पल्लवी मुखर्जी की चार कविताएं

 

पल्लवी मुखर्जी

जन्म- 26 नवंबर, 1967 रामानुजगंज,सरगुजा,छत्तीसगढ़शिक्षा- बी.एएकइस पूरे प्रकरण मेंवे दोनों साक्षी थेपर हर बार तुमजलील होती रहीऔर वोतमाम बेगुनाही का सबूत देकरबच निकलता थाहर बार वो तय मुताबिक उसके अस्तित्व को तार-तार कर देता थावो मूक स्तब्ध होकरदेख रही थी उन आँखों कोजिसने उसे एक नज़र दी थीदुनिया को देखने कीपर ये क्याउसके हौसले पस्त हो रहे थेउसी पुरुष के सामनेजिसने  कभी कहा थातुम मेरी मुमताज़ होबनाउंगा एक ताज़महल वैसे हीजैसे कभी शाहजहां ने बनाया थाखूबसूरत मुमताज के लिये दोतमाम राते आँखें बन्द करने कीपुरज़ोर कोशिश की मगर एक कतरा आंँसूपुरइन के पत्तों पर शबनम कीबूँद की तरह ढुलक गयीमैंने देखा वो चमक रही थीऔर मुझे उड़ने का हौसला दे रही थी.तीनमैंने देखा गाँव की धनियाअब भी गोबर थाप रही हैं और गोबर ………गाँव छोड चुका वो घुस गया है शहर के अंदरसीख रहा है पैंतरे नये नयेइधर धनिया की आँखें पथरा गई गोबर के इंतजार में  चारकितनी बार मैंने तुम्हारे बेज़ान हाथ को खुद से हटाने  की पुरज़ोर कोशिशें  की पर तुम्हारे  छिछले आदर्शों के तले दब गई थी  मैं कहीं और खुद को मुक्त करने की कोशिश में ढूँढ़ती फिरी उन एहसासों को गाँव गाँव ,शहर शहर ,कस्बा कस्बा नदी दरिया पहाड़ लाँघकर भी नहीं खोज पाई उन्हेंजब पहली बारिश के बाद आकाश में पूरा चाँद था और चाँदनी सेलबरेज़ थी मैं

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