परिवर्तन ईमानदार समाज ही कर सकता है

जयप्रकाश मानस
संपादक,

www.srijangatha. com
कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक)
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा
रायपुर, 

एक कवि की डायरी : किस्त 4

10 नवंबर, 2011

जानना है बहुत कुछ

आ.रंजना अरगड़े (गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद) ने बड़ी आत्मीयता के साथ 23-24 दिसंबर को होने वाले राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘साहित्य तथा प्रौद्योगिकी की अंतर्संबधता’ विषय पर ख़ास तौर पर बोलने के लिए मुझे बुलाया है । अपने समय के असाधारण कवि शमशेर बहादुर की रचना-प्रक्रिया और माहौल तथा अहमदाबाद शहर को करीब से देखने का भी वर्षों से मन था और पर लगता है इस बार हो नहीं सकेगा । हाय रे समय की कमी । दीदी से क्षमा । अगली बार बग़ैर न्यौता के खुद-ब-खुद चला आऊँगा । रंजना दी से अभी बहुत जानना है-सुनना है ।

 

लक्ष्मी नहीं, सरस्वती

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी 1920 में प्रख्यात पत्रिका ‘सरस्वती’ के सहयोगी संपादक बने । संयोग कहिए उसी वर्ष उनके यहाँ द्वितीय कन्या का जन्म हुआ । परिजनों और कुल पंडितों में से किसी ने भी उनसे क्या कहा न होगा – मास्टर जी आपकी उन्नति पर उन्नति हो रही है क्यों न बिटिया का नाम ‘लक्ष्मी’ रख लेते हैं !

 

बख्शी जी ने लेकिन अपनी बिटिया का नाम रखा – ‘सरस्वती’ ।

 

परिवर्तन और पाखंड

परिवर्तन कोरे सिद्धांतों से नहीं होता़ चाहे वह गांधी जी का हो या किसी मार्क्स का परिवर्तन बेहद ईमानदार लोगों का समाज करता आया है़ । और इसके लिए दुष्ट और मतिमंद बुद्धिजीवियों की लफ्फाजी से बचना होगा जो सिर्फ़ सिद्धांतों की सुमरनी जपा करते हैं ! सचमुच ऐसे पाखंडियों से परिवर्तन की सम्भावित गति को बचाना होगा ।

 

अरसे बाद आज उन्नयन के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र जी (इलाहाबाद) का फोन आया । बता रहे थे वे – पिछले माह हमारे महान् कवि शमशेर बहादुर सिंह जीके पैतृक गाँव एलम में अचम्भा हो गया । शमशेर जी से जुड़े हिन्दी सेवी (सेवानिवृत सैन्य अधिकारी) डॉ. विश्रांत वशिष्ठ शमशेर जी की स्मृति के लिए एक प्रतिष्ठान की स्थापना के लिए वर्षों से कहाँ कहाँ नहीं भटक रहे थे । सरकार से कार्पोरेट के द्वार तक । श्री मिश्र सहित रंजना अरगडे, रमेश दवे आदि साहित्यकारों ने उनके गाँव जाकर वहीं से शुरूआत करने की परामर्श दी । गाँववालों में कईयों को पता नहीं था कि कौन सा घर शमशेर जी का है ?

 

आश्चर्य थे वे- यहाँ इत्तो बड़ो आदमी जन्मो थो । पर जब प्रयास हुआ तो देखते ही देखते पूरे 10 लाख रुपए इकट्ठे हो गए । प्रतिमा बन गई । और प्रतिष्ठान भी । पिछले 15-16 को उनका जन्म शती समारोह भी देश भर के साहित्यकारों की उपस्थिति में मनाया गया । इसे कहते हैं साहित्य के लिए सामुदायिक प्रयास…..

 

हर चीज़ गाती है

गीताकार गोपाल दास नीरज ने कल ठीक है कहा कि इस देश में हर चीज़ गाती है। चाहे वह हवा हो या ऋतु, सब में लय होती है। बचपन में भी वही याद कराया जाता है, जिसमें लय होता है । वह पंक्तियाँ हम जीवनपर्यंत याद रखते हैं। जिसमें लय नहीं, वह मृत्यु तुल्य है।मैं तो हर अच्छे कवि, गीतकार की रचनाओं को सार्वजनिक गाता हूँ ।

 

23 नवंबर, 2011

मन : एक खेत

मन एक खेत है, वहाँ नियमित जुताई के बगैर खरपतवार नहीं छांटे जा सकते, ना ही अच्छी उपज पायी जा सकती है । चित-परिचित, दृश्य-अदृश्य, सभी साथियों को शुभ-प्रभात के साथ !

 

परोपदेशे पांडित्यम्

कल देर रात तक हरिमोहन झा की अनुपम कृतिखट्टर काका फिर से पढ़तारहा, बीच-बीच से । खट्टर काका का इमेज़ अभी भी गुदगुदा रहा है मन को इस वक्त । एक अंश अब भी मन में – खट्‍टर काका के होंठों पर मुस्कान आ गई। बोले – श्रीकृष्ण अर्जुन को तो यह उपदेश देते हैं कि क्षत्रिय के लिए राज छोड़कर भाग जाने से मरण अच्‍छा है और स्वयं जो रण छोड़कर भागे सो अभी तक रणछोड़ कहला रहे हैं।इसी को कहते हैं – परोपदेशे पांडित्यम् । लेकिन अर्जुन को इतनी बुद्धि कहाँ कि जवाब दे सकते। गटगट सुनते गए और जब सबकुछ सुनकर भी अर्जुन के पल्ले कुछ नहीं पड़ा । तब कृष्ण ने अपना विकराल रूप दिखाकर अर्जुन को डरा दिया। यदि उस तरह नहीं समझोगे तो इस तरह समझो।’

यानी भाड़ में जाये हिंदी

आज संसद में सरकार नेदोहराया – सरकारी कामकाज में अंगरेज़ी से परहेज़ नही ।

 

यमुना से भी गंदी

पढ़ा आज अख़बार में – एक अच्छी पहल के बारे में – अब भारत और जर्मनी के कुछ कलाकार यमुना को बचाने जुट गये है । कलाकार दिल्ली में यमुना और जर्मन शहर हैम्बर्ग में एल्बे नदी को बचाने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। चार जर्मन और पाँच भारतीय कलाकार यमुना के तटपर कला प्रदर्शनी लगा रहे है । ऐसी ही प्रदर्शनी हैम्बर्ग में एल्बे केकिनारे लगाई गई है । यमुना एल्बे से भी ज्यादा गंदी है। प्रदर्शनी में प्रदर्शन ज़रूर है लेकिन एक कलाकार प्रदर्शित करके ही चेतना को झकझोर सकता है । कला की यही निर्मल भूमिका है ।

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