दो बीघा ज़मीन —किसान पीड़ा का जीवंत दस्तावेज

डॉ संगीता गांधी

भारतीय किसान के वास्तविक दर्द को पर्दे पर उकेरने वाली फिल्म थी -दो बीघा जमीन ।’दो बीघा ज़मीन’ हृदय-स्पर्शी और परिष्कृत रूप से एक बेदखल किसान का जीवंत चित्रण है। एक किसान के बहाने देखा जाए, तो यह फ़िल्म सम्पूर्ण भारतीय किसान-समाज का सबसे मानवीय चित्रण प्रस्तुत करती है। इस फ़िल्म में न सिर्फ सार्वकालिक उपेक्षितों की, बल्कि शोषितों की भी पीड़ा है। अपनी आंतरिक श्रेष्ठता, सच्ची भारतीयता के ही कारण यह फ़िल्म एक किसान -मजदूर का गहरा दर्द प्रस्तुत कर पाती है ।

    एक किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसकी जमीन होती है ।ज़मीन उसके लिए मात्र एक भू स्थल नहीं बल्कि माँ  होती है ।वही ज़मीन उससे छीन ली जाए ।उसे दाने दाने को तरसाया जाए ।तब उस किसान को कैसा दर्द होगा ?उसकी तार तार वेदना कैसे आर्तनाद करेगी ?इसी पीड़ा का गहन चित्रण  इस फ़िल्म के केंद्र में है ।

भारतीय परिवेश में कैसे एक किसान कर्ज के जाल में फंसता है !कैसे उस कर्ज़ की भरपाई के लिए उस किसान का तिनका तिनका बिखर जाता है ! अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उसका गांव से शहर को पलायन व किसान से मजदूर बनने की कहानी आज भी प्रासंगिक है ।

फ़िल्म का मुख्य पात्र शम्भू  एक  गांव में दो बीघा जमीन का मालिक है । पत्नी ,बेटे व पिता के साथ उसका सुखी परिवार है ।गांव में अकाल के बाद हुई बारिश से सब खुश हैं । गांव के जमींदार की नज़र शम्भू की ज़मीन पर है ।जमींदार एक शहर के ठेकेदार से मिलकर वहां कारखाना लगाना चाहता है ।यह  बिंदु पूंजीवाद के अतिक्रमण का मूल है ।गाँव में विकास के  नाम पर किसानों की ज़मीन हड़पना ।उन्हें अपनी ही माँ से बेदखल करना एक कड़वा सच है ।यह सच कल भी सामने था और आज भी वैसा ही है ।

  1953 की ये फ़िल्म आज़ादी के बाद नए नए हो रहे विकास की भेंट चढ़ रही ज़मीनों की ओर संकेत करती है ।समय भले बदल गया हो पर आज भी प्रवृति नहीं बदली ।कल जमींदार , ठेकेदार थे । आज कॉर्पोरेट हैं ,बिल्डर लाबी है ।फ़िल्म में शम्भू का संघर्ष उस किसान का संघर्ष है ,जो कहने को अन्नदाता है पर असलियत में व्यवस्था के हाथ का खिलौना है ।

 शम्भू 65 रुपये का कर्ज जमींदार से लेता है ।जब जमींदार  कर्ज़ के बदले उसकी जमीन लेने की बात करता है तोशम्भू मना कर देता है ।वह जमींदार का  क़र्ज़  चुकाने के लिए अपनी पाई – पाई बेच देता ।जमींदार को पैसे देने जाता है ।जमींदार का हिसाब कुछ ओर है ! वह 253 रुपये क़र्ज़ के बताता है । यह है व्यवस्था ,कैसे क़र्ज़ के 65 रुपये 253 में बदल गए !  शम्भू इस अन्याय upके विरुद्ध अदालत जाता है ।क्या न्याय प्रणाली गरीब  किसान का साथ देती है ? न्याय व्यवस्था  की सच्चाई भी उजागर हो जाती है ।शम्भू मुकदमा हार  जाता है ।उसे तीन महीने के अंदर क़र्ज़ चुकाने  का हुक्म मिलता है वरना उसकी ज़मीन नीलाम हो जाएगी ।

    कहानी जो कल थी ,वो आज भी है ।व्यवस्थाब,न्याय प्रणाली का स्वरूप आज भी वही है ।गरीब आज भी  न्याय के लिए भटकता है ।आज भी अमीर उद्योगपति  का क़र्ज़  आराम से माफ हो जाता है ।उसकी गिद्ध दृष्टि से किसान की ज़मीन नहीं बचती ।

  शम्भू  क़र्ज़ की रकम  का प्रबंध करने शहर जाता है ।उसका बेटा भी साथ है ।यह है पैसे के लिए गांव से शहर की ओर पलायन । यहाँ एक किसान मजदूर बनता है ।उसका बेटा शहर में मोची का काम करता है ।यह स्थिति आज भी नहीं बदली । अपनी ज़मीनों से बेदखल किसान शहरों में मजदूरी कर रहे हैं ,रिक्शा चलाते है ।

शम्भू शहर में रिक्शा चलाता है । क़र्ज़ की रकम के लिए कड़ी मेहनत करता है ।पर किसान की किस्मत तो शायद विडम्बना ही लिखवा कर आती है । बेटे पर चोरी का केस और फिर पत्नी के एक्सीडेंट पर उसकी सारी रकम खर्च हो  जाती है ।शम्भू खाली हाथ परिवार साथ गांव आता है ।अब यहां कुछ नहीं  बचा ।ज़मीन पर कारखाना लग चुका है । पूंजीवाद एक किसान की माँ को निगल चुका है ।शम्भू अपनी ही ज़मीन की कुछ मिट्टी उठाता है ।सुरक्षा कर्मी डांट कर उसे भगा देता है ।यह है एक किसान के  संघर्ष की कहानी ।

 इटली के नव यथार्थ वाद से प्रेरित यह कहानी सलिल चौधरी ने लिखी थी ।फ़िल्म के निर्देशक थे बिमल रॉय ।मुख्य भूमिकाओं में थे –बलराज साहनी ,निरूपा रॉय ,मुराद ,रत्न ,नाना पलसीकर ।संगीत भी सलिल चौधरी का था ।फ़िल्म को बहुत से पुरस्कार मिले ।कांस फ़िल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत होने वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी व।इसे पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला ।

  भारतीय किसान को केंद्र में रखकर बहुत सी फिल्में बनी हैं ।उनमें अधिकतर में या तो किसान को बहुत ग्लोरीफाई किया गया है !या बहुत दीन -हीन दिखाया गया है ।व्यवस्था से जूझता किसान ,लड़ता किसान , उसका यथार्थवादी चित्रण बहुत कम फिल्मों में हुआ है ।समानांतर सिनेमा में यह बहुत उभरा है परंतु मुख्यधारा की फिल्मों में दो बीघा जमीन ऐसी पहली फ़िल्म है जो एक भारतीय किसान का यथार्थ चित्रण करती है ।

  आज दो बीघा जमीन जैसी फिल्में क्यों नहीं बनती ? क्यों फ़िल्म परिदृश्य से किसान गायब है ? इसके मूल में है बाज़ारवाद। 1970 के बाद से हिंदी सिनेमा में धीरे  धीरे किसान गायब होना शुरू हुआ ।फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लगना आरम्भ हुआ ।फिल्में ग्लैमर ,चकाचौंध से लबरेज़ होती चली गईं ।

   बाज़ारवाद  चीजों को एक सपने की तरह प्रस्तुत करता है ।उसका यथार्थ से कुछ सम्बन्ध है या नहीं इसकी चिंता बाज़ारवाद नहीं करता ।अब फिल्में विदेश में शूट होती हैं ।बड़ी बड़ी कम्पनियों ,कारपरेट  हाउसिस का पैसा लगता है ।इनका उद्देश्य किसान का दर्द दिखाने से पूरा नहीं होता ।इन्हें पैसे कमाने हैं ।वह पैसा स्विट्ज़रलैंड के सुंदर दृश्य ,भव्यता दिखा कर कमाया जाता है ।रोता , क़र्ज़ से टूटता , अकाल ,बाढ़ की मार झेलता किसान क्या कमा कर देगा ! इसलिए किसान प्रधान फिल्में अब नहीं बनती ।

   बाज़ारवाद व नवउपनिवेशवाद अपने पैने दांत हर कमाऊ उद्योग में गड़ा चुका है ।हॉलीवुड की बड़ी फिल्म कम्पनियां बॉलीवुड में इन्वेस्ट कर रही हैं ।उन्हें गांव की  कहानी से क्या मिलेगा ! उनके उद्देश्य शहरी ,महानगर की कहानी से पूरे होते हैं ।बाज़ार बनाया गया है –बड़ी बड़ी भव्य सेट वाली ,विदेश में शूट की गयीं फिल्मों के लिए ।बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स जहां महंगी टिकट है ,महंगे कोल्डड्रिंक ,पॉपकॉर्न हैं ।वहां जो वर्ग फ़िल्म।देखने जाता है ,उसे किसान की समस्या का पता ही नहीं है ।न वो किसान के दर्द को देखना चाहता है । बाज़ार ने ऐसा माहौल बना दिया है कि हिंदी सिनेमा में किसान की पीड़ा   का प्रदर्शन समाप्त हो चुका है ।’ दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘ में यदि खेत दिखाए जाते हैं तो वो भी ऐसे जहां विदेशी महंगी गाय खड़ी है ! सब कुछ।बनावटी ।जो यथार्थ चित्रण दो बीघा ज़मीन में था वो  बीते जमाने की बात है ।

  आज  न तो  कोई समानांतर सिनेमा है ,न ही कोई सत्यजीत रे  ,ऋत्विक घटक, मृणाल सेन ,श्याम बेनेगल ,बिमल रॉय जैसे लोग हैं जो किसान को सिनेमा पर साकार करते थे ।

आज का फिल्मकार बिजनेस करता है ।उसका उद्देश्य समाज सुधार ,दीन हीन वर्ग की आवाज़ बनना नहीं है !वो पैसा कमाने आया है ।यही कारण है कि आज दो बीघा जमीन जैसीं कालजयी फिल्में नहीं बनती ।किसान –जो कभी सिनेमा में प्रमुखता से चित्रित होता था।मदर इंडिया ,गंगा जमुना ,उपकार ,गोदान ,अंकुर ,मंथन ,पाथेर पंचाली जैसीं फिल्में अब नहीं बनती ।अब जो बाज़ार नियम बनाता है ,वो ही समाज को संचालित करते हैं ।फ़िल्म उद्योग भी बाज़ार के नियमों के अधीन है ।जो बाज़ार चाहता है वही बनता और बिकता है।

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1 Response

  1. Mukul Vidholia says:

    Bahut achha likha he ,👌👌👌 ..Aur halat aaj us se bhi bure he….Bahut kuchh badla par kisan ke halat nahi badle

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