‘पिंक’ से दो कदम आगे है ‘पार्च्ड’

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संदीप श्याम शर्मा

“पार्च्ड” का मतलब बंजर, शुष्क, जला हुआ, भुना हुआ, सूखा आदि है लेकिन लीना यादव द्वारा लिखित-निर्देशित यह फ़िल्म इतनी हरी-भरी और ख़ूूबसूरत है कि अंत तक आते-आते सबकी बांछे खिल उठेंगी, हर तरफ़ हरियाली दिखाई देगी। सभी किरदार अपनी-अपनी कहानी लेकर चलते हैं, आगे बढ़ते हैं और अपनी राह पकड़ गंतव्य तक पहुँचते हैं। एक तरह से संपूर्ण फ़िल्म है। बहुत समय बाद ऐसी फ़िल्म आई है जो हर पक्ष में सक्षम और मज़बूत है।

टाइटल से ही बहुत कुछ साफ़ हो जाता है कि ये फ़िल्म किसी ऐसे आधारभूत तथ्य, विषय या परंपरा को उठाएगी जो अब अकाल की तरह विकराल बन चुका है।

लंबे समय से इस फ़िल्म का इंतज़ार था। एक साल पहले टोरंटों इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में रिलीज हुई ये फ़िल्म कई कारणों से लगातार चर्चा में रही, कई इंटरनेशनल फ़िल्म अवार्ड्स जीतने के बाद अब जाकर भारत में रिलीज हुई।

बड़े बजट की फ़िल्म ना होने के कारण और बड़े सितारों के नामों से सुसज्जित ना होने के कारण फ़िल्म कम शहरों और कम स्क्रीन्स पर रिलीज हो पाई। जयपुर जैसे बड़े शहर में भी सिर्फ़ दो सिनेमाघरों में रिलीज हो पाई, वो भी शाम के दो सिर्फ़ दो शो में। देखने गया तो लोगों में रुझान भी कम ही दिखा। हो सकता है फ़िल्म का प्रमोशन उतना ना हुआ हो और सुना है फ़िल्म का रिलीज के पहले ही लीक हो जाना भी एक कारण रहा हो।

ख़ैर मेरा यही कहना है कि अगर पिछले हफ़्ते आई फिल्म “पिंक” लोगों को इतनी पसंद आ सकती है तो ये फ़िल्म उससे दो क़दम आगे ही है। उस फ़िल्म में जहाँ लड़कियों के एक हद पर आकर “ना” कह देने पर, लड़कों को उस “ना” को सहृदय स्वीकार करने की सलाह दी गई है, और बड़े शहरों में संवेदनहीन होते लोगों और ख़ासकर मर्दों को हदें समझने का सन्देश दिया गया था।
वहीँ इस फ़िल्म में अभी भी सुदूर ग्रामीण इलाकों में जहाँ पर टी. वी. नहीं है, स्कूल नहीं है, रोज़गार नहीं है और ज़्यादातर लोग अशिक्षित हैं और दकियानूसी परंपराएं उसी गति और सम्पन्नता से चली आ रही हैं जैसी आज़ादी के पहले थी को दर्शाया गया है। वहाँ औरतों के मन में उठने वाली सहज ख्वाहिशें, उम्मीदें, कसमसाहट, कुछ करने की कोशिश, ज़ंजीरों को तोड़ खुले आसमान में उड़ने की आरज़ू को दिखाया गया है।

पिंक फ़िल्म से कुछ लोग इसलिए संतुष्ट नहीं दिखे क्योंकि वहाँ उन्हें सिर्फ़ लड़कों की ग़लती नहीं दिखी। उनके हिसाब से लड़कियों की भी उतनी ही ग़लती है। लेकिन “पार्च्ड” देखने के बाद शायद ही कोई कहे कि इसमें तथ्यों को अपने एजेंडे के हिसाब से तोडा मरोड़ा गया है, क्योंकि आज भी गाँव में जाकर देखिए, ठीक यही हाल पाएंगे।
फ़िल्म में कहीं भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है। अगर लोग पिंक फ़िल्म को इतना पसंद कर सकते हैं तो निश्चित ही ये फ़िल्म आपको झकझोर देगी। इसमें सबसे ख़ास बात ये है कि यहाँ अत्याचार और दकियानूसी सोच के ख़िलाफ़ आवाज़ भी औरतें ही उठा रही हैं, लड़ती भी औरतें ही हैं और घटिया पुरुषों के दम्भ को तोड़ती भी औरतें ही हैं। फ़िल्म को बड़े सलीक़े से बनाया है, सांकेतिक भाषा और दृश्यों में छोटी-छोटी बातों का समावेश कर सहज तरीके से मुद्दे को उठाया गया है। बड़े-लंबे संवादों के बजाय सहज-सरल, रियलिस्टिक और शानदार अभिनय से भावों को दिखाया गया है। चेहरे के हाव-भाव से ही अंदर चल रही हलचल स्पष्ट देखने को मिलती है।

फ़िल्म का मात्र एक संवाद “मर्द बनने से पहले इंसान बन जाओ” पूरी फ़िल्म को स्थापित कर देता है।

पहले दृश्य से ही फ़िल्म अपना अपना मुद्दा फ़ैलाने लगती है, जब दो औरतें, लज्जो (राधिका आप्टे) और रानी (तनिष्ठा चटर्जी) बस में बैठती है और लज्जो चलती बस में से गर्दन बाहर निकालती है तो रानी कहती है “लज्जो दुपट्टा ले तेरा और सिर ढंक ले” और लज्जो ये कहते हुए कि “ये हवा अंदर तक छू जा रही है, आजा तू भी ले ले ज़िन्दगी का मज़ा” रानी को भी खिड़की से बाहर की हवा खिलाती है और दोनों खूब हंसती है।

इससे ये तो साफ़ हो ही जाता है कि इन्हें खुली हवा चाहिए। वहीँ दो शॉट्स आते हैं जहाँ रिद्धि-सिद्धि और गणेश जी की फ़ोटो होती है लेकिन गणेश जी फटे हुए सिरे पर होते हैं और दिखाई नहीं देते हैं, इसके बाद दूसरे ही शॉट में अकेले गणेश जी की तस्वीर होती है और उनपर माला चढ़ी होती है।

ऐसी छोटी छोटी कई बातें हैं जो निर्देशिका दर्शकों पर ही छोड़ती हैं। चिल्ला-चिल्ला कर या भारी-भरकम संवादों के बिना ही निर्देशिका फ़िल्म को सटीक तरीके से दर्शकों के सामने फैलाती है।

वो दोनों रानी के बेटे गुलाब के लिए लड़की देखने जा रहे हैं। लड़की पसंद आती है 15 साल की। मतलब पहला मुद्दा बाल विवाह का। फिर लड़की का पिता लड़की के एवज में पैसे मांगता दिखा। मतलब शादी नहीं ये सब खरीद-फ़रोख़्त जैसा कुछ दिखा। हाँ यहाँ लड़की वालों को दहेज़ मिला लड़के वालों की तरफ़ से। रानी का लड़का “गुलाब” उधर से फ़ोन करता है कि “माँ लड़की कैसी है, पैसे दे रहे है उस लायक तो है कि नहीं, माल रद्दी निकला तो कबाड़ी में बेच दूँगा”।
एक किशोर की इस तरह की भाषा और सोच अभी भी व्याप्त है ग्रामीण समाज में, मुझे अचरज नहीं होता क्योंकि ये सत्य है। आज भी यही हालात है और विडंबना ये है कि हालात में बिल्कुल भी सुधार नहीं है।

उधर रानी अपने बिगड़ैल और आवारा लड़के गुलाब से परेशान है, वो छोटी उम्र में ही नशे में उलझा है, शादी के बाद भी अपने आवारा दोस्तों की संगत में वेश्यालयों में जाता है, इन सबके अलावा रानी ख़ुद अपने अकेलेपन से लड़ रही है, उसके खुदके सपने हैं, ज़िन्दगी से उम्मीदे हैं। रानी के मोबाइल पर बार बार आता फ़ोन और उधर से प्यार भरी बातें और कहना कि “मैं तेरा आशिक़ बोल रहा हूँ, तेरा शाहरुख़ खान।” दरअसल में ये सांकेतिक भाषा में रानी के मन में चल रहे उथल-पुथल का ही एक रूप है।

उधर रानी की सहेली लज्जो (राधिका आप्टे) रोज़ अपने बेरोजगार और शराबी पति से मार खाती है, बच्चा ना होने पर पति द्वारा दिया गया बाँझ होने का तमगा अपने सिर पे लिए घुटती रहती है। जब उसकी सहेली बिजली (सुरवीन चावला), जो कि डांस कंपनी में काम करने वाली एक सेक्स वर्कर है कहती है कि “हो सकता है तेरा पति ही बाँझ हो”। लज्जो अपनी कल्पनाओं में गोते खाती है और एक आदमी (आदिल हुसैन) से अंतरंग सम्बन्ध बनाती है और उसके बच्चा होने वाला होता है तब उसके पति का झूठ सामने आता है, लेकिन पति अब अपनी पत्नी को बाँझ से सीधा रंडी कहने पर उतर आता है। ये भी बहुत बड़ी विडम्बना है, शहरों में तो आजकल कई तरह की तकनीकें और व्यवस्थाएँ हैं जिनसे औरतें सही ग़लत की तह तक पहुँच सकती है, लेकिन गाँवों में अभी भी वही बकवास धारणाएँ चल रही हैं जहाँ अगर बच्चा नहीं हुआ तो सीधा ठीकरा औरत के ही सर पर फोड़ा जाता है। ऐसी दोगली धारणाओं को तोड़ती है ये फ़िल्म।

दूसरी ओर बिजली (सुरवीन चावला) रोज़ डांस कंपनी में नाचती है और सेक्स वर्कर है, उसी से रोज़ी रोटी चलाती है। उसके भी दिल में ख्वाहिशें हैं, उम्मीदें हैं लेकिन उसका भूतकाल और वर्तमान उसको इन सबसे निकलने नहीं देता। वो वहीँ पर उम्मीद तोड़ देने की हद तक अंदर ही अंदर जलती रहती है। लेकिन वो साथ ही अपने तरीके से ज़िन्दगी जीती है। वो औरत होने को अपनी कमजोरी नहीं, ताक़त मानती है। उसका ये कहना कि “ये भद्दी गालियां भी इन्ही मर्दों ने बनाई है, बहन की गाली, बेटी की गाली, माँ की गाली, हम औरतें भी इनको गाली देंगी, और फिर वो चिल्ला कर भाई, बाप और बेटे की गालियां मर्दों को देती है। वाकई में एक बार तो सोचने पर मजबूर कर देती है ये बात। ग़लत कोई भी करे, भिड़ते ही गाली सुननी पड़ती है किसी माँ, बहन या बेटी को।

उधर गाँव में एक लड़की चम्पा (सयानी गुप्ता) ससुराल में हो रहे अत्याचार से त्रस्त हो अपने मायके आ जाती है, लेकिन पंचायत उसे ज़बरदस्ती ससुराल भेज देती है, उसको कोई नहीं सुनता, आखिर में वो आत्महत्या कर लेती है।

गाँव में एक पढ़ा-लिखा समझदार लड़का “किशन” औरतों को स्वावलंबी बनाने के लिए रोज़गार दिलवाता है और गाँव वालों की दकियानूसी सोच को नकारता है, उसने मणिपुर की लड़की से शादी की और गाँव में औरतों को स्वावलम्बी बनाने के लिए एक एन जी ओ की मदद से काम भी दे रहा गई। इसलिए हर मर्द गाँव का उससे जलता है और उसकी राह में रोड़ा अटकाते हैं।

इस तरह से फ़िल्म में हर किरदार की एक कहानी है और एक स्ट्रगल है। पहले दृश्य से लेकर अंत तक फ़िल्म का सफ़र बहुत शानदार है। बुराई के प्रतीक रावण के अंत से फ़िल्म के अंत को जोड़ना भी आकर्षक रहा। प्रतीकात्मक रूप में शानदार कहानी कही गई है। आगे क्या होता है। क्या फ़िल्म निर्णय देती है या सिर्फ़ मुद्दे को फैला कर ही छोड़ देती है, जानने के लिए फ़िल्म अवश्य देखें।

कास्टिंग बिल्कुल ठीक हुई है, मुकेश छाबरा, जो कि अब तक कई बेमिसाल फिल्मों के लिए कास्टिंग कर चुके हैं, अब उनसे हमेशा बेस्ट की ही उम्मीद रहती है, जिस पर वो खरे उतरते हैं।

अभिनय की बात करें तो सभी ने अपना श्रेष्ठ प्रयास किया है।

तनिष्ठा चटर्जी का अभिनय एकदम पानी की तरह रहा जो गुजरात-राजस्थान की सीमा के आसपास वाले ठेठ देहाती किरदार को जीवंत कर पाया। बहुत ही कमाल का अभिनय, एकबारगी तो विश्वास ही नहीं होता कि वो अभिनय कर रही है। बहुत ही रियलिस्टिक।

राधिका आप्टे लगातार अपने आपको निखार रही हैं, कोई भी किरदार मिले अपने को ढाल लेती है, अंदर से दुःखी और मर्द से रोज़ बेबात मार खाने और बाँझ होनर का दंश लिए लेकिन बाहर से चुलबुली सी दिखने वाली और हर जगह सकारात्मक फैलाने वाली लज्जो को उन्होंने बखूबी निभाया। उन्होंने अंतरंग दृश्य भी दिए और अभिनय और कहानी की मांग के लिए कुछ भी करने को तैयार रहने की एक कलाकार की छवि को चरितार्थ किया। आदिल हुसैन के साथ दिए उनके दृश्य अपने आप में एक क्रांति है।

सुरवीन चावला ने भी कई शेड्स दिखाए। डांस कंपनी में नाचने वाली एक सेक्स वर्कर और उसके मासूम दिल में वहाँ से उड़ जाने और खुली हवा में जीने की ख्वाहिशें देखते ही बनती है। ये बहुत मुश्किल किरदार था, इतना बोल्ड और ज़िंदादिल किरदार लंबे समय से देखने को नहीं मिला था। सुरवीन ने कोई मौका नहीं छोड़ा अपनी अभिनय कला दिखाने का। लग रहा था ये किरदार उन्ही के लिए लिखा गया था। हालांकि उनकी भाषा में थोड़ा पंजाबी लहज़ा आ रहा था और कहीं कहीं बाकी किरदारों से अलग होने के कारण अटपटा लगा लेकिन शायद उनके किरदार की ज़िंदादिली के आगे छिप सा गया।

आदिल हुसैन बस एक जगह आते जहाँ लज्जो को बिजली लेकर जाती है कि अगर तुझमें कमी नहीं तो बच्चा हो सकता है। आदिल की इंटेंस आँखें और सामने निढ़ाल पड़ी औरत के जब वो पैर छूते हैं, हाथ जोड़ते हैं और फिर लज्जो को वो सुख देते हैं जो अब तक उसके लिए बस सुना-सुनाया क़िस्सा था। सुरेंद्र वर्मा के नाटक “सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की प्रथम किरण” की याद हो आती है।

लज्जो के पति के किरदार में महेश बलराज तो कहीं से लगे ही नहीं कि वो महेश हैं। जबरदस्त अभिनय, शराब में चूर, पत्नी की सफलता से चिढ़ा हुआ और अपनी नपुंसकता को छिपा पत्नी को बाँझ का दंश देकर, मर्दानगी का झूठा ढोल पीटने का अभिनय, कमाल का काम किया इन्होंने। इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपका किरदार सकारात्मक है या नकारात्मक, कहानी की मांग के अनुसार और दिए गए किरदार को कितनी शिद्दत से निभा पाते हैं, वही अभिनय का ध्येय है।

लहर खान, चेतन शर्मा, सयानी गुप्ता, सुमीत व्यास और रिद्धि सेन ने भी अपने किरदारों को जीवंत किया है।

पटकथा और निर्देशन की बात करें तो लीना यादव ने कसी हुई और सटीक पटकथा लिखी है और उसी रचनात्मकता के साथ उसे फ़िल्म में उतारा है। ग़ज़ब का निर्देशन किया है उन्होंने। फ़िल्म में कहीं भी झोल नहीं है, बहुत लंबे-ऊँचे संवाद ना बुलवाकर रीयलिस्टिक अभिनय करवाया है। हर बात को बड़ी चतुराई से दर्शाया है। ज़्यादातर भावों को संवादों के बजाय छोटी-छोटी एक्टिविटीज से दिखाया है, जो उनको एक मंझे हुए निर्देशक की श्रेणी में ले आता है। इससे पहले उन्होंने शब्द और तीन पत्ती जैसी फ़िल्में बनाई है, जिनसे उन्हें ख़ास सफलता नहीं मिली, लेकिन ये फ़िल्म कमाल की है। ग्रामीण महिलाओं के साथ आने वाली समस्याओं और विकराल रूप लेती जा रही कुछ खतरनाक समस्याओं जैसे, बाल-विवाह, दहेज़, गाँवों में पुरुष-प्रधान पंचायतें, अशिक्षा, नशाख़ोरी को बख़ूबी दिखाया है। इन समस्याओं से इतर महिलाओं के मन में चलने वाली कसमसाहट और उठने वाली स्वप्न-तरंगों को बेहद सक्षम तरीके से दिखाया है। निर्देशक ने सांकेतिक भाषा का खूब इस्तेमाल किया है, जिससे फ़िल्म और भी ज़्यादा समृद्ध हो जाती है।

हितेश सोनिक का संगीत बहुत ज़्यादा ख़ास रहा, ख़ासकर बैकग्राउंड म्यूजिक कमाल का रहा, फ़िल्म के विषय और मूड के हिसाब से सजाया हुआ संगीत फ़िल्म में जान डाल देता है, राजस्थानी और गुजराती फोक म्यूजिक का बहुत उम्दा उपयोग किया गया, साथ में फ्यूज़न और कुछ हिन्दी फिल्मों के पुराने गानों का सही जगह पर बैकग्राउंड में उपयोग करना काफ़ी मज़ेदार रहा। गाज़ी खान और ग्रुप का ट्रेडिशनल फ़ोक सुनना शानदार अनुभव रहा, उन्होंने ऐसा गाया है कि आप उस माहौल से बाहर आ ही नहीं सकते, ख़ासकर “बाईसा लागे जी घन्ना”, कमाल का है।

फ़िल्म की मार्केटिंग बहुत अच्छी रही, पिछले साल सितम्बर में टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में रिलीज़ हुई ये फ़िल्म, कई बड़े फ़िल्म फ़ेस्टीवल्स में प्रशंसा पाते हुए भारत में आज रिलीज हुई। पिछले साल भर से कई सन्दर्भों, समीक्षाओं और विवादों के कारण भी ये फ़िल्म ख़बरों में बनी रही है, जैसे फ़िल्म में दिखाए गए अंतरंग दृश्यों, पायरेसी, अजय देवगन का फ़िल्म के प्रोड्यूसर के रूप में जुड़ना और राधिका आप्टे और आदिल हुसैन के इंटिमेट दृश्यों का पहले ही लीक हो जाना आदि।
साथ ही फ़िल्म 24 इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में इसका प्रीमियर होना और 18 इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल अवार्ड जीतना, अपने आप में फ़िल्म को सुर्खियाँ बटोरने में सहायक रहा। लेकिन बहुत कम शहरों में रिलीज़ हो पाना और बहुत कम स्क्रीन मिलने के कारण शायद इसके कलेक्शन पर फ़र्क़ पड़े।

सिनेमेट्रोग्राफी बहुत कमाल की रही, रस्सेल कारपेंटर, जो “टाइटैनिक”, “द आंट मैन”, “द अग्ली ट्रुथ” और “जॉब्स” जैसी बड़ी हॉलीवुड फिल्मों की सिनेमेट्रोग्राफी भी कर चुके हैं, यहाँ फ़िल्म के परिवेश, मूड, प्रयोजन, गति और कहानी को उन्होंने ख़ूबसूरत तरीके से फ़िल्माया है। ज़्यादातर फ़िल्म एक ही जगह या गाँव में फ़िल्माई गई लगती है, लेकिन उसमें विविधता लाना और रेगिस्तान के एक सुदूर गाँव को रेतीली-चमकदार मिट्टी में दिखाना वाकई तारीफ़ के क़ाबिल है। इससे एक बात तो साफ़ है कि अगर मेकर्स का फ़िल्म को लेकर विज़न साफ़ है तो हर दृश्य जानदार बनता चला जाता है। ये फ़र्क़ नहीं पड़ता कि छायांकन कोई विदेशी सिनेमेट्रोग्राफर कर रहा है या देशी।

एडिटिंग केविन टेंट ने की है, कई हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों में एडिटिंग कर चुके टेंट ने लाजवाब एडिटिंग की है। फ़िल्म का फ़ील और सस्पेंस बनाये रखा। फ़िल्म कहीं भी ऊब पैदा नहीं होने देती।

वस्त्र विन्यास भी फ़िल्म का मुख्य पक्ष है, आशिमा बेलापुरकर ने ख़ूब रिसर्च के बाद कमाल की कॉस्ट्यूम डिजाईन की है। गुजरात के एक सुदूर गाँव और उसमें भी डिटेलिंग के साथ कलेक्शन। वाकई में अच्छा काम रहा।

लगभग सभी पक्षों में फ़िल्म बेहतरीन है। सिनेमा कितना प्रगतिशील हो चुका है या हो सकता है। यहाँ आपको देखने को मिलेगा। फ़िल्म के अंत में आपको निर्णय मिले या ना मिले लेकिन एक बहस आपके अन्तः में अवश्य रह जाएगी। इस फ़िल्म पर जितना लिखा जाए, कम ही होगा। इसलिए फ़िल्म देखने पर ही इसकी सार्थकता समझी जा सकती है।

बहुत कम फ़िल्में बनती हैं ऐसी। देखिये जरूर।

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