परसाई की रचनाओं का रंगमंचीय दृष्टिकोण

अखतर अली मूलतः नाटककार, समीक्षा एवं लघु कथाआें का निरंतर लेखन, आमानाका, कुकुर बेड़ा रायपुर (छ. ग.) माे. न. 9826126781

हरिशंकर परसाई को पढ़ना स्वयं को अपडेट करना है | जब हम परसाई जी को पढ़ रहे होते हैं दरअसल उस क्षण हम अपने समय को पढ़ रहे होते हैं ,अपने आस पास को पढ़ रहे होते हैं , अपने संस्कार का अध्ययन कर रहे होते हैं ,अपनी चूक पर दण्डित हो रहे होते हैं ,अपने गैर जिम्मेदाराना हरकतों को स्वीकार कर कान पकड़ कर उठक बैठक लगा रहे होते हैं | परसाई जी की कोमल शब्दों की वाणी बहुत कठोर है | वाक्यों में निहित व्यंग्य परसाई जी के तरकश का सबसे अहम् तीर है | कलम तलवार होती है इस कहावत को सही रूप में परसाई जी ने ही साबित किया है | परसाई जी ने हिंदी क्षेत्र में वयंग्य को स्थापित किया है , इसके पहले साहित्य में तंजो मजाह शैली/विधा में उर्दू के रचनाकार कृशन चंदर ,फ़िक्र तौस्वी ,शौकत थानवी ,इब्ने इंशा , इब्राहिम जलीस ,मुजतबा हुसैन का ही बोलबाला था ,हरिशंकर परसाई ने हिंदी में व्यंग्य को स्थापित किया|

परसाई जी कि रचनाओ में सोच के कई कोण स्थापित होते हैं। उनकी रचनाएं पढ़ने वाले को जागरूक बनाती है , उसके सोचने के नजरिये की मरम्मत करती है , उसका राजनैतिक ज्ञान बढ़ाती है, उसे मुस्तैद बनाती है| परसाई जी पर इतना अधिक लिखा जा चुका है कि अब और क्यों लिखा जा रहा है यह प्रश्न सामने आना स्वभाविक है |

मैं मूलतः नाटककार हूँ | जब मैं लिखता हूँ तब मेरी कल्पना में रंगमंच रहता ही है लेकिन जब मैं कुछ पढ़ रहा होता हूं तब भी मेरे तसव्वुर में रंगमंच ही घूमता रहता है | लोग कविता में बिम्ब तलाशते हैं और मैं उसमें भी दृश्य तलाशता हूँ | उपन्यास पढ़ते समय उसके नरेशन को दृश्य में ढालता जाता हूँ | ये मेरा स्वभाव है मैं निबंध में भी उसके मंचन की संभावना तलाशने लगता हूँ | शायद इसीलिये मैं अब तक हरिशंकर परसाई ,शरद जोशी , प्रेमचंद ,मंटो ,राही मासूम रज़ा , सत्यजीत रे , श्री लाल शुक्ल , प्रभाकर चौबे ,लतीफ़ घोंघी ,विनोद शंकर शुक्ल , गिरीश पंकज आदि की रचनाओं का नाट्य रूपांतर कर पाया हूँ |

अपने इस नजरिये से मैं ज्यों ज्यों परसाई जी को पढ़ते जाता हूँ , उनकी लेखनी का कायल होता जाता हूँ ,उनका मुरीद हो जाता हूँ | इनके लेखन में विषय , आरोप ,आलोचना ,विरोध जो है वह तो अपनी जगह महत्वपूर्ण है ही , लेकिन इन सब को कहने का उनका जो अंदाज़ है उसमें गज़ब का कमाल है , उनका सलीका उन्हें अन्य से बिलकुल अलग और उंचाई पर खड़ा कर देता है |

परसाई जी की जो शब्द संरचना है उस पर ज़रा गौर कीजिये। उनके वाक्यों में रिदम है ,लय है , स्पीड है | पढ़ते समय उनके शब्द दृश्य बनते जाते हैं | उनके पात्र यकायक हरकत करने लगते हैं | परसाई जी की कोई भी रचना -- वह चाहे उखड़े खम्बे हो ,एक लड़की पांच दीवाने हो ,ठिठुरता हुआ गणतंत्र हो ,भोला राम का जीव हो ,मातादीन चाँद पर हो या रानी नागफनी की कहानी हो या और कोई भी रचना हो परसाई जी ने बकायदा पात्रों को गढ़ा है , उन्हें एक शेप दिया है , तभी तो पढ़ते पढ़ते पात्र वेशभूषा में नज़र आने लगते हैं , उनकी चाल ढाल दिखने लगती है | पात्र अपने रूप में रचना से निकल कर हमारे टेबल पर खड़ा हो जाता है | हर रचना गुस्सैल समय की मुस्कुराती रचना है | इनके पात्र के हाथ में हथियार नहीं होता ,इनका पात्र ही इनका हथियार होता है | परसाई जी को पढ़ो तो ये लगता है मानो हम नारे लगाते हुए किसी जुलूस का हिस्सा है | अनेक स्थानों पर कथोपकथन इतना सजीव है कि जो लिखा हुआ है वह पढ़ा हुआ नहीं बल्कि दिखा हुआ लगता है | आपने परसाई जी को जितने भी अंदाज़ में पढ़ा होगा हर बार उसमे एक नये किस्म का अहसास हुआ होगा ,आपसे निवेदन है एक बार फिर उन्ही रचनाओं को अभिनेता बनकर पढ़िये आपको नये किस्म के तेवर का अहसास होगा | आप मेरी इस बात का पुरजोर समर्थन करेंगे कि परसाई जी ने लिखा नहीं है उन्होंने बोला है, और कारीगरी ये है कि बोला भी खुद नहीं बल्कि पाठको से बुलवाया है ,आप पढ़िये तो ,आप भी पढ़ते पढ़ते उसे बोलने लगेगे , आप खुद विसंगति के खिलाफ परसाई जी के पात्र बन भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ने खड़े हो जायेगे |

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