डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित की लघुकथा ‘बहुरिया’

रामानुज के घर में मातम का माहौल था, घर में छाती पीटने और रोने की जोर-जोर से आवाजें आ रही थी। रिश्‍तेदार और पड़ोसी ढांढस बंधा रहे थे, तो कुछ ऐसे भी थे जो मजमा देख रहे थे। रामानुज अपने बच्‍चों को सीने से लगाए दीवार के कोने में बैठा पथराई निगाहों से सब देख-सुन रहा था। रह-रह कर उसकी सिसकियां और बच्‍चों के रोने का कलरव निस्तब्धता को चीर देता और फिर से वही आलाप सुनाई देता।

हर कोई इस बुरे वक्‍त में दिलासा दे रहा था, तभी रामानुज की बुआ दूसरे रिश्‍तेदारों को पीछे की ओर धकेलती हुई आई और बोली “रामा, काहे रो रहा है? तू न जाने का? बहुरिया कितने दिनों से बीमार रहीं….. ऊ को तो जाना ही था, कितना इलाज करवाया पर ना बची। साहूकार से रुपये उधार लिए, शहर के बड़े डाक्‍टर को दिखाया पर ऊ ने तो शमशान जाने की ही जिद पकड़ रखी थी…….बच्‍चों को अनाथ करके जाना ही था तो मुई काहे रुपया-पैसा की उधारी चढ़ा गई।” रामानुज अपनी बुआ की बातों को सुनता रहा और उसकी काठ की गुड़ि‍या की तरह हिलती गर्दन यह भान करा रही थी कि बुआ जो कह रही, वह सच है।

रामानुज की बूढ़ी माँ भी अपनी ननद की बातों में हां से हां मिलाती हुई, हाथ की छड़ी को जमीन पर पटकते हुए बोली “अरे बड़की, मैं तो कहुं हूँ क्रियाकर्म की रस्‍मों के पूरा होने के बाद तू कोई नया रिश्‍ता ढूंढ, नई बहुरिया आयेगी तो बच्‍चों को माँ मिल जाएगी और यह भी बीती बातों को धीरे-धीरे बीसार देगा।” रामानुज की पथराई आंखों से बहते अश्रु रुक गए और अपनी पत्‍नी के पार्थिव शरीर को शैया पर लेटाने एवं अंतिम संस्‍कार की तैयारियों में तेजी से हाथ बंटाने लगा।

रामानुज की पत्‍नी राधा अक्‍सर, प्रेम-पल्‍लवित पलों में रामानुज से कहती थी “सुनो… यदि मैं मर गई तो क्‍या तुम नई बहुरियां ले आओगे?” और वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाती थी कि रामानुज उसके मुंह पर अपना हाथ रखकर कहता “शुभ-शुभ बोलाकर, मरे तेरे दुश्‍मन”। कभी-कभी रामानुज भी राधा को छेड़ते हुए तंज कस देता था कि “देखना राधे…..तू जो मरी तो मैं भी तेरे पीछे-पीछे यमपुरी चला आऊंगा”, तब राधा अपना हाथ उसके मुंह पर रख देती और क्षुब्‍ध हो जाती।
चिता धू-धू कर जल रही थी, सूरज भी अंधेरे के आगोश में सिमटता जा रहा था, जैसे-जैसे अंधेरा पांव पसार रहा था रामानुज की आंखों के सामने भी अंधेरा छा रहा था, उसे लग रहा था जैसे उस अंधेरे को चीरते हुए कोई सफेद रोशनी उसे इस बात का एहसास करा रही है कि यदि वह उस पूस की रात को अपनी बहुरिया की बात मान लेता तो आज यह अनहोनी न होती। आकाश की ओर उठते हुए धुंए के साथ-साथ विस्‍मृतियां भी ताजी होने लगी, उस दिन बहुरिया, रामानुज को कितना समझा रही थी, देखो आजकल लड़के-लड़कियों में कोई भेद नहीं है, हमारी दोनों बेटियां कहीं से भी बेटों से कम नहीं है, मास्‍टरनी जी सच ही कहती हैं बच्‍चे दो ही अच्‍छे। माँजी तो यूं ही पोते को देखने की जिद किए बैठी हैं, तुम्‍हें पता है ना डॉक्‍टरनी ने क्‍या कहा था……. इस बार मैं पेट से हुई तो जच्‍चा और बच्‍चा दोनों को खतरा हो सकता है”।

चिता की ज्‍वाला धीरे-धीरे शांत हो रही रही थी, रामानुज अपने सर को घुटनों के बल टिकाए आंखों से लुढ़कते हुए आंसुओं को रोकने की असफल चेष्‍टा कर रहा था, जी कर रहा था जोर-जोर से दहाड़ लगाकर रो ले और चिल्‍ला-चिल्‍ला कर सबको बता दे कि हां मैंने ही ली है राधा कि जान…. न मैं बेटे की जिद करता और ना बहुरिया भगवान को प्‍यारी होती है। कितनी पतिव्रता निकली रे राधा तू…. मरते-मरते मर गई पर बेटा दे गई।

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, मंगलूरु

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