पीयूष शिवम की ग़ज़ल ‘छाँव तो कर दे’

कब  से चल रहा हूँ धूप में तेरी,
ज़िन्दगी इस दोपहर में छाँव तो कर दे।

याद धुंधली हो गई गर्दिश में गहरा कर,
इक दफ़ा मेरे शहर को गाँव तो कर दे।

ख़ून देखा है नहीं अपना बहुत दिन से,
ख़ंजर-ए-हालात के कुछ घाव तो कर दे।

ये तसल्ली है कि तूफाँ में भी तिनका है,
ये इरादा है कि इसको नाव तो कर दे।

बीतने को है यहाँ अरसा बहार आए,
इस तरफ इक बार अपने पाँव तो कर दे।

आज निकला ‘शिवम्’ औक़ात जानने,
और को दे छोड़, खुद का भाव तो कर दे।

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