पल्लवी मिश्रा की दो कविताएं

पल्लवी मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून

एक

पन्नों पर कलम
दर्ज़ करती है,
दिनों की बर्खास्तगी 
रातों के बदलते मायने,
पन्नों की तारीखें
बयाँ करती हैं -
दिनों के दस्तावेज़ो में 
कमतर होती रोशनी 
और महसूस होती है 
कलम की मायूसी l

पन्नों पर बने 
फूल,चिड़ियाँ,तारे 
नदी,पहाड़,झरने,घर,
बाहुबली का पराक्रम,
भल्लालदेव की गदा 
मन की कूची से-
पन्नों पर चले 
बचपन वाले दिन के
ऊर्जावान दस्तावेज़ बने रहेंगे l

पन्नों पर उतरती है कलम
बन कर प्रेम 
और भरती है दिनों के दस्तावेजों में
अनगिनत खुशबू वाले मौसम
पन्ने बनते हैं - 
बादल,हवाओं का हौसला,
तितलियों के पंखों की रवानी 
प्रेम की खुमारी लिये पन्ने
बना देते हैं मन को बेपरवाह उफनती नदी
और भुला दी जाती है काले बादलों की
घिरती साज़िशें l 


पन्नों पर उतरा कलम का प्रेम 
होता है अनगिनत रतजगो का दस्तावेज़
सपने जो बाटँती और बटोरती है 
हर पीढ़ी l

पन्नों पर कलम
जब उगलती है खून 
पन्ने होते हैं युद्धभूमि
हर दस्तावेज़ होता है -
आनेवाली अनगिनत पीढ़ियों के
रूह की मौत 
पीढ़ी,जो पढ़ती और मिट जाया करती है
कुछ क्षण उन पन्नों में l

पन्नों पर कलम
जब उगलती है ईर्ष्या
उठता है चक्रवात 
उड़ती है धूल 
और धूमिल हुआ जाता है 
कलमकार l 
पन्नों पर उतरी घृणा-भरी ईर्ष्या
दिखा देते हैं शब्द
और
किसी बदगुमान दिन का ये दस्तावेज़
होता है कलमकार के
रूह की मौत l

दो

बड़ी भयावह
भादो की अनहरिया थी,
उस रात 
पड़े थे कोड़े
कुण्डौली के बूढ़े ठाकुरों पर
नीम की सर्र- सर्र हवा में 
ठहर गए थे 
बाबा के शब्द
उठी थी धौंकनी सी साँस,
बिफरी थी उनकी स्मृति
उसी रेलगाड़ी के काले धुँए-सी 
जिस रेलगाड़ी का दिया कोट
रखा है दादी के
लकड़ीवाले बक्से में l

उस जेठ की लंबी दुपहरिया में 
मैंने जाना कि
अपने दूधिया बाल,चमरौधा जूता,छड़ी,
और शनिवार के सुन्दरकाण्ड के बाद भी 
कहीं बसते थे बाबा l 
सख्त अँधेरे घेर कर ढकेल दिया करते थे 
उन्हें अदृश्य सलाखों के पीछे l

बाबा की काँपती आवाज़
ठिठकती स्मृतियाँ
उन अँधेरी सुरंगों से गुजरती रेलगाड़ी थी 
जिनका अँधेरा निगल सकता था
आने वाली सुबहों को
जाने दो-
"कुछ कहानियाँ सुनाई नहीं जाती "
  कह दिया करते थे बाबा l

उस रात 
लटका दिये गए थे दोनों ठाकुर
तालाब वाले पीपल पर
फिर चौरा बाँधना पड़ा था उनका
जहाँ जलने लगे तब से ही
दिये और धूप 
"कुछ आत्माएं नहीं हैं मुक्त 
इस मुक्ति के बाद भी "
नीली आँखो के उतरते अँधेरों में 
डगमग थी आवाज़ l

एक बार चमकी थीं नीली आँखें
उस अंग्रेज ड्राइवर को याद कर
जिसने उन्हें बताए थे 
Jaggery, sugarcane, Gold,late,route ,delay ,fast 
जैसे शब्द और फरमाइश में पूछा था,
" नागमणि देखा तुम "
जिसने कहा पंडित बस एक है इन्डिया में 
जो educated है l 
अंग्रेज ड्राइवर जिसने कहा,
फिर कौन चलाएगा तुम्हारा रेलगाड़ी 
" रेलगाड़ी भी ले जाइए,हुजूर "
कहा था,एक दूसरे अनपढ़ पंडित ने
" लेकिन अब और delay  नहीं,सरकार l

धुँआ-धुँआ कोड़े-सी 
बाबा की स्मृतियाँ
नहीं हो पाती थीं
लहर,हवा,खुशबू कभी 
अंतस जो अटका रह जाता था
तालाब वाले पीपल पर l

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