दिलीप कुमार की पांच लघुकथाएं

दिलीप कुमार

बलरामपुर जन्मभूमि

मुंबई कर्मभूमि

रचनाएं विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

संपर्क --9454819660

 

धूप की छांह

पुरानी दिल्ली, सीलमपुर की मंडी। लोग बाग खचाखच, तर-ब-तर, रेलमपेल। सहाफी शीबा ने मुझे मछली मंडी की राह दिखायी। चिलचिलाती धूप, सकीनन अप्रैल, की थी मगर मौसम की बेदर्दी साफ नुमाया थी। कल्लो मौसी की तलाश में थीं। जो मेरे शोध और उनके अखबार के लिये मौंजूं खबर उपलब्ध करा सकती थी। एक उजड़े गलियारे में जहाॅ तमाम जगह छत टूटी-फूटी थी, धूप-धूप बे-रोकटोक नीचे पहुॅच रही थी कल्लो दिख गयी। छाॅह में दुकाने सजी थीं, रास्ते में ठोकरों का अंदेशा था सो तिरछी धूप की तुर्शी दीवार के एक कोने से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। टिकी धूप की तुर्शी को झेलते हुए करीब तीस के वय की कल्लो वहीं बेखटके सो रही थी। हमने उसे झंझोड़ कर जगाया तो उसने नींद पूरी होने के बाद की अंगड़ाई ली। बिना कुछ पूछे ही वो अनवरत कहने लगी ’’अरे बाई जी, क्या करें? चार बजे पानी के लिये उठना, लाइन लगाना फिर नहाना-धोना, सुबह का धंधा। अब जाकर मौका मिला तो सोचा थोड़ा सा सो लूॅ। क्या करूॅ बाई जी जेठ, खसम, ससुर सब दिन भर कमरे में बैठे बीड़ी सुलगाते रहते हैं। शरम और धुएं से वहाॅ बैठा नहीं जाता। सो इधर छाॅह में झपकी मारने आ गयी। मैनें उसकी भूल सुधार करने का प्रयास किया ’’छाॅह में, कि धूप में सोने‘‘। वो हॅसी कुटिलता से, मगर बोली सहजता से ’’बाई हमारे घरों में छाॅह नहीं होती। हमें धूप में ही आराम और छाॅह महसूस होती है। शीबा को अपनी कहानी मिल गयी, उसने नोट किया और मैं इस धूप की छाॅह देखकर हतप्रभ थी।

बराबरी
गद्वौ मिली, बड़े सालों बाद। वो सयानी हो गयी थी। या शायद मेहनतकश तबके की लड़कियां जल्दी सयानी हो भी जाती हैं। शरीर खट चुका था, मगर उस पर सारे सौन्दर्य-प्रसाधन मौजूद थे। होड़ से बेपरवाह, अभावों में भी खुशमिजाजी। उसने मेरे पांव छूने के बाद चहकते हुए कहा , 'भाभी जी फिर जमीन लिखाने आई हो का?' मैंने स्वीकार की मुद्रा में सिर हिलाया तो वो खिलखिलाते हुए बोली 'वाह भउजी, आपकी पगार और साहब की पगार मिलकर गुलछर्रे उड़ते होंगे। दो-दो पगार और साहब का इतना मान।'

मैंने मुस्कराते हुए कहा 'तू कैसी है, कल्लू तुझे मारता-वारता तो नहीं है?'

उसने कहा, 'मारेगा कैसे, मेरी आधी पगार से घर चलता है। बराबर की गृहस्थी है, मगर आप जैसी इज्जत नहीं। जैसे साहब आपको देते हैं, रूपिया, पइसा, जमीन, जेवर, और मान। नसीब चमके हैं आपके भउजी, जो भैया को पायी।'

तब तक गाड़ी का हार्न बजा। राजेश ने वक्र नजरों से उसे देखा तो मैं सिहर उठी। उसने मेरे पांव छुए और हंसती हुई गद्वौ चली गयी। गाड़ी में बैठते ही मुझे राजेश ने डपटा, 'लेक्चरर होकर भी तुम्हें इतनी तमीज नहीं। बीच सड़क पर महरी से इतना घुलते-मिलते तुमने ये नहीं सोचा कि तुम प्रोफेसर राजेश की बीवी हो। तूने औरत क्यों बनायी हे भगवान...' कहते हुए उन्होंने मुझे हिकारत की नजरों से देखा और कार के बाहर थूक दिया। मैं सोचने लगी कि गद्वौ का पति भले ही उसे मारता-पीटता है, वो अशिक्षित है, मगर वहाॅ पर जीवन साथी से बराबरी की भागीदारी है। कमाती तो मैं भी हूॅ। सारे रजिस्ट्री, खरीद-फरोख्त मेरे नाम पर होती है, पर सिर्फ कर बचाने के लिए। मैं उस थूक की पीक को घूर रही थी। गद्वौ गयी नहीं थी, पीक के उस पार खड़ी मुस्करा रही थी। पीक की घिन आहिस्ता-आहिस्ता हम दोनों के वजूद में पेवस्त हो रही थी। कुछ फासले से मुस्करा रही गद्वौ मेरा दर्द समझ चुकी थी। सच में, दर्द का रिश्ता तुरंत बन जाता है और इसकी भागीदारी में बना पुल टिकाऊ भी होता है।

 

नाम चोर
बड़े अरमान से इसकी माॅ ने उसका नाम माधुरी रखा था। फिल्मी नायिका माधुरी दीक्षित की तर्ज पर। ये नाम उसके माॅ की पसंद की नायिका का था। जो स्वयं के नाम को गंवा कर अब सिर्फ बड़की बहू बनकर रह गयी थी। माधुरी को न सिर्फ अपना नाम खासा पसंद था, बल्कि फोटो वाली नायिका जैसा नाम होने से वो खुद को काफी महत्वपूर्ण भी समझती थी। अन्य लड़कियों से इतर उसे माधुरी सुनकर गर्वानुभूति होती थी। वजीफा आया तो उसकी नन्हीं आंखों में तमाम सपने सज गये। मोची की बेटी माधुरी ने सांवरिया सूट एवं सैंडिल के सपने देख डाले। मगर सपनों के सच होने में एक तकनीकी खामी निकल आयी। न जाने कैसे कागज में उसका नाम माधुरी के बजाय मोनिका दर्ज हो गया था। सरकारी नियमानुसार उसे मोनिका बनकर ही वजीफा मिल सकता था, और भविष्य में अन्य प्रस्तावित सरकारी सुविधाएं भी। मैनें उसे अपना कमीशन काटकर ढाई सौ रूपये दे दिये। सांवरिया सूट भी आया सैंडिल भी, मगर उसके चेहरे का उल्लास नदारद था क्योंकि वो माधुरी से मोनिका बन चुकी थी, महज ढाई सौ रूपये के लिये। मैं उस अनमनी, अबोध सी बच्ची को देखता तो खुद से ही सवाल करता कि इंडिया बनाम भारत के नाम में इतना फर्क है। इंडिया में जहाॅ एक ओर बड़े लोग अपना नाम चमकाने में लिये विज्ञापनों की सेवाएं लेते हैं, वहीं भारत में गरीब का नाम महज ढाई सौ रूपये के लिये बदल गया। बच्ची मुझे सवालिया नजरों से देखती तो मैं परेशान हो जाता। वह मानो मुझसे कहती हो कि तुमने ही मेरा नाम चुराया है कमीशन के लिये। मैं खुद से पूछता कि मैं कमीशन खोर हूॅ या नामचोर।

कुटीर उद्योग
मूने और जोगे चुनाव में जी-जान से जुटे थे। सुबह-शाम, झाड़ू बुहारन, तेल-फुलेल, दवा-दारू, बांस-बल्ली किसी चीज की कमी न थी। पीठासीन अधिकारी था मैं, सो उन्होंने चुनाव में मेरी भरसक मदद की। नेपाल से सटे गांव में काफी उपद्रव होता था। यहां मार-पीट तो कम होती थी मगर बूथ में पानी डालने की घटनाएं ज्यादा होती थीं। प्रशासन ने काफी सख्ती कर रखी थी। चुनाव सकुशल सम्पन्न हुआ तो मैंने भी राहत की सांस ली। मैंने मूने एवं जोगे को धन्यवाद दिया। उन पिता-पुत्र के चेहरे पर मैंने असमंजस देखा। मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, 'तुमने मेरी मदद की है, मेरे खान-पान का ख्याल रखा। मैं भी तुम्हारी मदद करूॅगा।'  मूने हंसते हुए बोला, 'साहब, ई इलेक्शन का आखिरी दौर था ना?'

मैंने उसे तसल्ली दी, 'हां, लेकिन मैं यहाॅ का ग्रामोद्योग अधिकारी हॅू। इलेक्शन बाद तुम्हारी कुछ और मदद करूॅगा। तुम लोग कोई छोटा-मोटा कुटीर उद्योग लगाना, मैं लोन वगैरह दिलवा दूंगा। जागे मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोला, 'साहब, ई बार्डर कब खुलेगा?'  मेरे सुनहरे ग्रामोद्योग के प्रस्ताव को नकार कर उसके बार्डर खुलने के सवाल पर मैंने नुक्ताचीनी की, तो जागे ठंडी सांस लेते हुए बोला ’’साहब बप्पा जिन्दगी भर धंधा खातिर कर्जा के जुगाड़ में रहे, कभी कुछ न मिला। जो कुछ अंटी में था वो भी साहब-सहबान खा गये। हम खुद इंटर फेल हैं। हमारा धंधा तो यही है कि साइकिल पर दो बोरी यूरिया लाद कर नेपाल ले जाते हैं रोज। उसी से हमारी रोजी-रोटी चल जाती है। है ना गांव का ही बढ़िया कुटीर उद्योग। न भर्ती, न कमीशन। उसके नायाब ग्रामोद्योग के नुस्खे से मैं अवाक था।


फांका
बमुश्किल, हांफते हुए, पैदल ही नजरें बचाकर उस राह से निकल जाना चाहता था कि यार न मिल जाये। इस जाड़े में, कड़की में, खामखां चाय-पानी का खर्चा। मगर यार मिल ही गया। दोनों बगलगीर होकर मिले। दोनों बाउम्मीद थे। अगरचे हम दोनों मेहनतकश थे, मगर फांके थे। मैं सरकारी मुलजिम तो बन गया था, मगर पगार अभी भी दूर की कौड़ी थी। यार बेरोजगार था, मगर उसे खुदा पर भरोसा था। ज्यों-ज्यों उसके पारिवारिक खर्चे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे उसकी इबादत भी बढ़ रही थी। हम सस्ती चाय की फिराक में थे कि एक हजरात ने दस्तक दी, 'अल्लाह भला करेगा। मैं अपनी आदत के मुताबिक अल्लाह के उन्हीं बन्दों को भीख देता था जो किसी काबिल नहीं होते थे, बाकियों को मेहनत की सीख देता था। मैंने उस मांगने वाले को सख्त नजरों से देखा और घुड़की दी, 'शर्म करो, जाओ कहीं मेहनत करो।' यार ने भी उसे खूंंखार नजरों से देखा। वो भिखारी सहम एवं वो पीड़ा मिश्रित स्वर में बोला , 'अल्लाह के वास्ते मना मत करना। मैं बेबस हूं, मेहनत से जी नहीं चुराता मगर करूॅ तो कैसे‘‘? यह कहते हुए उन्होंने अपनी कटी टांग आगे बढ़ा दी। उन्हें देखकर मैं चिहॅुक पड़ा, सहसा यकीन न हुआ कि ये भीख मांग रहे हैं। जेब की आखिरी नेमत दस का नोट उन्हे थमाया, तो वे हम दोनों को दुआएं देते चलते बने। याद आया कि वे जहूर अली थे। हमारे स्कूल के सामने उनकी पंक्चर बनाने की दुकान हुआ करती थी। बच्चों को मेहनत न पड़े इसलिये वे बच्चों की साइकिल में हवा मुफ्त भरा करते थे। वे पंप मारते हुये अक्सर कहते ’’जवानी मेहनत के लिये है‘‘। मेरे मुॅह से बेसाख्ता निकला ’’अगर जवानी मेहनत के लिये है तो बुढ़ापा सम्मान से जीने के लिये क्यों नहीं। यूं किसी मेहनतकश का फकीर बनना मुझे चुभ रहा था। उनके फांके की तुलना में मुझे मेरा फांका बेमानी लग रहा था। यार मेरी मनोदशा को भाॅपकर मुस्करा रहा था।

 

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