तुम्हारी परी

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

आज बरसों बाद मैंने विक्टोरिया मेमोरियल की दहलीज पर कदम रखा था। तुम्हारे बिना, अकेले। तुम समझ सकती हो कि कितना बदल गया हूं मैं। तुम्हारा मुझे पता नहीं।

मैंने तुम्हारी परी को देखा। विक्टोरिया मेमोरियल के गुंबद पर उसी तरह खामोश। दोनों पंख फैलाए, आसमान की ओर मुंह उठाकर जीत का बिगुल बजाती हुईं। तब भी वो ऐसी ही थी, जब हम दोनों यहां आते थे। तुम कहती थी कि वो

हमारी मुहब्बत की जीत का बिगुल बजा रही है। पता नहीं आज किसकी विजय का बिगुल बजा रही है?

जब भी तुम उसे देखती तुम्हारे भी दो पंख निकल आते और तुम उड़कर उसके पास पहुंच जाती। आसमान में उड़ने की तुम्हारी तमन्ना। उफ्फ! कितनी बेचैन रहती थी तुम सारी बंदिशों को तोड़कर आसमान में उड़ जाने को। याद है! तुम कहा करती थी, ‘काश आसमान में उड़ते हुए प्रेम कर पाते। हमारे प्रेम के आगे दुनिया कितनी छोटी नज़र आती। विक्टोरिया मेमोरियल की ये झुरमुटें हमें दुनिया से नहीं बचा पातीं। पूरी दुनिया की निगाहें हमें घूरती रहती हैं।’

मुझे याद है तुमने कहा था, ‘यह परी हमारे प्यार की गवाह है।’

तुम्हीं ने तो इस परी का किस्सा मुझे बताया था

‘ये परी नहीं, देवी है देवी। एंजेल ऑफ विक्ट्री। जीत की देवी, जिन्हें ग्रीक में नाइकी के नाम से पूजा जाता था। रोमन में विक्ट्री।‘ मैं हैरान होकर तुम्हें देखता रहता और तुम कहानी पर कहानी सुनाए जाती कितना पढ़ती थी तुम!

लेकिन तुमने उसे देवी कभी नहीं कहा। तुम्हारे लिए वो एक परी थी। केवल परी।

तुमने कहा था,’ एक दिन हमारा प्यार जीतेगा और उस दिन देखना ये बिगुल शहनाई में तब्दील हो जाएगा। ये परी ही बनेगी हमारी मुहब्बत की गवाह।’

लेकिन आज बरसों बाद भी ये चुप है। गवाही नहीं देती। नहीं बताती कि उसने शहनाई बजाई भी थी या नहीं? और बजाई भी तो क्यों? बात तो कुछ और हुई थी…

जैसी तुम, वैसी ही तुम्हारी गवाह।

अभी उन झुरमुटों के पास भी जाऊंगा, जहां कभी हम बैठकर घंटों आसमान में उड़ने के सपने देखा करते थे। शायद कुछ सपने बिखरे हुए मिल जायं। शायद तुम्हारे दोनों पंख भी।

इस लघुकथा को आप लेखक की आवाज़ मेंं सुनने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें

 

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2 Responses

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