परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

परितोष कुमार 'पीयूष'
इस समय के हत्यारे!
 
हत्यारे अब बुद्धिजीवी होते हैं
हत्यारे अब शिक्षित होते हैं
हत्यारे अब रक्षक होते हैं 
हत्यारे अब राजनेता होते हैं
हत्यारे अब धर्म गुरु होते हैं 
हत्यारे अब समाज सेवक होते हैं०
 
हत्यारे अब आधुनिक हो गये हैं
हत्यारों ने बदल लिया है हत्या को अंजाम देने के 
अपने तक तरीकों को, औजारों को
अब धमकियाँ, चिट्ठियाँ, पर्चियाँ, फोन नहीं आते 
पहले होती है हत्या बाद में औपचारिकताएँ०
 
इस दुरूह समय में 
हत्या यहाँ बेहद मामूली सी बात है
हत्या के पीछे कोई खास वजह नहीं होती
बात-बात पर हो जाती है हत्या
हत्या अब यहाँ चोरी छिपे नहीं होती
सिर्फ रात के अँधेरे 
व सूनसानी जगहों पर ही नहीं होती
हत्या यहाँ दिन दहाड़े खुले आम 
घरों, संस्थानों, महाविद्यालयों में घुसकर
अस्पतालों में हवा रोककर
रेलगाडियों से खींचकर
सड़कों चौराहों पर घसीटकर
बलात्कार के बाद योनियाँ क्षत विक्षत कर
भीड़ में अफवाह फूँककर होती है०
 
अपने खिलाफ उठती 
हर आवाज को दबाना अच्छी तरह जानते हैं
वे बड़े ही चालाक हैं 
बड़ी साफगोई से हत्या को अंजाम देते हैं
हत्या को आत्महत्या में बदलने का 
हुनर भी बखूबी जानते हैं वो
बड़ी आसानी से बेकसूरों, मासूमों के नाम 
देशद्रोही, आतंकवादी होने की 
झूठी घोषणाएँ करते हैं
और इस प्रकार वे तमाम हत्यारे 
हर बार हो जाते हैं पाक साफ०
 
कवि के हाथों में लाठी!
 
वो बात किया करते हैं
अक्सर ही स्त्री स्वतंत्रता की
बुद्धिजीवियों की जमात में 
उनका दैनिक उठना बैठना 
चाय सिगरेट हुआ करता है०
 
साहित्यिक राजनीतिक मंचों से
स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में
धाराप्रवाह कविता पाठ किया करते हैं
अखबारी स्तंभों में भी 
यदा कदा नजर आ ही जाते हैं
नवलेखन, साहित्य अकादमी, 
साहित्य गौरव, साहित्य शिरोमणि, कविताश्री
और पता नहीं क्या-क्या इकट्ठा कर रखा है
उसने अपने अंतहीन परिचय में०
 
सड़क से गुजरते हुए
एकदिन अचानक देखा मैंने
उनके घर के आगे 
भीड़! शोर शराबा! 
पुलिस! पत्रकार!
कवि के हाथों में लाठी!
मुँह से गिरती धाराप्रवाह गालियाँ!
थोड़े ही फासले पर फटे वस्त्रों में खड़ी
रोती-कपसती एक सुंदर युवती
और ठीक उसकी बगल में 
अपाहिज सा लड़खराता एक युवक०
 
इसी बीच 
भीड़ की कानाफूसी ने मुझे बताया
पिछवाड़े की मंदिर
उनकी बेटी ने दूसरी जाति में
विवाह कर लिया है०
 
मैं अवाक् सोचता रहा
कि आखिर किनके भरोसे 
बचा रहेगा हमारा समाज
क्या सच में कभी
स्त्रियों को मिल पायेगी
उनके हिस्से की स्वतंत्रता०

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *