पीयूष शिवम की ग़ज़ल ‘अम्मा’

रो रहा था मैं करूँगा क्या अंधेरा हो गया,

ज्यों छिपाया माँ ने आँचल में सवेरा हो गया।

 

मिल्कियत सारे जहाँ की छान ली कुछ न मिला,

गोद में जाकर गिरे माँ की, बसेरा हो गया।

 

इस फ़रेब-ओ-झूठ  की दुनिया की नज़र न लगे,

माँ की बाँहों में गया, ममता का घेरा हो गया।

 

दिल कहे क्यों हिचकियाँ आतीं तुझे इतनी बता,

इस नज़र के सामने अम्मा का चेहरा हो गया।

 

माँ वही, अंगना वही, चूल्हा वही, मिट्टी वही,

याद आई तो शहर भी गाँव-खेड़ा हो गया।

 

तू ख़ज़ाने की दुआ करता रहा सारी उमर,

ले ख़ज़ाना दुआ का ‘पीयूष’ तेरा हो गया।

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5 Responses

  1. Rajeev singh says:

    Heyy…piyush…..fab 1 beta…..keep on writing….. its fabulous☺

  2. Suprity says:

    Piyush beta… Beautiful lines
    Keep on writing.God bless you.😊

  3. Gaurav Jee says:

    respect bro … amazing !!!

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