प्यार करना रचनाकार होना है

 

वेद प्रकाश

प्यार एक सहज व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति है । हम इसे श्रेणियों में विभक्त नहीं कर सकते । एक मन से दूसरे मन की आभासी बातचीत जब रूपाकार होने लगती है, तो प्रेम का स्वरूप तैयार होने लगता है । यह किसी को बताया नहीं जाता और यह किसी विद्यालय या यूनिवर्सिटी में विषय का हिस्सा नहीं होता । स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया मानव को उद्वेलित करती है और मानव क्रांतिकारी हो जाता है । कितनी अजीब बात है कि बिना बताये रास्ते मिलने लगते हैं, बिना बोले आवाजें कानों में गूॅजने लगती है, बिना देखे कोई दिखने लगता है । एक अजीब सी बेचैनी सवार हो जाती है और आदमी परवश हो जाता है । आदमी अपनी चीजें भूलने लगता है और एक नयी रचना का हिस्सा होने लगता है ।

प्यार करना एक रचनाकार होना है । प्यार करना दुनिया से एक मुठभेड़ है । कभी-कभी तो यह हो जाता है, सभी लोग नाराज हो जाते है, प्यार को कार्यरूप प्राप्त होते ही । भारतीय समाज अभी भी पारंपरिक है जो ढ़कोसले में बॅधा हुआ है । आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि इसके खिलाफ कोई कुछ कर सके या आवाज ही उठा सके । दरअसल, हमारी परंपराएॅ धर्म के आवरण में हैं । और, धर्म हिन्दुस्तान में पंडितों, बाबाओं और साधुओं की गिरफ्त में है । ये लोग जो कहते हैं, वही धर्म है । भले ही मनुष्य विरोधी हो ।

शिक्षा का स्तर थोड़ा उॅचा हो रहा है, लोग, कमाई धंधे के कारण घरों से बाहर रहने को मजबूर हैं । बुजूर्ग, अलग-थलग हो रहे हैं । लेकिन, ऐसा भी नहीं है । प्रेम-पाश में बॅधने वाले, संवेदनशील होते हैं, इसलिए, यहाॅ यह खतरा नहीं है । ये लोग, समाज को बाॅधना चहते हैं, अपने तरीके से । एक नये तरह का समाज निर्माण करना चाहता है, जो अपेक्षाकृत छोटा हो । और, उनकी कमाई के अनुकूल हो । ये लोग किसी तरह का भ्रम नहीं पालते, कि, यह करेंगे तो वह होगा और वह करेंगे तो यह होगा । ये केवल करने में विश्वास रखते हैं । एक संवेदनशील जो भी करेगा, दिमाग-दुरूस्त से करेगा । इसलिए जहाॅ तक मैं समझता हूॅ, यह समाज को एक नए तरीके से आगे ले जाने का रास्ता है ।

सावन के महीने की तरह, प्यार का जीवन फुहारों में पल्लवित-पुष्पित होता है । हरा-भरा होता है । मद्धम हवा के झोके थपकी देते हैं और पक्षियां चहकने लगती है । गौरैया इतनी खुश हो जाती है कि आईने पर बैठ कर अपनी ही शक्ल को दुलारने लगती है । धरती महकने लगती है । गुलाब अपने शबाब फैलाने को बेकरार हो जाता है । सूरज पानी से धुला-धुला उगता है, पेड़ की फुनगियों पर एक-एक संगमरमर बनाने के लिए । रातरानी झूमने लगती है, लोग, अनायास ही खिंचे चले आते हैं । सुदर्शन अपनी फॅाकों में मस्त हो जाता है, बहती हवा के आगोश को सुगंधित करता है । मैने अभी-अभी देखा, बकुले एक साथ तालाब में उतर रहे थे, एक श्वेत पंक्ति में, सब एक साथ नहा रहे थे, किल्लोरे और पटुता चरम पर थी । एक बुजुर्ग कह रहा था, धरती पर ये बकुले एक खास मौके पर ही पता नहीं कहाॅ से चले आते हैं । मैं इन्हें अपनी खिड़की से ही देखता हूॅ । मेरी पत्नी कहती है, तुम्हारा ध्यान बाहर ही रहता है, ये क्या खिड़की से बच्चों की तरह झाॅकते रहते हो ?

मन के लिए कोई समय नहीं मुकर्रर है, कोई जगह नहीं है, कोई परिस्थिति नहीं है । मन की अपनी रफ्ता है, इसे कोई रोक नहीं सकता है । यह कहाॅ दौड़ जाएगा, किसी का मन नहीं बता सकता । यह कब क्या सोच लेगा, किसी का मन नहीं जान पायेगा । लेकिन, जहाॅ यह धॅस जाता है, पूरी जिंदगी धॅसा रहता है । जबतक, चाहना पूरी नहीं होती । भले ही, जिंदगी मौत में बदल जाए । एक बात और है, एक चाहना पूरी होते ही दूसरी के लिए भी लपकने लगता है । विरले लोग इस लपकने से बच पाते है । मन बिना रास्ते के चलता है, बिना देखे चलता है, बिना सोचे चलता है । जो लोग सोचते हैं, वे मन की बात नही मान सकते । मन की चाल नहीं चल सकते ।

साईकिल से चलते हुए, अचानक मुठभेड़ का हिस्सा हो जाना, जिंदगी को बदल सकता है । बिना संघर्ष कुछ भी हासिल नहीं हो सकता । जो लोग नया बनाना चाहते हैं, उनका रास्ता भी नया होता है । उनका काम करने का तरीका भी नया होता है । नया काम करने वाले किसी से डरते नहीं है, उनकी अपनी रफ्तार होती है, और वे अपने काम को अंजाम देने में लगे होते हैं । ये लोग अपने समय की चाल जानते हैं और उसी तरह से अपनी जिंदगी को सर्फ करते हैं ।

बरगद ज्यादे दिन तक जीवित रहता है, पीपल का भी जीवन लगभग इतना ही होता है । लेकिन, ये दोनो लोगों को जीवन देने के साथ-साथ वनस्पतियों को भी जीवन देने का काम ही नहीं करती अपितु जानवरों को भी पोषित करती हैं । बरगद की छाया में कभी सरकारी स्कूल चला करते थे । सुबह की शुरूआत पहाड़े – गिनती – ककहरा से होते हुए भॅगरईया से अपनी पटरी चमकाने तक का जीवन अब केवल स्मृति का हिस्सा है । हम आपस में लड़ते भी थे, फिर , चटाई पर बैठ कर एक साथ भूजा-भेली खाते थे । स्कूलों में एक घण्टी खेल का जरूर होता था और एक घण्टी या तो कृषि का या बुक-क्राफ्ट का । हम लेई खुद बनाते थे, अबरी पेपर को रंगीन करते थे, हम खेती भी करते थे, फावड़ा-खुरपी-रोपाई-निराई का काम भी करते थे । कबड्डी तो खेलते ही थे, कुश्ती लड़ने वाले, कुश्ती भी लड़ते थे । यह सब गुरूजी की देख-रेख में ही होता था । हमारे समय में स्थाई अध्यापक होते थे । तो भईया ! यह सब आपस में भरोसा बढ़ाने का अवसर है । जो अब नहीं है ।

जिक्र होता है जब कयामत का, तो तेरे जज्बों की बात होती है

तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है

तू निगाहों से ना पिलाये तो, अश्क भी पीने वाले पीते है

वैसे  जीने को तो तेरे बिन भी इस जमाने में लोग जीते है

जिंदगी तो उसी को कहते हैं जो बसर तेरे साथ होती है

सावन में बादल जहाॅ चाहते हैं, वहाॅ गिरना शुरू कर देते हैं । बादल भी टूट कर गिरने से बेहतर छोटी-छोटी बूॅदों मेें गिरना बेहतर समझते हैं । इसी में यदि हवा ने साथ दे दिया तो फिर कहने ही क्या ?

जिनके पास दिल होगा, वे तैरना शुरू कर देंगे । वास्तव में, बादल फुहारों मेें चादर बुन रहे हों और हम सड़क पर हों तो फिर धरती पर संगीत अपने सुरों में बहने लगता है । पता ही नहीं चलता कि नुपूर बज रहे हैं, या हवा चल रही है । या पेंड़ अपनी सीमाएॅ तोड़ रहे हैं । फिर भी, मद्धम शीतल वायु का संगीत मनोरम होता है और आदमी अनायास ही खीचा चला जाता है । उसे पता नहीं रहता कि वह क्या करने वाला है ? या वह अपने को कैसे खो देता है ? यह खोना ही प्यार की पूॅजी है ।

हमको लगता है, नुपूर ध्वनि नहीं देती । उसमें कुछ स्वर की तरंगें होती हैं जो समयांतराल पर अनायास विस्तारित होने लगती हैं और लोग आकृष्ट होने लगते हैं । यह जो अपने-आप वाली बात है, वहीं जीवन को आगे ले जाती है । जीवन को नया करती है । जीवन को साॅस देती है । जीवन कोई बधी-बधाई चीज नहीं जो एक गठरी की तरह है । इसका अपना लय है, यह अपने तरीके से आगे बढ़ता है । जो लोग इसे रास्ता देने लगते है, वह तो इसे स्वीकार ही नहीं होता । जीवन अपना रास्ता खुद तय करता है । और, लगभग एक चुप्पी में कुछ बड़ा करने की सोचता है ।

ये परवतों के दायरे, ये शाम का धुआॅ

ऐसे में क्यों न छेड़ दें दिलों की दास्ताॅ

जरा सी जुल्फ खोल दो फ़िजा में इत्र घोल दो

नजर जो बात कह चुकी वो बात मुह से बोल दो


कविता संग्रह:    यहीं से शुरू

एक उपकथा

एक सुंदर लड़की चाहती है

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