डॉ विनीता राहुरिकर की दो कविताएं

 

डॉ विनीता राहुरिकर

M.Sc. botany, spec. Air microflora, plant pathology.M.A. drawing painting, हिंदीD.C.H.,  1. अब तक विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में 150 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन। जिसमे से 62 कहानियां। 2. पराई ज़मीन पर उगे पेड़- कहानी संग्रह,ऊँचे दरख्तों की छाँव में- कविता संग्रहघर-आँगन, पुस्तक मित्र  बाल कथा संग्रहTwo loves of my life- अंग्रेजी उपन्यासकविता संग्रह “सृजन” बोधि प्रकाशन से प्रकाशनाधीन कहानियो का अंग्रेजी सहित 10-12 भारतीय भाषाओं में अनुवाद।  आकाशवाणी, दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण।  Vinitarahurikar @gmail.com पता- श्री गोल्डन सिटी28, फेस-2होशंगाबाद रोडजाटखेड़ीभोपाल (म.प्र.)   तुम नहीं होती तो….  तुम नहीं होती तोअलसाया रहता हैखिड़की का पर्दासोया रहता है देर तकसूरज से नजरें चुराता…, तुम नहीं होती हो तोउदास रहता है चाय का कपअपने साथी की याद में…. साथ वाली कुर्सी भीअपने खालीपन मेंबैचेनी सेपहलू बदलती रहती है….. रात में तकियाबहुत याद करता हैतुम्हारी बेतरतीबउनींदी बिखरी लटोंऔर निश्चिंत साँसों कीउष्मीय आत्मीयता को…. तुम नहीं होती तोक्या कहूँमेरा हाल भी कुछपर्दे, कप, कुर्सीऔर रात में तकिये जैसा ही होता है….  घर… हाथ थामकर मेराले चलोगे कभीसमय के उस पारठहरे हुए शहर की गलियों मेंजहाँ मेरी यादों में खोएबेमतलब भटकते हुएतुम्हारेकदमों के निशानआज भी छपे होंगेउस धूल कोमाथे लगाउंगी…. घर का दरवाजाजो हर आहट परअपने पलड़ों कीआड़ से तकता थामेरी राह बड़ी बेसब्री सेऔर मुझे न पाकरअपनी पलकें बन्द कर लेता थाउदास होकरउसे एक बारसहला आऊंगी…. उस खिड़की सेबाहर झाकूँगी जहाँ से तुम सड़क पर चलतीभीड़ में तलाशते रहते थेमेरा चेहरा…. उस घर की दीवारों पर कान लगाकर सुनूँगी जिसने तुम्हारी बेकल धड़कनों को पनाह दीउस दीवार की छाती मेंक्या अब भीतुम्हारी धड़कनों मेंमेरा नाम गूँजता होगाएक बार तोसुन आऊंगी….. तुम्हारी बाहों केतकिये पर लेटकरउस छत पर देखूंगीकितने सपने बुने थे तुमनेभविष्य के उन जगरातों में… .. छत की मुंडेर पर बैठ पीले चाँद से सुनूँगीक्या कहते थे तुमउसे मेरे बारे मेंउसके फलक परकितनी लकीरों सेउकेरते थे मुझे…. सुनो समय के पार ठहरे हुए शहर में जो एक घर बनाया थातुमने मेरे लिएउसके आँगन के तुलसी चौरे परदीप जलाऊंगीएक बार तो उस घर कीचौखट पर माथा टेक आऊंगी…

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