंब मिलता हैं जहां से अहोभाव, प्रार्थना के लिए असीम की तरफ कदम सीढीयाँ चढते हैं 5 – विवश व हताश व्यक्ति भीतर की ऊर्जा को पहचान नही पाता , कवि ने ऐसे बेबस व्यक्तियों में प्रतीकों के माध्यम से उत्साह का बीज बोया है । अन्तोत्गत्वा पांचों गजलें कवि की अमिट चेतना व नवनिर्माण की मिशाल है।
    छगन लाल गर्ग विज्ञ ।

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