ध्रुप गुप्त की 4 ग़ज़लें

ध्रुव गुप्त

एक

हम हाज़िर हैं हाथ उठाए
सपना जहां, जिधर ले जाए

दरवाज़े पर आस टंगी है
खिड़की पर लटके हैं साए

तन्हाई में शोर था कितना
चीखो तो आवाज़ न आए

हम सड़कों पे खड़े रह गए
सड़कों ने कल धूल उड़ाए

हर कंधे पर बोझ है कितना
कौन कहां दो ख़्वाब टिकाए

उतनी क़ीमत है खुशियों की
हमने जितने दर्द कमाए

एक तसव्वुर तो ऐसा हो
सर रख दूं तो नींद आ जाए

दिल सबके शीशे जैसे हों
दर्द उठे तो आंख नहाए

आज चैन से जी लेने दो
क़सम उसे जो याद आ जाए

दो

रंग सारे थे, हम नहीं थे वहां
सौ सहारे थे, हम नहीं थे वहां

लफ़्ज़ खो आए थे मानी अपने
कुछ इशारे थे हम नहीं थे वहां

रात दरिया में बहुत पानी था
दो किनारे थे हम नहीं थे वहां

दरमियां जाने क्या उदासी थी
ग़म के मारे थे हम नहीं थे वहां

गरचे हर दिन तेरी तलाश रही
तुम हमारे थे, हम नहीं थे वहां

सबकी ज़द्दोजहद में साथ रहे
चांद-तारे थे, हम नहीं थे वहां

जिस जगह फ़ैसला हुआ अपना
लोग सारे थे, हम नहीं थे वहां

तीन

चांद कितना बुझा-बुझा सा है
आसमां है तो बेपता सा है

ग़म किसी का उदास करता है
ग़ैर से कुछ तो वास्ता सा है

ख़ुद से मिलते ही झुक गईं आंखें
मुझमें कुछ है जो आईना सा है

वो तड़प है, न वो गीली आंखें
रात का रंग कुछ उड़ा सा है

मैं भी अपनी तरह नहीं लगता
और कुछ तू भी दूसरा सा है

दिल के हाथों का खेल है सारा
हम न बंदे, न तू ख़ुदा सा है

हम जहां हैं वहां नहीं हैं अभी
तू जहां है, बहुत ज़रा सा है

सोचने से न हल निकलना था
चल पड़े हैं तो रास्ता सा है

चार

कुछ दहशत हर बार ख़रीदा
जब हमने अख़बार ख़रीदा

जिन्स, भाव, बाज़ार आपके
हमने क्या सरकार ख़रीदा

उसके भीतर भी जंगल था
कल जिसने घर बार ख़रीदा

एक मुश्त में दिल दे आया
टुकड़ा टुकड़ा प्यार ख़रीदा

सच पे सौ सौ परदे डाले
एक सपना बीमार ख़रीदा

हम बेमोल लुटा देते हैं
तुमने जो हर बार ख़रीदा

एक भोली मुस्कान की ख़ातिर
कितना कुछ बेकार ख़रीदा

प्यार से भी हम मर जाते हैं
आपने क्यों हथियार ख़रीदा

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