निर्मल गुप्त की तीन कविताएं

निर्मल  गुप्त
लोग घर वापस जा रहे हैं

लोग घर वापस जा रहे हैं
कंधे पर लटकाये बेलनाकार टिफिन
जिसमें अब भी पड़े हैं
रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने
भूख चाहे जैसी भी हो
बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ।

लोग घर वापस जा रहे हैं
अपने थके हुए हाथ-पैर के साथ
लंबे लंबे डग भरते हुए
जल्दबाजी है उन्हें वापस लौटने की
लटक जाते हैं वे लपक कर
बस या ट्रेन के पायदान से।

लोग घर वापस जा रहे हैं
बच्चों को सुनाने जीवन अनुभव
रटते अनमोल वचन, हितोपदेश गढ़ते
वे जानते हैं कि उन्हें जरूरत है
पौष्टिक भोजन, सही शिक्षा से कहीं अधिक
जीवन के सच्चे जुझारूपन की।

लोग घर वापस जा रहे हैं
जिंदगी के एक और फिजूल दिन को
अपनी स्मृति से मिटाते
अपने आप से भीषण युद्ध लड़ते
जिसे अब मात्र सत्रह दिन ही नहीं
चलते रहना है अनवरत सामर्थ्य रहने तक।

लोग घर वापस जा रहे हैं
उंगलियों की लकीरों पर गिनते
साप्ताहिक अवकाश के बचे हुए दिन
मिलने वाले बोनस का जोड़ते हिसाब
क्योंकि उनके लिए जिन्दा बने रहने की
यही है एक महीन शाश्वत उम्मीद।

लोग घर वापस जा रहे हैं
आराम करने और कल की थकन के लिए
फिर से तैयार होने नहीं
बल्कि इसलिए कि मशीनों को
मिल सके जरूरी आराम
और हो जाए ठीक से उनकी साफ़ सफाई।

यात्रा में

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
वह एक ही जगह सदियों से खड़ा है
उसे सांझ ढले घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं
न उसे यह बात ठीक से पता कि
रेलगाड़ी वाकई कहीं जा भी रही है
गति यात्रा का पुख्ता सुबूत नहीं होती।

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
बगल वाली पटरी पर एक और रेलगाड़ी
उसके बगल वाली पर भी शायद एक
जितनी पटरियां उतनी रेलगाडियां
होड़ से बाहर खड़ा तमाशबीन
बड़ी एहतियात के साथ मुस्कराता है।

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
रेलवे फाटक पर तैनात गेटमैन
ईंट जोड़ कर बनाये चूल्हे पर
जल्दी जल्दी सेंक रहा है रोटियां
पटरी किनारे के फाटक पर
भूख और रेलगाड़ी कभी भी आ धमकती है ।

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
प्लेटफार्म पर अजब हलचल है
पर नहीं है सफर खत्म होने का कोई चिन्ह
पूछताछ खिड़कियों पर बिना कुछ जाने बूझे
लोग कर रहे हैं अपने से गुपचुप बातें
बातें और यात्राएँ कभी नहीं थमती है।

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
खिड़की के पार गांव घर याद धुआं
सब भाग रहे हैं विपरीत दिशा में
वह देख रहा है कनखियों से
जलती बुझती रोशनियों का खेल
हर यात्रा का अपना तिलिस्म होता है

कुछ नहीं पता….
मसखरा हंसता है धीरे धीरे
बड़ी एहतियात के साथ
उसे पता है ठहाका लगाने पर
बहुत देर तक दुखेगा
कमर से चिपका पेट
और कांपेंगी जर्जर पसलियां.

बब्बर शेर दिखाता है करतब
पूरी मुस्तैदी के साथ
रिंग मास्टर के हंटर की
फटकार का इंतज़ार किये बिना
दोनों को अच्छे से मालूम है
अपने अपने किरदार .

तोते के खेल दिखाती लड़की की
शफ्फाक जांघें कंपकपाती रही ठंड से
वह कम्बल में दुबक कर
चुस्की ले ले पीना चाहती है
गर्म भाप से अंटी चाय
और दिनभर की थकन .

पतली रस्सी पर थिरकते
नर और मादा की शिराओं में
चरमोत्कर्ष पर है उत्तेजना
वे एक दूसरे की ओर देखते
गा रहे हैं मगन होकर
प्यार का कोई आदिम गीत.

सरकस के पंडाल से
रिस रहे हैं तमाशबीन
सधे हुए घोड़े ऊँघ रहे हैं
अपनी बारी का इंतज़ार करते
किसी को नहीं पता
कल सुबह कैसी होगी.
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निर्मल गुप्त
२०८ छीपी टैंक,मेरठ-२५०००१

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