नीरू मोहन की कविता ‘मील का पत्थर’

*पहुँचाकर मंजिल पर राही को

अभी भी वहीं खड़ा हूँ |

धूल से ढककर, सूरज से तपकर अभी भी अडिग खड़ा हूँ |

रुका न कोई पलभर भी

न पूछा मेरा अता-पता |

देखकर मुझको दूर से यूँ ही

अपनी मंजिल की ओर ही बढ़ा |

न ली कोई मेरी खैर-खबर

न दो पल भी वहाँ रुका |

न किया मेरा शुक्रिया उसने

स्वार्थी मानुष धूल उड़ाए चलता ही गया |

क्या दूँ अपना परिचय में तुम्हें

मैं हूँ वही पाषाण, वही पाषाण हूँ मैं |

जो मील का पत्थर बन

दिशा निर्देशक-सा अभी भी वहीं हूँ खड़ा ||

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