डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” की तीन कविताएं

डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"
शिक्षा- एम ए (हिंदी, भाषाविज्ञान, संस्कृत, पत्रकारिता), एम फिल, पीएच डी,।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व वेब मीडिया तथा ई-पत्रिकाओं में अनेक लेख, कविताएँ प्रकाशित।
राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता।
अनेक संस्थाओं से सम्मानित।
सम्प्रति- अध्यापन, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा (भारत) में सेवारत।
मोबाइल -- 8909274612

  1. जीवन की किताब


समय का भी कोई पता नहीं 
उसकी भी कोई खता नहीं
सहसा एक दिन
ज़िंदगी के बिखरे पन्नों की
किताब बनाने बैठा था
तभी न जाने क्यों
न जाने कब कैसे
यादों के शब्दकोश से
कुछ अल्फ़ाज़ बिखर गए
और उन पलों से
रु-ब-रु करा गए जो
जिये थे कभी तुम्हारे साथ
और कुछ पन्ने
अधूरे से भी दिखाई पड़े
पता था ये मेरी ही नादानी है
पर उन पन्नों को अभी भी
समेट के बैठा हूँ जेहन में
क्योंकि
शायद फिर कभी
मौका मिला तो
उन्हें पूरा करने का
प्रयास करूँगा ।

2. किताब
आज मैं बहुत दुखी था
अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे
मैंने खुद से कहा-
अब यह दुख सहा नहीं जाता

तभी एक गंध चलकर
मेरे पास आई
एकदम जानी-पहचानी गंध
जो उठ रही थी
बगल में लगी किताबों की
मेरी अपनी ही आलमारी से

मैंने आलमारी से निकाली
कविता की एक पुरानी किताब
और उसके पन्ने उलटने लगा
मैंने देखा

वहां मेरा ही दुख दर्ज था
बस शब्द किसी और के थे
मैं जैसे-जैसे पढ़ता गया
शब्द भी मेरे अपने लगे
फिर मेरा दुख भी
मुझे अपना लगा
और आखिर में वह किताब भी

मैं अपना सारा दुख
किताब को थमा कर
निश्चिंत सो गया!

किताब से बेहतर कोई दोस्त नहीं!

3. यतीम

एक छ: साल का मासूम बालक
अपनी छोटी बहन को लेकर
मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा
भगवान से न जाने क्या मांग रहा था
कपड़े में मैल लगा हुआ था
मगर निहायत साफ,
उसके नन्हे नन्हे से गाल
आँसुओं से भींगे हुए थे
बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे
वह बिल्कुल अनजान अपने
भगवान से बातों में लगा हुआ था
जैसे ही वह उठा
एक अजनबी ने आगे बढ़ के
उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा
और पूछा : -"क्या मांगा भगवान से"
उसने कहा : -"मेरे पापा
इस दुनिया में नही रहे"
उनके लिए स्वर्ग,
मेरी माँ रात दिन रोती रहती है
उनके लिए सब्र,
मेरी बहन माँ से
कपड़े सामान मांगती है
उसके लिए पैसे..
पूछा "तुम स्कूल जाते हो".
हां ! जाता हूं, उसने कहा
किस क्लास में पढ़ते हो ?
नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता,
मां चने बना देती है
वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ
बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं,
हमारा यही काम धंधा है
बच्चे का एक एक शब्द
मेरी रूह में उतर रहा था
"तुम्हारा कोई रिश्तेदार"
न चाहते हुए भी मैं 
बालक से पूछ बैठा
पता नहीं, माँ कहती है
गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता,
माँ झूठ नहीं बोलती,
पर अंकल,
मुझे लगता है मेरी माँ
कभी कभी झूठ बोलती है,
जब हम खाना खाते हैं
हमें देखती रहती है
जब कहता हूँ
माँ तुम भी खाओ,
तो कहती है मैंने खा लिया था,
उस समय लगता है झूठ बोलती है
बेटा अगर तुम्हारे घर का
खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?
"बिल्कुल नहीं"  "क्यों"?

पढ़ाई करने वाले,
गरीबों से नफरत करते हैं अंकल,
हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा
बस पास से गुजर जाते हैं
अजनबी हैरान भी था
और बहुत शर्मिंदा भी
फिर उसने कहा
"हर दिन इसी मंदिर में आता हूँ,
कभी किसी ने नहीं पूछा
यहाँ सब आने वाले
मेरे पिताजी को जानते थे
मगर हमें कोई नहीं जानता
"बच्चा जोर-जोर से रोने लगा"
अंकल जब बाप मर जाता है तो
सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?

 

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2 Responses

  1. Deepak Bhardwaj says:

    Lajvab

  2. १ “जीवन की किताब के कुछ पृष्ठ अधूरे ही रहते है क्योंकि वे पूरा लिखने की नियति से नही किताब मे नही जुडते ।एक अभिप्शा बनी रहे पूर्ण करने की , ओर जिन्दगी की पुस्तक का यह सच जिजीविषा बनकर संसार देता रहे।”
    सुंदर भावों मे कसक का स्वर । बधाई ।
    २- कास यह होता, सीमित वर्ग के सुख दुख का सीमित वर्ग के अपनेपन का अहसास किताब को भव्यता के रूदन , अभिशाप से जब जोडना हो जायेगा, निश्चित ही आपकी कविता से भव्यता संतोष पायेगी । सार्थक बिंब की बधाई ।
    ३ ~बहुत संवेदनशील मनुष्यता की पहचान शायद आपके शब्दो की शक्ति का अहसास है जहां ” पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते है अंकल ” सब आ गया , नही रही आवश्यकता अन्य शब्द देने की । मार्मिक अभिव्यक्ति । मनुष्य के लिए ?

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