दीप्ति शर्मा की पांच कविताएं

दीप्ति शर्मा

दिल्ली

  1. काले तिल वाली लड़की

 

कल तुम जिससे मिलीं

फोन आया था वहाँ से

तुम तिल भूल आयी हो

सुनो लडकियो! ये तिल बहुत आवारा होते हैं

चन्द्र ग्रहण की तरह

काला तिल आनाज नहीं होता 

ये पूरी दुनिया होता है

जिससे मिलो सँभल कर मिलो

ये मिलना भी ज्वार भाटा है, जिसमें तुम डूब जाती हो

और भूल आती हो तिल

ये तिल अभिशाप नहीं

देखो!

मेरे हाथ में भी एक तिल है

अम्मा ने कहा खूब पैसा होगा

मुट्ठी तो बाँधों जरा

पर मुट्ठी कहाँ बँधी रही है 

जो अब रहेगी

खुल ही जाती है

और दिख जाता है तिल

ये छुप नहीं सकता

और दुनिया ढूँढ लेती है

ऐसे ही 

धूप नहीं पड़ती

देखो पर्दा लगा है

पर्दे के भीतर भी

लड़की बदचलन हो जाती है

और तिल आवारा

और तुम हो कि नदी में 

छलांग लगाती हो

 

  1. पर्वत पिघल रहे हैं

 

घास, फूल, पत्तियाँ 

बहकर जमा हो गयीं हैं

एक जगह 

हाँ रेगिस्तान जम गया है

मेरे पीछे ऊँट काँप रहा है

बहुत से पक्षी आकर दुबक गये हैं

हुआ क्या ये अचानक 

सब बदल रहा

प्रसवकाल में स्त्री

दर्द से कराह रही है,

शिशु भी प्रतीक्षारत !

माँ की गोद में आने को

तभी एक बहस शुरू हुई

गतिविधियों को संभालने की,

वार्तालाप के मध्य ही शुरू हुआ

शिशु का पिघलना

पर्वत की भाँति

फिर जम गया वहाँ मंजर

रूक गयी साँसें

माँ विक्षिप्त 

मृत शिशु गोद में लिए 

विलाप करती

आखिर ठंड में पसीना आना

आखिर कौन समझे

फिर फोन भी नहीं लगते

टावर काम नहीं करते

सीढ़ियों से चढ़ नहीं पा रहे

उतरना सीख लिया है

कहा ना सब बदल रहा है

सच इस अदला बदली में

हम छूट रहे हैं

और ये खुदा है कि 

नोट गिनने में व्यस्त है।

 

3.आहट 

घने कोहरे में बादलों की आहट

तैरती यादों को बरसा रही है 

देखो महसूस करो 

किसी अपने के होने को 

तो आहटें संवाद करेंगी

फिर ये मौन टूटेगा ही

जब धरती भीग जायेगी

तब ये बारिश नहीं कहलायेगी 

तब मुझे ये तुम्हारी आहटों की संरचना सी प्रतीत होगी

और मेरा मौन आहटों में 

मुखरित हो जायेगा।

 

4.मुट्ठियाँ... 

 

बंद मुट्ठी के बीचों - बीच 

एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह

कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं 

रात की चादर की स्याह

रंग में डूबा हर एक अक्षर 

उन स्मृतियों का 

निकल रहा है मुट्ठी की ढीली पकड़ से 

मैं मुट्ठियों को बंद करती 

खुले बालों के साथ

उन स्मृतियों को समेट रही हूँ 

वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी 

धीरे - धीरे तेज होकर 

स्मृतियों को देदीप्यमान कर 

आज्ञा दे रही हैं 

खुले वातावरण में विचरो ,

मुट्ठियों की कैद से बाहर 

और ऐलान कर दो 

तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो 

बस यूँ ही धीरे - धीरे 

मेरी मुट्ठियाँ खुल गयीं 

और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ 

सदा के लिये 

 

  1. हर रिश्ता विश्वास का नहीं होता

 

उस बारिश का रंग दिखा नहीं

पर धरती भींग गयी

बहुत रोई !

डूब गयी फसलें

नयी कली ,

टहनी टूट लटक गयीं

आकाश में बादल नहीं 

फिर भी बरसात हुई

रंग दिखा नहीं कोई

पर धरती

कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई

लाल ज्यादा दिखायी दी

खून सी लाल

मेरा खून धरती से मिल गया है

और सफेद रंग 

गर्भ में ठहर गया है,

 शोषण के गर्भ में

उभार आते

मैं धँसती जा रही हूँ

भींगी जमीन में,

और याद आ रही है

माँ की बातें

हर रिश्ता विश्वास का नहीं

जड़ काट देता है

अब सूख गयी है जड़

लाल हुयी धरती के साथ 

लाल हुयी हूँ मैं भी।

 

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