परमानन्द रमन की चार कविताएं

परमानन्द रमन

जन्मतिथि : 20/12/1983

जन्म-स्थान : जमशेदपुर(तात्कालीन बिहार, वर्तमान झारखण्ड)

ग्राम: करहसी, जिला- रोहतास (बिहार)

आरंभिक शिक्षा बारहवीं तक जमशेदपुर में ही, तत्पश्चात कला शिक्षा में स्नातक के लिये

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय के मूर्तिकला विभाग में दाखिला।

स्नातकोत्तर की शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय  के दृश्य कला संकाय के मूर्तिकला विभाग से।

यूजीसी नेट(NET) एवं बीएचयू क्रेट(CRET) पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण।

साल 2011 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन में कला शिक्षक के पद पर कार्यरत

वर्तमान में गृहनगर के.वि., टाटानगर, जमशेदपुर में ही कार्यरत।

बचपन से ही साहित्य एवं कला में रूची, स्कूल एवं विश्वविद्यालय स्तर पर कविता लेखन  एवं वाद-विवाद में पुरस्कार।

संपर्क 

केन्द्रीय विद्यालय, टाटानगर

जमशेदपुर, झारखण्ड

मो.-8404804440

 

सबसे सरल अनुवाद

 

आजीवन जटिल रहे

मेरे पिता

और मां सहज रूप से

सरल रही

 

दोनो साथ रहे

सबसे जटिल और सबसे सरल

समय में

 

माँ के नहीं रहने के बाद

असहज रुप से

सरल हो गए पिता

माँ हो गए पिता

 

मै एक साथ

सबसे जटिल क्षणों में

सबसे सरल होना चाहता हूं

 

सरल है

सभ्यता के प्राचीनतम

कंदराओं में

अनमने भाव से उकेरी गई

आकृतियां

 

जटिल है उन ऊंघती हुई

आकृतियों का

सरलतम अनुवाद

 

सरल है किसी निर्जन वन का

एकाएक धूं-धूं कर जल उठना

अति-उष्णता से

 

एक चिंगारी को

प्राकृतिक रूप से

ईजाद करना

अत्यंत जटिल है

 

सरल है पिघलना

एक ग्लैशियर का

हो जाना पवित्र नदी

 

जटिल है बाँधना

भरी हुई

आँखों पर बँध

 

सरल है सारी पाण्डुलिपियों

और महाकाव्यों को

कण्ठबद्ध करना

 

जटिल है

अपनी मनःस्थिति का

यथार्थ चित्रण

एक कोरे कागद पर

 

प्रसव सरल है

सबसे सुरक्षित है देह

देह के भीतर

 

जन्म जटिल है

उससे भी जटिल है

समुद्र किनारे औंधा पड़ा

शिशु शव

 

अजन्मा विचार सरल है

सबसे सरल विचार का जन्म

अत्यंत जटिल है

 

सरल है वीभत्सता से लड़ा गया

इतिहास का

सबसे प्रलयंकारी युद्ध

 

मगर सबसे जटिल है

निर्मित ना होने देना

युद्ध की स्थिति

 

मोसूल सरल है

श्रीनगर जटिल है

 

दुर्योधन सरल है

कृष्ण जटिल है

 

प्रतिरोध सरल है

निर्वाह जटिल है

 

संगीत सरल है

स्वर जटिल है

 

मै चाहकर भी

अपने पिता की तरह

एकसाथ सबसे जटिल क्षणों में

सबसे सरल नहीं हो पाता

 

और तुम

अति सहजता से

हो जाती हो

मेरी सबसे जटिल रचनाओं का

सबसे सरल अनुवाद

 

बचाकर रखना पृथ्वी

 

बचाकर रखना पृथ्वी

सुरक्षित

 

उस दिन के लिये

जब देवता तुम्हें धकेलकर

निकाल देंगे

अदनवाटिका से

 

कल्पतरु से फल

चुराने के आरोप में

छीन लिये जायेंगे

तुम्हारे सकल दैविक-अधिकार

 

तुम निकृष्ट मानव होकर

विवशता से काटोगे

अपना शेष जीवन

 

तब तक के लिये

बचाकर रखना

 

खेत भर जमीन

छत भर आसमान

प्यास भर नदी

छांव भर वृक्ष

बारिश भर बादल

पीठ भर पहाड़

उजाले भर दिन

नींद भर रात

और घर भर पृथ्वी

 

और याद से

चेता देना

अपनी भावी संतानों को

 

कि कैसे

एक कुटिल देव ने

योजनाबद्ध तरीकें से

याचक बनकर

 

हथिया ली थी

तुमसे

तुम्हारी पृथ्वी

 

समय कभी समाप्त नहीं होगा

 

समाप्त नहीं होता समय

बस बीत जाता है

सरक जाता है आगे

अपनी अंतहीन यात्रा पर

यायावर समय

पीछे छोड़कर

अपनी रंगीन केंचुली

हम वापस भरना चाहते हैं

बीता हुआ समय

उसी रंगीन केंचुली में

मगर निरंतर बढ़ता जाता है

समय का आयतन

बदलता जाता है

उसका स्वरूप

एक निश्चित अंतराल पर

अनवरत उग आते है

कमल के फूल

प्रगाढ़ कीचड़ में

दुर्गंध से भरे

गोबर के टीलों में

फूटने लगते हैं

सुकोमल मशरूम

कितना आश्चर्यजनक है

कहीं भी कुछ भी

सड़ने या गलने पर

कुछ आकर्षक रुप

आकार लेने लगते हैं

सीलन भरी दीवारें

लाईकेन से सज जाती है

निर्जन उपेक्षित

अंधकार से लिप्त कमरे

नितांत एकांत को जन्म देते हैं

अंकुर फूट ही जाता है

खंडहर की दीवारों से

उदासीन मलबों पर

वन-लताओं का आलिंगन

खिलने लगता है

अति प्रलाप से जागते है

आँखो के ग्लेशियर

टूट जाते हैं

रूंधे गले के बँध

क्रमवार विस्फोटों से

उत्तेजित होने लगते हैं

कान के पर्दे

और नाड़ियों का रक्तचाप

ऐसे ही किसी धमाके मे

जन्मी होगी पृथ्वी

असंख्य तारे

और ब्रह्मांड का निर्माण भी

किसी हादसे से हुआ होगा

जले हुये खेत

पट रहे हैं जंगली फूलों की

मादक गंध से

बैठने लगीं हैं तितलियां

पीड़ा से थरथराते देहों पर

और मैं निशाना साधे

वर्षों से खड़ा हूँ

आखेटक की तरह

केंचुली उतार रहे

समय पर

और मेरे तरकश में

पनप रहा है प्रेम

 

हीरो नहीं होता है पिता

 

हीरो नहीं होता है हर पिता

कभी खाँसते या कराहते

नहीं सुना किसी हीरो को

ना होता है पेड़, पहाड़

या आसमान

पिता वहन करता है

आजीवन भरण करता है

उठाता है, ढोता है

पार लगाता है

खुद अपने पर ही झुंझलाता है

अनवरत काम करते

उनके फेफड़े

जब सिकुड़ने लग जाते हैं

हवा के अभाव में

तब खाँसते हैं पिता

रात-रात भर अनवरत

छाती के भीतर

एक कल-पुर्जा

घरघराने लगता है

गर्दन की नसों से गुजरता ईंधन

आँखों की भट्टी को

लाल कर देता है

एक कारखाने में

बदल जाते हैं पिता

कुछ बोलना चाहते हैं

मगर शब्दों को चबाकर

निगल जाते हैं

पूरे कमरे का मुआयना कर

चुपचाप ताकने लगते हैं दीवार

कामगार चीटियों का एक दस्ता

दीवार पर चढ़ा जा रहा है

पिता चीटियों को रोककर

पूछना चाहते हैं कुछ

मगर चुप रह जाते हैं

इन्हीं चीटियों के दस्ते से भटके

मेरे पिता आजीवन वहन करते

जैविक यंत्रणा की ऊब से

स्वयं एक यंत्र में तब्दील होकर

अपने जीवन की नदी लाँघ रहे हैं

मुझे कंधे पर उठाये

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