प्यार की रगड़ वाला कवि नीलकमल

शहंशाह आलम

मेरे पास एक 
माचिस की डिबिया है
माचिस की डिबिया में कविता नहीं है

माचिस की डिबिया में तीलियाँ हैं
माचिस की तीलियों में कविता नहीं है

तीलियों की नोक पर है रत्ती भर बारूद
रत्ती भर बारूद में भी कहीं नहीं है कविता

आप तो जानते ही हैं कि बारूद की जुड़वाँ पट्टियाँ 
माचिस की डिबिया के दाहिने-बाएँ सोई हुई हैं गहरी नींद

ध्यान से देखिए इस माचिस की डिबिया को 
एक बारूद जगाता है दूसरे बारूद को कितने प्यार से 
इस प्यार वाली रगड़ में है कविता
कि जैसे नींद में करवट बदलती कोई आग।
- नील कमल

नीलकमल

देवता कवियों से भरे इस कविता-समय में नील कमल समकालीन हिंदी कविता के उन दोस्त कवियों में हैं, जिनकी दुनिया हरी घास से भरी हुई है। इस दुनिया में जो कुछ भी है सहज है। यहाँ का समुंदर, यहाँ का दरिया, यहाँ का कुआँ इतना मीठा है कि आप जब चाहें अपना पानी पीने का बर्तन आकर भर सकते हैं। इस समुंदर, इस दरिया, इस कुएँ का पीकर आप उदास बैठे नहीं रहना चाहेंगे बल्कि इस मीठे शरबत जैसा पानी पीकर संग्राम पर निकल जाना चाहेंगे तरोताज़ा एकदम। वहीं हर तरह से कुशल देवता कवियों की कविताएँ आजकल आपको सुला देती हैं डरावनी नींद में। देवता कवियों की कविता का मूल्य इतना ही भर बचा रह गया है। नील कमल की कविता का समुंदर, दरिया, कुआँ आपके दरवाज़े पर आकर दस्तक देता है इस बात के लिए कि हम तुम्हारे साथ हैं साथी। कविता का यह पड़ाव मुझे बेहद पसंद है, जिसमें नील कमल जैसे कवि सुस्ताते नहीं बल्कि रवाँ-दवाँ दिखाई देते हैं। यह रवाँ-दवाँ होना नील कमल ने किसी देवता कवि से नहीं सीखा है। नील कमल जो सीखते हैं अपने समुंदर, अपने दरिया, अपने कुएँ के मीठे पानी से सीखते हैं। सही वजह यही है कि नील कमल के समुंदर का खारा पानी भी आपके बर्तन में आकर शरबत हो जाता है। इसी वजह से नील कमल की कविताएँ मुझे ज़्यादा मूल्यवान लगती रही हैं। हिंदी के देवता कवियों के पास अब हमारी दुनिया को देने के लिए ऐसा क्या बचा है, जो हम उन्हें देवता कवि वाला सम्मान देते रहें डरे और सहमे हुए। सच यही है देवता कवि हमसे हमारा साहस छीन लेते रहे हैं। इस छीना-झपटी के बीच नील कमल का साहस पूरी तरह ज़िंदा दिखाई देता है अपनी कविता-दृष्टि को मेरे-आपके दुखों तक पहुँचाते हुए :
आए, दुःख भी आए
रहे घर में साथ नहाए खाए
पडे़ रहे किसी कोने अंतरे में

दुःख भी आए 
राह चलते किसी मोड़ पर टकराए
तो रुके पल दो पल बोले बतियाए

चुभे पाँव तले, काँटे-सा कभी 
धँस जाए, पर जिसे सह लिया जाए 
जैसे सह लिया जाता है शत्रुओं को 
इसी समाज में मित्रों के बीच।

दुःख के चुभने की यह क्रिया कविता जितनी ही पुरानी ठहरी। दुःख को साधना ही तो जीवन को साधना है। मेरे विचार से हरेक कवि बुद्ध होता है। नील कमल भी कविता के बुद्ध हैं। ये भी बुद्ध की तरह खुली आँखों से जीवन के दुखों को देखते हैं यानी आदमी के दुखों को देखते हैं और दुखों के ख़िलाफ़ संग्राम छेड़ देते हैं। अब कवि ही तो बचा रह गया है संग्राम छेड़ने के वास्ते। कवि ही है जो मनुष्य पर थोपी जा रही कठिनाई को अस्वीकारता है, उसकी निंदा करता है, उसके बीच अवरोध पैदा करता है। बुद्ध ने भी तो यही सब किया था। कविता की नील कमल वाली पीढ़ी साहसिक पीढ़ी है। यह पीढ़ी कविता के पटाख़े नहीं फोड़ती, कविता के दरख़्त उगाती है। पटाख़ा कवियों ने अकसर कविता को नुक़सान पहुँचाया है। उन पटाख़ा कवियों द्वारा किए गए नुक़सान की भरपाई नील कमल और इनकी पीढ़ी के कवि करते चले आ रहे हैं। दुखों की लहरें उठती हैं और दुखों की लहरों को नील कमल अपनी कविता की तलवार से काटते जाते हैं। लहरों को काटने की आवाज़ को सुनने के लिए आपको नील कमल की कविता की आवाज़ सुननी होगी। यह कवि अगर देश की जनता को प्यार की रगड़ देता है, तो देश की ऊँची कुर्सियों को जलाने के लिए माचिस को पूरी डिबिया साथ लेकर चलता है। माचिस का यह छोटा डिब्बा हर कवि के काम आता रहा है। नील कमल इस माचिस के डिब्बे का इस्तेमाल करना बख़ूबी जानते हैं। देश की ऊँची कुर्सी पर बैठा हुआ भी तो आदमी ही हुआ करता है और एक कवि भी आदमी ही हुआ करता है लेकिन कितना फ़र्क़ है ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए आदमी में और कवि में। एक कवि अपने घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रखता है और ऊँची कुर्सी वाला आदमी अपने अलावा बाक़ी बचे सब आदमियों के लिए अपने घर का दरवाज़ा बंद कर देता है। यही ख़ास वजह है जो नील कमल आम आदमियों के लिए प्यार की रगड़ पास में रखते हैं और दुनिया के हुक्मरानों के लिए माचिस की डिबिया।

मैं अपने समकालीन कवियों को पढ़ते-सुनते हुए अकसर सोचता हूँ कि हमारी कविता का दरवाज़ा ज़रा-सा छोटा होता जा रहा है। कवियों के दरवाज़े पर भी सन्नाटे ने डेरा डालना शुरू कर दिया है। यह सन्नाटा यह बताने लगा है कि एक कवि तो पानी और नमक को भी शत्रुओं के विरुद्ध हथियार बनाकर उपयोग कर सकता है। लेकिन हर कवि पानी और नमक मिलाकर आदमियों के दुश्मनों की आँखों की तरफ़ निशाना लगाकर कहाँ फेंक आ रहा है। इस हर वक़्त उपलब्ध हथियार का इस्तेमाल तक हम कहाँ कर रहे हैं। इस सबसे सस्ते हथियार का इस्तेमाल हम कर रहे होते तो दुनिया भर के हुक्मराँ छाती चौड़ी किए सिर्फ़ मार-काट की बातें नहीं कर रहा होता बल्कि उस बच्चे की भूख का इंतज़ाम करवा रहा होता, जिसकी माँ के पास बस एक आधार कार्ड नहीं होने की वजह से सरकारी राशन बेचने वाले दुकानदार ने उस मरे हुए बच्चे की माँ को राशन नहीं दिया और उसका बच्चा भूख की वजह से मारा गया। यह तय कौन करेगा कि अपने देश में एक भूखे आदमी के लिए 'रोटी' ज़रूरी है कि 'आधार कार्ड' ज़रूरी है। देश की सरकारें आधार कार्ड के नाम पर हमारी हत्याएँ करती चली आ रही हैं। यह कितना दुखद है। और हममें से कुछ हैं कि ऐसे हुक्मरानों के लिए तालियाँ बजाकर यह सिद्ध करने में लगे हैं कि यही हुक्मरानी है जो मुल्क को बचाए रख सकती है। यह सच कि हमें भूखों मारकर मुल्क को बचाए जाने का नया तरीक़ा अपने देश में ईजाद किया गया है। जब हमें मारा ही जाना है किसी-न-किसी बहाने, तो ऐसे हुक्मराँ की आँखों में नमक डालकर हम उनको अँधा तो बना ही सकते हैं। ऐसा करने के लिए हम उन माँओं को रास्ता दिखा सकते हैं, जिन माँओं ने अपने बच्चे गँवाए हैं। समय कोई हो, कवियों को सत्ता की चाकरी नहीं करनी चाहिए। नील कमल की कविताएँ हमको-आपको यही समझाती हैं :
'सुख का संसार 
कहाँ है जहाँ जाया जाए'

ऐसा ही कहा था, एक पिता ने 
बेटी को लिखे एक पोस्टकार्ड में

माँ के बक्से में पड़ा है 
वह सूक्ति-वाक्य लिखा पोस्टकार्ड

बड़े दुःख देखे माँ ने जीवन में लेकिन
नहीं पूछा उसने किसी से सुख का पता

ऐसा नहीं था कि चाह न थी सुख की
दरअसल वह दुःखों के उस पार ही था

दुःखों से लड़ने में था जीवन का सुख 
यह हमने किसी धर्मग्रंथ से नहीं सीखा
सीखा उसी पोस्टकार्ड से
जो माँ के बक्से में पड़ा है।

कविता की सही चाशनी बनाना बेहद कठिन है। इसलिए कि यह चाशनी बेहद रहस्यों से भरी होती है। यह बनाना सबके बूते का हो न हो, नील कमल को इस काम में कमाल की महारत हासिल है। नील कमल का बलबूता कविता को नई ऊर्जा देता है। नई चाशनी देता है। कविता की यह चाशनी खाने वाली चाशनी है भी नहीं। यह चाशनी तो कविता में ख़ासियत की तरह आती है और शत्रु सत्ता को, अँध समाज को, ख़राब परंपरा को बदलने के काम आती है। नील कमल की कविताओं में यह चाशनी ख़ूब है। यह ऐसे कवि हैं कि आपके घर पहुँच जाएँगे, कविता की प्यार वाली रगड़ से आपको नहलाएँगे और मुहब्बत से आपको माचिस की डिबिया दे देंगे ताकि आपसे, आप जिससे बेहद मुहब्बत करते हैं, उनसे प्यार वाली रगड़ कोई छिनना चाहे तो माचिस को मशाल बनाकर अपने शत्रुओं को आप मशाल की तेज़ रोशनी में देख-पहचान सकें। सच यह भी है कि आपने अपने शत्रुओं को पहचानना छोड़ जो दिया है इन दिनों। तभी घोषित कर-करके आपके शत्रु आपको मारते हैं और आप हैं कि अपने मारे जाने को राष्ट्रहित में मारा जाना कहकर अपने को शहीद का दर्जा दे देते हैं। भाई, हमारे शत्रु ज़िंदा क्यों हैं और हम मरे हुए क्यों हैं अपने ही देश की छाती पर? वे कभी आप वाली मौत क्यों नहीं मरते, जिन्हें आप लहक-लहककर अपना मत उनके पक्ष में दे आते हैं और घर लौटकर मरने वालों की फ़ेहरिस्त बनाने के काम में लग जाते हैं। मरने वालों की फ़ेहरिस्त में आपका कोई सगा नहीं भी है तो क्या मरा हुआ आदमी आपको अपने देश का मरा हुआ आदमी नहीं लगता? आप बेहद चतुर जो हैं मुल्क के हुक्मराँ के जैसे। तभी आप बस मरे हुओं की लाशें गिनते हैं और यह गिनती भी आप राष्ट्रहित में करते हैं। नील कमल आपके इस विचार को ख़ूब समझते हैं। समझ तो आप भी ख़ूब रहे हैं। सच यही है कि हत्यारा जब मेरे दरवाज़े तक आ पहुँचा है तो कल आपके दरवाज़े पर भी अपने नाख़ून ज़रूर गाड़ेगा। कल आप जिन लाशों की फ़ेहरिस्त राष्ट्रहित में तैयार करते चले जा रहे हैं, उस फ़ेहरिस्त में आप अथवा आपका कोई अपना सगा भी शामिल ज़रूर किया जाएगा। नील कमल इसीलिए आपको चेता रहे हैं :
कब तक कोई 
जबड़े भींचे रह सकता है

कब तक आँखों के
भीतर चढ़ते ख़ून को 
रोके रख सकता है कोई

अपमान की आग में 
सुलगता कब तक अपनी 
सख़्त मुट्ठियों को जेब के 
अंदर घुसेड़े कोई रख सकता है

एक दिन घृणा भी
माँगती है बाहर आने का रास्ता

घृणा के साथ 
किसी के नाम पर थूक देने में भी
दर्ज हो सकता है प्रतिवाद

मार नहीं सकता अगर हत्यारों को
बिगाड़ नहीं सकता यदि उनका कुछ 
थूक तो सकता ही हूँ उनके नाम पर 
थूक कर कह तो सकता हूँ, लो यह रही
यह जो मेरी घृणा है तुम्हारे लिए
चौबीस कैरट खरी
सोलह आना खाँटी।

नील कमल विरोध के चौबीस कैरट वाले कवि हैं। यही वजह है कि नील कमल किसी हत्यारे का कुछ बिगाड़ नहीं सकते तो हत्यारे के नाम पर थूकते ज़रूर हैं। ऐसा सोलहो आने सच्चा कोई कवि ही कर सकता है। वरना आज लोग थूकते हैं और डरकर अपना थूका चाट भी जाते हैं। ये वे लोग हैं जो किसी सामूहिकता में विश्वास नहीं रखते। जबकि नील कमल एक कवि होने की हैसियत से सामूहिकता में भरोसा रखते हैं और आदमी की मुक्ति का नया रास्ता निकाल लाते हैं। यह मुक्ति का रास्ता नहीं है तो और क्या है, कवि जो ताल ठोंककर मुझसे-आपसे कह रहा है कि तुम्हारा हत्यारा तुमसे मज़बूत है और मैं-तुम उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते तो उस हत्यारे के चेहरे पर थूककर अपना प्रतिवाद दर्ज कर ही सकते हो हत्यारे की नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश करते हुए। आख़िरकार एक कवि के पास उतने ही हाथ-पाँव होते हैं न, जितने आपके पास हैं। वही नाक, कान, आँख भी तो एक कवि के पास हैं, जो आपके पास। फ़र्क़ इतना भर है कि आप कोई हत्याकांड देखकर घर में दुबक जाते हैं और कवि उस हत्याकांड से आहत आपको विद्रोह के लिए उकसाता है। एक कवि ऐसा इसलिए करता है कि आप यह महसूस सकें कि जो मारे गए, वे भी तो आप ही के जैसे दिखते थे भई! फिर आप राष्ट्रहित के नाम पर हर हत्या पर चुप क्यों लगा जाते हैं। राष्ट्रहित हमेशा हमसे हमारी मौत ही क्यों चाहता है, हमको जीवन क्यों नहीं देता? आप कह देते हैं कि देश का हर कवि असहिष्णु है, देश का हर कवि ख़ामख़ा नाराज़ दिखाई देता है। यह ख़ामख़ा वाला आपका मुआमला बड़ा घातक सिद्ध हो रहा है आदमियों के लिए। और आदमी हमेशा 'आम' ही हुआ करता है, उसी तरह एक कवि भी। ख़ास तो आप हुआ करते हैं। आपके ख़ास होने की ख़ास वजह यही है कि आप सत्ता पक्ष के क़रीब खड़े रहते हैं। यानी आप हत्यारे के क़रीब खड़े रहते हैं। नील कमल यही तो बतलाते-समझाते रहे हैं। आप अपने अट्टहास में मगन रहते हैं। एक कवि है कि आदमी की मुस्कुराहट वापस लाने के लिए ख़ुद को खोजता रहता है। यहाँ मेरा आशय यह है कि ख़ुद को खोजने के बहाने कवि आदमी की कविता खोजता है, आदमी की खो चुकी हँसी वापस लाने के लिए। नील कमल भी यही करते हैं। इसलिए कि नील कमल अपने घर की कोई दीवार ऐसी नहीं छोड़ना चाहते जिस पर चल रहे वक़्त की कविता लिखी नहीं गई हो :
समय को गूँथा हमने 
आटे की तरह 
अपनी हथेली के बीच

गूँथा समय के आटे को
दुःख के खारे पानी में
बेला संघर्ष के चाक पर
सेंका फिर उम्मीद की मद्धम आँच पर

इस तरह कमाई हमने 
अपने हिस्से की रोटी।
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परिचय :

*नील कमल 
*जन्म तिथि 15 अगस्त 1968 (किसान परिवार में जन्म; गाँव-भलेहटा, वाराणसी जनपद, उत्तर प्रदेश) 
*कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक, गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (प्राणि-विज्ञान) 
*सम्प्रति पश्चिम बंगाल सरकार के एक विभाग में कार्यरत

*कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ एवं स्वतन्त्र लेख हिन्दी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित (प्रगतिशील वसुधा, माध्यम, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कृति ओर, बया, सृजनलोक, जनपथ, सेतु, लौ, अनहद, समकालीन सृजन, सृजन संवाद, पाठ, इन्द्रप्रस्थ भारती, आजकल, जनसत्ता, अक्षर पर्व, उन्नयन, साखी, शेष आदि), हिन्दी के अतिरिक्त बांग्ला में भी लेखन, कुछ कविताएँ व लेख बांग्ला की साहित्यक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित, 
*पहला कविता संग्रह, "हाथ सुंदर लगते हैं" 2010 में कलानिधि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित, दूसरा कविता संग्रह, “यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है” 2014 में ऋत्विज प्रकाशन, कोलकाता से प्रकाशित 
*लेखन की शुरुआत कविता से, स्कूल के दिनों से ही स्थानीय दैनिक में कविताएं प्रकाशित एवं पुरस्कृत, पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में एक साथ आठ-दस कविताएं कथाकार मदनमोहन के सम्पादन में गोरखपुर से निकलने वाली पत्रिका, “नई रचना” में 1989 में, लघु पत्रिका “अलीक” का सम्पादन (1989-1990) 
*’अक्षर घाट’ साहित्यिक स्तम्भ का लेखन (डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, लखनऊ-इलाहाबाद-वाराणसी से प्रकाशित अखबार के लिए, 100 सप्ताह तक ) जिसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की योजना है 
*ऋत्विज कविता पुस्तिका (हिंदी कविता : संभावना के स्वर) का सम्पादन (2017)
*सम्पर्क - 244, बाँसद्रोणी प्लेस (मुक्त-धारा नर्सरी के.जी. स्कूल के निकट), कोलकाता-700070. 
*मोबाइल-(0)9433123379.
*ई-मेल- neel.kamal1710@gmail.com


शहंशाह आलम के फेसबुक वॉल से साभार

 

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