देह में स्त्री या पुरुष होता ही है

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार, किस्त 18

29 अक्टूबर, 2015

मिस्र में टैगोर

अहमद स्वाकी मिस्र के जाने-माने कवि थे । नाटककार भी । उन्हें आधुनिक मिस्र साहित्य का पायोनियर माना जाता है । उनका जन्म 16 अक्टूबर, 1868 में हुआ । 14 अक्टूबर 1932 तक उन्होंने अपने जीवन काल में कई नाटकों और कविताओं का सृजन किया । ‘लैला मजनूँ’ उनका पहला नाटक था । 1926 में जब नोबेल विजेता टैगौर मिस्र गये, तब स्वाकी ने उनके स्वागत में विशेष गोष्ठी की थी और तब से उन दोनों के बीच गहरी दोस्ती रही । उन्होंने टैगौर से प्रभावित होकर परंपरागत शास्त्रीय अरबी पैटर्न को अपनाया और उदासीन, अभिनव, अलंकृत देशभक्ति कविता का सृजन किया। कोएरो स्थित उनका म्यूजियम आज भी इजिप्ट और विश्ववासियों के लिए श्रद्धा का केंद्र है । 11 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन (28 जनवरी से 4 फरवरी 2016 ) के दरमियान भारतीय लेखकों का दल इस स्थल का अध्ययन एवं भ्रमण करने पहुँच रहा है । इस दल के साथ मैं भी । मन में उमंग है मिस्र देखने की ।

नमक, मिर्च, मशाला और साहित्य

गृहस्थी के सामान के साथ आपको किताबें भी एक स्टोर पर मिल जायें तो कैसा हो ! यह काम कर दिखाया है राजकमल प्रकाशन ने । मैं नहीं जानता यह साहित्य की दुनिया में बिलकुल अलग तरह का प्रयोग है या नहीं, पर इतना तो है ही कि अब दिल्ली में सन एग्रीफ्रेश के 10 स्टोर्स में ज्ञान, मनोरंजन और जीवन के लिए उपयोगी हर क़िस्म की किताबें पुस्तक प्रेमियों को मिलेंगी।

 

पान और बाज़ार

 “ऊँच संग धरे तो खाये बीड़ा पान, छोट संग धरे तो कटाय दून्नो कान ।”  यह  छत्तीसगढ़ी कहावत सच हो, न हो –बाज़ार अब आपको ऐसा पान परोसने वाला  है, जिसे खाने पर भले ही आपकी जेब न कटे पर एक दिन पान खाने के स्वाद और आनंद के पर ज़रूर कट सकते हैं । इन दिनों पान ठेलों और डेली नीड्स स्टोर पर ऐसे रेडीमेड पान खपाया जा रहा है, जिसे महीनों रखकर खाया जा सकता है । आलसी लोगों को भले इससे फ़ायदा हो !अभी इसका मूल्य 2 रुपये रखा गया है। जैसे-जैसे आपकी आदत बदलती चली जायेगी, इसका मूल्य बढ़ता चला जायेगा बाज़ार ।बासी खिलाने वाला बाज़ार ! तूझे और तेरी बुरी नज़र को मैं किस मुँह से गाली दूँ !

 

जीवन चलने का नाम

टी.वी तो कभी-कभी ही देखता हूँ । दरअसल देखना ही नहीं चाहता । कुछ दिनों पहले एक रेडियो ख़रीद लिया है । आज चालू किया तो एफ़ एम पर बज रहा था :के रस्ता कट जायेगा मितरां के बादल छँट जायेगा मितरां के दुख से झुकना ना मितरां के एक पल रुकना ना मितरां होए ! जीवन चलने का नाम…..

 

मामा और मौसा

 ‘मामा’ और ‘मौसा’ तब तक रहेंगे, जब तक ‘माँ’ रहेगी और ये दोनों जब एक जगह हों, माना कि वहाँ माँ भी न हो; तब मानस का काम केवल ‘सुनना-गुनना’ क्यों न हो !

 

विडंबना

आधार चाहे कुछ भी हो, तर्क भी चाहे कुछ भी हो !देश में कौन-सी ऐसी जाति होगी जो आज अपने समुदाय को मिलने वाले आरक्षण का लाभ नहीं उठाना चाहेगी । और ऐसी कौन-सी राजनीतिक पार्टी होगी जो आज आरक्षण समाप्ति के पक्ष में होगी ?

 

1 नवंबर, 2015

भूख हड़ताल के 15 साल

इरोम शर्मिला का पक्ष लेना कुछ लोगों की नज़र में अराजकता को समर्थन देना हो सकता है किन्तु उनकी ऐसी उपेक्षा करना अमानवीय और अजनतांत्रिक भी कि मणिपुर में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रही किसी महिला को भूख हड़ताल करते 15 साल पूरे हो जायें और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ़्स्पा) को पूरी तरह हटाने पर सियासत एक लम्बे मौन का शिकार रहे ।

 

तभी तो

वैज्ञानिकों ने अपने हालिया शोध में कहा है कि – ”इंसान में केवल माता-पिता के जींस ही नहीं, बल्कि वायरस, बैक्टिरिया और संभवत: दूसरे इंसानों के जींस या परजीवी भी हो सकते हैं ।” तभी तो कुछ लोग ऐसी हरक़त करते पाये जाते हैं ।

 

लिखना और भूल जाना

पढ़ने का कोई प्रहर नहीं होता । पढ़ने के लिए परिचिति भी ज़रूरी नहीं ।बहुत कुछ हम यूँ ही पढ़ते चले जाते हैं । भला लगता है तो गहरे से उतर चलते हैं अन्यथा फौरन वहाँ से विलग हो लेते हैं ।कल रात 12.01 बजे हिंदी के वरिष्ठ कथाकार-कवयित्री आदरणीया कमल कुमार जी काउदार और रचनात्मक संदेश पढ़ने के बाद ऐसा ही कुछ उभरता रहा मन में ।

 

वे कल ‘व्यंग्य यात्रा’ (डॉ. प्रेम जनमेजय) पर प्रकाशित मेरी दो कविताओं (मै अबतक कैसे ज़िंदा हूँ और बाबूजी से बस्स यही सुना है) पर एक साथ अपनी प्रतिक्रिया देकर जैसे मेरा हौसला आफ़जाई कर रही थीं।

 

उनकी इस अहेतुक बधाई पर मुझे भी सीखने को कुछ मिला कि – कवि का काम है केवल लिखना, छपना और भूल जाना । वह किसी भी रूप में छपे, गुणीजन उसका रंग-रूप अंततः पहचान ही लेते हैं । और यही कवि के लिए सच्चा पुरस्कार भी होता है ।

 

प्रूफ रीडर शरणम् गच्छामि

हे प्रूफ़रीडर महाभाग !मैं अब समझा : संपादक महोदय नहीं, उनका श्रेष्ठ संपादन कला और योग्यता भी नहीं, पत्रिका तो कतई नहीं; आलोचक हूँह, सबसे ताक़तवर हैं तो केवल आप !आप की सुदृष्टि पड़ जाय तो कई रचनाएँ एक बन सकती हैं – एकोहम् ! और एक रचना कई- बहवोश्यामः !!हम कविगण नाहक संपादक की स्तुति करते हैं ।क्षमा हे देव ! आप से कर्ण-मंत्र मिल गया – प्रूफरीडर शरणम् गच्छामि !    ( लेकिन चुपके से व्यंग्य यात्रा के संपादक का आभार, सर डर है, कहीं आपका प्रूफ रीडर हमारी बात सुन तो नहीं रहा न ! )

 

मन का घर

(बहन के जन्मदिन पर)

शादी के बाद बहनों का घर बदल जाता है पर उनका मन कभी नहीं बदलता । उनके मन के घर में माँ-बाप, भाई-बहन, काका-काकी, दादा-दादी का एक अदृश्य और स्थायी डेरा होता है ।ऐसे ही मन वाली है मेरी छोटी बहन भवानी!

 

अरे वाह !

पढ़ने को मिला आज – विश्व के सूखाग्रस्त क्षेत्र अटाकामा का मरुस्थल दशकों बाद गुलजार हुआ है यानी वहाँ भी फूल खिल उठे हैं । कहते हैं यह बदलाव वहाँ अलनीनो की वजह से आया है ।

 

बिटिया के 7 दीये !

प्रगति बिटिया रथ ने अपने फ़ैशन इंस्टीट्यूट (काईट कालेज/जेडी) की ओर से इस साल दीपावली बाज़ार के लिए 7 तरह के दीये डिज़ाईन की है ।भई, एक नज़र में हमें तो बहुत पसंद आये ये दीये ! हम तो उसी के बनाये दीयों से इस बार घर रौशन करेंगे !हम दोनों ने मोल-भाव किया तो बोली – केवल 10 परसेंट की छूट संभव है !

 

स्मरणीय यात्रा

कविता और आलोचना की बहुचर्चित पत्रिका ‘यात्रा’ (गोरखपुर) में सुयोग्य और प्रतिष्ठित आलोचक गणेश पांडेय जी ने 21 वीं सदी की कविता को केन्द्र मेंरखकर मुझ अपरिचित के कवि-कर्म पर आलोचनात्मक लेख लिखा है ।साहित्य का सच्चा प्रोत्साहक और पारखी गढ़ों, मठों, कुनबों, राजधानियों, बाज़ारों से अन्यत्र भी होता है ! – विश्वास हो गया । ‘यात्रा’ सदैव स्मरणीय रहेगी !

 

निवास

स्त्री या पुरुष में देह हो न हो, देह में स्त्री या पुरुष होता ही है ।

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